संस्करण: 23 मई-2011

भाजपा का फ्लॉप शो
मोदी मैजिक पीट गया क्या ?
 

? सुभाष गाताड़े

               इसे आप अज़ीब इत्तोफाक कह सकते हैं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने जहां कांग्रेस पार्टी को थोड़ा ग़म और थोड़ी खुशी दी है वहीं वाम एवम दक्षिण दोनों ही खेमों में विभिन्न कारणों से ही चिन्ता की लकीरें खींच दी हैं।

 

               34 सालों से पश्चिम बंगाल की हुकूमत सम्भाल रहे वाम मोर्चे को मिली शिकस्त पर जहां बात हो रही है और वाम का मर्सिया लिखने में माहिर चन्द कलमकारों की जहां बांछे खिली दिखती हैं,वहीं देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी के अरमानों पर फिरे पानी पर काबिल विश्लेषकों की अभी ठीक से निगाह नहीं गयी है। भाजपा के अन्तरिम लॉप शो पर मौन ही मौन है। और इतना ही नहीं इन चुनावों में फिर एक बार टूटे मोदी मैजिक की तो कोई बात ही नहीं कर रहा है।

 

               'हमें पूरा यकीन है कि असम में अगली सरकार हमारी बनेगी,और यही नहीं तमिलनाडु,बंगाल,केरल और पाण्डिचेरी हमारे लिए कठिन होने के बावजूद वहां हम इतनी सीटें जीतेंगे कि उससे उन राज्यों में हमारी पार्टी के राजनीतिक विस्तार का आधार बन सकेगा।' (पंजाब केसरी, 16 मई 2011) अगर यह बताया जाए कि प्रस्तुत वक्तव्य भाजपा के बडबोले अध्यक्ष जनाब नितिन गडकरी ने चुनाव नतीजों के चन्द रोज पहले बेहद आत्मविश्वास के साथ दिया था,तब शायद किसी को यकीं नहीं होगा। मगर संघ के हस्तक्षेप से भाजपा के अध्यक्ष पद पर आसीन हुए नितिन गडकरी -जिन्होंने थोड़े समय में अर्जित की अकूत दौलत लोगों के बीच कुतूहल का विषय बनी हुई है -को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। कमोबेश हर वरिष्ठ नेता का यही आकलन रहा है।

 

               और अब जबकि संघ-भाजपा के शीर्ष नेताओं के तमाम दावे काफूर हो चुके हैं और असम में उसकी सीटें पहले से आधी (अब 5सीटें )हो चुकी हैं और बाकी राज्यों में उसका खाता भी नहीं खुल सका है,तब कोई भी इस पर बात करने को तैयार नहीं है।

 

               वैसे संघ की तरफ से भी इन चुनावों में हस्तक्षेप बनाए रखने की पूरी कोशिश हुई। उम्मीदवारों के चयन से लेकर स्थानीय विवाद निपटाने तक में संघ की तरफ से निर्यात किए गए प्रचारकों का दखल था। अख़बारनवीस से बात करते हुए खुद असम भाजपा के नेता ने बताया कि इन चुनावों में संघ का हस्तक्षेप कुछ ज्यादा ही हो गया था जिसकी वजह से चुनावों में स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की खुल्लमखुल्ला उपेक्षा की गयी थी।

 

              यह शायद संघ के एजेण्डा का ही प्रभाव था कि असम में -जहां अपने बलबूते सरकार बनाने की उसकी उम्मीदें आसमान छू रही थीं -ऐसे ही लोगों को चुनाव प्रभारी के तौर पर या स्टार प्रचारक के तौर भेजा गया जिनकी छवि मॉडरेट किस्म की नहीं बल्कि उग्र हिन्दुत्व की रही है उदा.वरूण गांधी या विनय कटियार। याद रहे कि बजरंग दल के नेता रह चुके विनय कटियार बाबरी मस्जिद विधवंस आन्दोलन के दिनों से ही अपनी उग्र छवि के लिए जाने जाते रहे हैं तो मेनका गांधी सुपुत्रा वरूण गांधी ने भी 2009 के चुनावों में ऐसे विवादास्पद बयान दिए जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ जाते थे कि सुश्री मायावती सरकार ने उनके खिलाफ मुकदमे तक दर्ज किए थे।

 

              चुनाव में स्टार कम्पेनर के तौर पर हिन्दुत्व के पोस्टर ब्वॉय नरेन्द्र मोदी की डयूटी लगा दी गयी थी,जिन्होंने कई स्थानों पर सभाओं को सम्बोधित किया था। मोदी की यह असफलता बरबस 2007 के उत्तार प्रदेश चुनावों की याद ताजा करती है,जिसमें उन्हें स्टार प्रचारक के तौर पर उतारा गया था। याद रहे कि यह वही चुनाव थे जब भाजपा के चौथे नम्बर पर पहुंची थी। और वे अधिकतर स्थान जहां मोदी ने अपनी तकरीर दी थी,वहां पर भाजपा को शिकस्त मिली थी।

 

              स्पष्ट था कि संघ भाजपा की पूरी कोशिश थी कि सूबा असम में साम्प्रदायिक सदभाव की राजनीति पलीता लगा दिया जाए ताकि होने वाला धृर्वीकरण उसके फायदे में रहे। यह सकारात्मक है कि जनता ऐसे तत्वों के झांसे में नहीं आयी।

 

              इसमें कोई दोराय नहीं कि असम,तमिलनाडु,केरल,पश्चिम बंगाल और पाण्डिचेरी की विधानसभाओं के लिए हुए इन चुनावों के पहले भाजपा की कोर कमेटी में काफी विचारमंथन हुआ था और इसके हिसाब से योजना बनी थी। वैसे अगर हम भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं की प्रतिक्रिया देखें तो मालूम चलता है कि असम में पार्टी की दुर्गत उनके लिए कितना बड़ा झटका साबित हुए हैं। बकौल अरूण जेटली 'मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि असम के चुनाव परिणाम बिला शुब्हा पार्टी के लिए बड़ा धक्का हैं।' (सन्दर्भ, वही)

 

               एक मोटे अनुमान के हिसाब से देखें तो इन पांचों राज्यों में भाजपा ने कुल 824 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे,जिनमें से महज 5 जीत सके हैं। सफलता दर 0.55 फीसदी। 2014 के लोकसभा चुनावों में अपने आप को प्रबल दावेदार के रूप में पेश करती आयी भाजपा के लिए फिलवक्त इस सवाल का जवाब ढूंढना है कि क्या इन पांच राज्यों में अगर यथास्थिति बनी रहती है तो -जहां लोकसभा की 115 सीटें निकलती हैं - क्या उसके लिए विपक्षी राजनीति का धारुव बनना इतना आसान साबित हो सकेगा।

 

                वैसे भाजपा की यह असफलता चाल,चेहरा एवं चिन्तन में उसकी व्यापक असफलता को ही प्रतिबिम्बित करती है। भ्रष्टाचार के खिलाफ इतना शोरगुल करनेवाली इस पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं का अपना आचरण कहीं कम विवादास्पद नहीं रहा है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीता जब पंजाब में उसके एक लीडर घूस लेते कपडे ग़ए थे। यह अकारण नहीं कि भाजपा के अपने पांचों मंत्रियों के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। वही हाल जम्मू कश्मीर में भी हुआ है। विधानपरिषद के चुनावों में भाजपा के कई वरिष्ठ नेता दूसरे पक्ष को मतदान देते पकड़े गए हैं।
 


? सुभाष गाताड़े