संस्करण: 23  जुलाई-2012

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ठेकेदार और मुख्यमंत्री :

क्या जाँच एजेंसियाँ मुख्यमंत्री के दर पर भी दस्तक देंगी?

           केन्द्रीय सतर्कता आयोग के मनी लान्डरिंग को लेकर दिलीप सूर्यवंशी से पूछताछ करने के बाद क्या अब वह उनके पोषक और संरक्षक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के दरवाजे पर भी दस्तक देंगी?

                आयकर विभाग द्वारा दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के ठिकानों पर मध्यप्रदेश तथा राज्य के बाहर अनेक शहरों में मारे गये छापे भाजपा के लिये सबसे बुरी बात है। 

  ? एन.डी. शर्मा


गैरकानूनी गिरफ्तारियों

वाला सूबा

        क्या शान्त कहे जानेवाले सूबा मध्यप्रदेश में आन्तरिक हालात इतने खतरनाक हो चले हैं कि 'उपद्रवग्रस्त इलाकों' की तुलना में वहां अधिक लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरोधात्मक हिरासत में रखना पड़ रहा है ?दरअसल सूचना के अधिकार के तहत एक अग्रणी अख़बार इण्डियन एक्स्प्रेस द्वारा हासिल आंकड़ें यही कहानी बयान करते हैं। और ऐसी हिरासत के मामले में मध्यप्रदेश मणिपुर एवं नागालैण्ड जैसे अशान्त कहे जानेवाले सूबों से या उत्तर प्रदेश जैसे सूबे से होड़ करता दिखता है। 

? सुभाष गाताड़े


हंगामों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्पीकर को निष्पक्ष बनाना जरूरी

       वैसे 17 जुलाई मंगलवार को मध्यप्रदेश विधानसभा में जो कुछ हुआ उसे किसी भी हालत में उचित नहीं ठहराया जा सकता। सभी समाचार पत्रों ने उसकी कटु शब्दों में निंदा की है। वैसे अखबारों को पढ़ने से ऐसा लगता है कि इस तरह की घटना पहली बार हुई है। इसके पहले मध्यप्रदेश विधानसभा स्पीकर का अपमान किसी ने नहीं किया है या इसके पहले कोई भी विधायक अध्यक्ष की आसंदी पर नहीं चढ़ा है। जिन लोगों का ऐसा ख्याल है, उनके बारे में कहा जा सकता है कि उन्हें मध्यप्रदेश विधानसभा के इतिहास का ज्ञान नहीं है।

? एल.एस.हरदेनिया


मप्र में पीएचडी का फर्जीवाड़ा

          ध्यप्रदेश के शासकीय और निजी विश्वविद्यालयों में पीएचडी के फर्जीवाडे क़ा धंधा तेजी से फल-फूल रहा है। शिक्षा विभाग से जुडे लोग उच्च शिक्षा विभाग की अनुमति के बगैर निजी विश्वविद्यालयों तथा अपने अधिकारिता क्षेत्र के विश्वविद्यालयों के विरुध्द अन्यत्र विश्वविद्यालयों में शोध कार्य के लिए शोध निदेशक के रूप में पंजीकृत हैं और यह सिलसिला अब भी जारी है। यूजीसी एवं विश्वविद्यालयों के अध्यादेश अधिनियम परिनियम के अनुसार शोधार्थियों की संख्या छह से आठ तक निर्धारित की गई है।

? महेश बाग़ी


धार्मिक संस्थाओं में संग्रहीत धन पर राष्ट्रीय बहस अपेक्षित

         म तौर पर सत्ता की राजनीति करने वाले समाज के दूसरे महत्वपूर्ण पक्षों की उपेक्षा करते रहते हैं पर गत दिनों एनडीए, के अध्यक्ष  श्री शरद यादव ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण और विचारोत्तोजक बयान देते हुए कहा है कि धार्म स्थलों में जमा धन का उपयोग ख्कम से कम, धार्मिक कार्यों के लिए किया जाना चाहिए। ध्यान देने योग्य ये है कि वे उस गठबन्धन के अध्यक्ष हैं जिसमें धार्म की राजनीति करने वाले दलों ,अकाली, शिवसेना, और भाजपा प्रमुख घटक हैं। उनके इस बेहद महत्वपूर्ण बयान पर अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है जबकि इस सुझाव पर तुरंत ही राष्ट्रव्यापी बहस छेड़े जाने की जरूरत है।

 ? वीरेन्द्र जैन


सर्वपल्ली राधाकृष्णन--

एक ध्वजस्तंभ

                  ब से राष्ट्रपति पद के संभावित प्रत्याशियों के नाम पर अटकलें समाप्त हुई है, तब से उपराष्ट्रपति पद के संभावित प्रत्याशियों की ओर थोड़ा ध्यान गया है। थोड़ा ही ध्यान क्यो? क्योंकि राष्ट्रपति ही राष्ट्रीय गौरव का केन्द्र होता है, उसके अतिरिक्त कोई नही। प्रोटोकाल के अनुसार भारत के राष्ट्रपति पहले नम्बर पर आते है, उपराष्ट्रपति दूसरे नम्बर पर और प्रधानमंत्री तीसरे नम्बर पर।

? गोपालकृष्ण गांधी

(गोपालकृष्ण गाँधी एक पूर्व प्रशासक, राजनयिक और पूर्व राज्यपाल है।)

युवाओं में बढ़ती अपराधी प्रवृत्ति

अपने भीतर झांके समाज

      त्या, लूट, बलात्कार, चोरी, डकैती, ब्लैक मेलिंग के अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है और युवा जिस प्रकार की प्रवृत्ति से ग्रसित होते जा रहे हैं उससे इन अपराधों पर लगाम लगने की कोई सूरत भी नजर नहीं आती। किसी भी सभ्य समाज के लिए यह निश्चित रूप से यह चिंताजनक स्थिति है,लेकिन इससे भी अधिक भयावह है अपराध के दलदल में ऐसे लोगों का धंसना जो न तो पेशेवर अपराधी हैं और न ही अपराध करना उनके लिए कोई मजबूरी है,वे केवल अपने अहंकार की तुष्टि या अनावश्यक जिद के चलते ऐसे संगीन अपराध कर जाते हैं,जो न केवल उनके पूरे जीवन को कालकोठरी में धकेल देते हैं बल्कि समाज को भी शर्मशार कर जाते हैं।

? विवेकानंद


जो तटस्थ है

वे भी गुनहगार हैं !

      सम की राजधानी गुवाहाटी में पिछले दिनों एक तरह से 'इतिहास' दोहराया गया।

                आज से लगभग साढ़े  चार साल पहले गुवाहाटी की सड़कों पर भाग रही उस 16 वर्षीय आदिवासी किशोरी की तस्वीर,जो शहर में किसी जुलूस में भाग लेने आयी थी -जिसके कपड़े भीड़ ने फाड़ कर उसे निर्वस्त्र कर दिया था और उसका फोटो भी लोगों ने अपने कैमरे एवं मोबाइल फोन में कैद किया था -पूरे देश में सूर्खियां बनी थी। इस बार फर्क महज इतना था कि लड़की गुवाहाटी की रहनेवाली थी,जो अपने मित्र के साथ खड़ी थी और उस पर भीड़ ने हमला किया।

? अंजलि सिन्हा


थम नहीं रहे घरेलू हिंसा के मामले

        स प्रगतिशील युग के दौर में व्यक्ति जहां एक ओर परम्परागत कतिपय गलत रूढ़ियों और दकियानूसी सोच को त्यागकर अपने आपको आधुनिकता की दौड़ में शामिल कर रहा है वहीं दूसरी ओर,वह अनेक सामाजिक और पारिवारिक विडम्बनाओं से मुक्त नहीं हो पा रहा है। वैश्वीकरण और बाजारवाद के इस माहौल में व्यक्ति की अपनी जीवनशैली में निरंतर बदलाव आता जा रहा है। रिश्तों,नातों की परिभाषायें बदलती जा रही है और मानवीय चरित्र मुखौटाधारी होता जा रहा है।

? राजेन्द्र जोशी


आखिर बोझ क्यों हैं लड़कियाँ ?

       ड़कियों को बोझ समझने की प्रवृत्ति में कमी क्यों नहीं आ रही है? प्रसिध्द मेडिकल पत्रिका लाँसेट का अनुमान है कि भारत में प्रतिवर्ष 5,00,000से अधिक कन्या-भ्रूण हत्याऐं होती हैं। हालिया जनगणना से यह भी साफ हो चुका है कि इसके पीछे गरीबी नहीं बल्कि दू्रषित मानसिकता ही मुख्य कारण है। सच्चाई तो यह है कि अति गरीबों की बेटियाँ उनके लिए बोझ हैं ही नहीं क्योंकि वहाँ पेट भरने की दैनिक जुगत के आगे दहेज या खर्चीली शादी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। एक भयावह तथ्य यह भी सामने आ रहा है कि देश के जिन दक्षिणी राज्यों में लड़कियों की सामाजिक स्थिति शुरु से ही दमदार थी

    

? सुनील अमर


शराब तो शराब है,

वह अपना नशा दिखाती ही है।

     ध्यप्रदेश सरकार द्वारा चलाये जा रहे बेटी बचाओ अभियान एवं लाड़ली लक्ष्मी योजना एक सराहनीय शुरूआत है। इस अभियान ने मध्यप्रदेश को देश में एक अलग पहचान दिलाई है। लेकिन इस अभियान के सभी लक्ष्य तब तक प्राप्त नही हो सकते जब तक कि देश में बेटियों पर होने वाले अत्याचार बंद नही हो जाते। इस अत्याचार की अहम वजह शराब है। शराब के कारण आज प्रदेश में कई बेटियाँ बदतर जीवन जीने को मजबूर है। शराब ने युवा वर्ग से लेकर स्कूल कॉलेज के छात्र-छात्राओं को भी अपनी गिरत में ले रखा है।

? जे.पी.शर्मा

(लेखक जिला न्यायालय राजगढ़, म.प्र. में अधिवक्ता है)


जलवायु परिवर्तन :

अब तो चेत जाएॅ

    सारी दुनिया में मौसम की हाहाकार है। जहॉ हमारे देश में पहले आषाढ़ सूखा गया अब श्रावण मास भी सूखा ही समाप्ति की ओर है और देश के अधिकांश हिस्से को अब भी बर्षा का इंतजार है।

             सूरज अब भी मई जून की तरह तप रहा है। लेकिन वहीं पं बंगाल और असम बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहें है। मौसम की मार से देश का मौसम विभाग  भी हैरान हैं, और अपने अनुमानों को प्रतिदिन संशोधन करने मजबूर है। आम आदमी द्वारा मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी को मजाक के लहजे में लिया जा रहा है।

? डॉ. सुनील शर्मा


देश में घटते सैनिक :

बढ़ता संकट

     राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा में सेना की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। परन्तु सरकारें जवानों का सही मूल्यांकन नहीं कर पा रही हैं इसलिए एक ओर तो सेना से उनका मोहभंग हो रहा है और वे बेहतर जीवन की तलाश में अन्यत्र पलायन कर रहे हैं। दूसरी ओर,वर्तमान किशोर और युवा पीढ़ी में सैन्य-सेवा के प्रति रुझान में निरन्तर कमी आ रही है,यह चिन्ताजनक है। आर्थिक उदारीकरण के मौजूदा दौर में जहां व्यक्तिगत और सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा व्यापक हो चला है,मानवीय संसाधानों के अभाव और कम वेतन-भत्ते मिलने के कारण सेना की नौकरी छोड़ने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। विगत तीन वर्षों में लगभग 40,000 सुरक्षाकर्मी अपनी नौकरी छोड़ चुके हैं।।

? डॉ. गीता गुप्त


  23जुलाई2012

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