संस्करण: 23 दिसम्बर -2013

मध्यप्रदेश में फर्जीवाड़ों से

शिक्षा हुई दागदार

? डॉ. गीता गुप्त

        ह पहला अवसर नहीं है जब मध्यप्रदेश में शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार उजागर हुआ है। अलबत्ता जिस पैमाने में यह उजागर हुआ है,वह अवश्य चकित कर देने वाला है। पी.एम.टी.में घोटाला,बी.डी.एस.में घोटाला,व्यावसायिक परीक्षा मण्डल द्वारा आयोजित सरकारी नौकरियों की भर्ती परीक्षा में घोटाला,परीक्षा परिणामों में घोटाला,प्रावीण्य सूची में अप्रत्याशित घोटाला-क्या-क्या गिनवाया जाए? मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय सहित अन्य तकनीकी शिक्षा संस्थान भी फर्जीवाड़ा,रैगिंग और यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं के कारण कलंकित हो रहे हैं। यह बहुत लज्जास्पद है। तकनीकी शिक्षा में भ्रष्टाचार संस्थानों में प्रवेश की पात्रता परीक्षा से लेकर परीक्षा में फर्जीवाड़ा कर प्रावीण्य सूची तक पहुंच गया। यह शर्मनाक तो है ही,पर दु:खद अधिक है क्योंकि इसने जाने कितने मेधावी विद्यार्थियों का भविष्य अन्धकारमय कर दिया। जाने कितने युवाओं के स्वप्न चूर-चूर हो गए ! ईमानदारी से पढ़ाई कर डॉक्टर बनने या शासकीय सेवा में जाने की इच्छा रखने वाले कितने युवाओं की मेहनत पर पानी फिर गया ?

                जबकि पूरे देश में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर चिन्ता व्याप्त है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तक स्वीकार कर चुके हैं कि भारत में स्तरीय शिक्षा और उत्कृष्ट कोटि के शिक्षक दोनों का घोर अभाव है। मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में शिक्षकों की नियुक्ति में उजागर फर्जीवाड़े से यही सिध्द होता है कि राजनेताओं को प्रदेश की खोखली होती नींव की बिल्बुल परवाह नहीं है। तभी तो उनकी छत्रछाया में शिक्षा में भ्रष्टाचार पनपता और फूलता-फलता रहा। फर्जीवाड़े से बने डॉक्टर, अफसर, शिक्षक कैसे ईमानदार रह सकते हैं ? 65 लाख या 75 लाख रिश्वत देकर डॉक्टर बनने वाले अपनी कमाई की चिन्ता करेंगे या ईमानदारीपूर्वक मरीजों की सेवा करेंगे ? यही बात रिश्वत देकर बने अफसरों, कर्मचारियं और शिक्षकों पर भी लागू होती है।

                एक ज़माना था जब बेसिक ट्रेनिंग कोर्स के लिए जिला स्तर पर ही परीक्षा होती थी। उसमें उत्तीर्ण अभ्यर्थी शिक्षक पद के लिए दो वर्षीय प्रशिक्षण का पात्र माना जाता था। प्रशिक्षण के द्वितीय वर्ष में उसे (मामूली छात्रवृत्ति सहित)  किसी विद्यालय में नियुक्ति दी जाती थी ताकि वह व्यावहारिक प्रशिक्षण भी प्राप्त कर अपनी योग्यता सिध्द कर सके। तदुपरान्त शिक्षक की स्थायी नियुक्ति होती थी। यह व्यवस्थ दुरुस्त थी क्योंकि इसमें भावी शिक्षक को विधिवत प्रशिक्षण लेना पड़ता था। अत: न भ्रष्टाचार की गुंजायश थी, न अयोग्यता की समस्या। अब तो बी.टी. बी.एड, डी.एड, जैसी डिग्रिया बिकाऊ हैं, आसानी से खरीदी जा सकती है। शिक्षकों को प्रशिक्षण लेने की जरूरत ही नहीं। यही नहीं, शिक्षकों की कई श्रेणियां बना दी गई हैं जिनपर संविदा नियुक्ति (स्थायी नहीं) के लिए व्यापक परीक्षाएं आयोजित करता है। स्थायीकरण तो बहुत बाद की प्रक्रिया होती है। इसी परीक्षा में दो से पांच लाख रुपये वसूल कर शिक्षक बनाने का फर्जीवाड़ा सामने आया है। कहते हैं कि यह सिलसिला 2004 से चला आ रहा है। तो कल्पना की जा सकती है कि व्यापक के भ्रष्ट अधिकारियों ने कितनी चालाकी से सारा खेल खेला। अब जाकर एस.टी.एफ. ने राजभवन के ओ.एस.डी. सहित 130 लोगों को आरोपी बनाया है मगर दो मुख्य कथित आरोपी खनन कारोबारी सु धीर शर्मा और शिक्षामंत्री के ओ.एस.डी. ओ.पी. शुक्ला फरार है। यह भी संयोग ही है कि विधानसभा चुनाव में पूर्व शिक्षामंत्री पराजित हो गए अन्यथा तस्वीर का रुख कुछ और ही होता।

                बहरहाल, शिक्षा जगत से जुड़े सारे उजागर प्रकरण घोर निराशाजनक हैं। अभी भोपाल के निफ्ट और मानसरोवर नर्सिंग कॉलेज की छात्राओं के यौन उत्पीड़न का मामला  भी सुर्खियों में है। ऐसे में, सचमुच यह चिन्ता की बात है कि लड़कियां कहां पढ़ने जाएं, जब वे शिक्षा संस्थान में ही सुरक्षित नहीं हैं ? संस्थान के प्रबं धाक, प्रशासक और शिक्षक ही दुराचार में लिप्त हो तो शिक्षा की पवित्रता कैसे कायम रहेगी ? फैशन तकनीक संस्थान के अधिकारी अभद्रता को फैशन के क्षेत्र में सामान्य व्यवहार मानते हैं और नर्सिंग कॉलेज में शिक्षक पास-फेल के नाम पर यौन शोषण को सहज अधिकार मानते हैं तो इसके लिए कौन दोषी है ?

               आज शिक्षा की दुर्दशा के लिए शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, शिक्षा संस्थान सभी दोषी हैं पर सर्वाधिक दोषी वह व्यवस्था है जो शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप को अनिवार्य बनाती है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। मगर अभिभावक सिर्फ महंगाई का रोना रोते हैं। स्तरहीन शिक्षा, संसाधनविहीन संस्थान, कुप्रबंधन, अयोग्य शिक्षक आदि बिन्दु उनकी चिन्ता में शामिल नहीं हैं। शिक्षक सिर्फ वेतन की चिन्ता करते हैं। शिक्षा-व्यवस्था, पाठयक्रम और परीक्षा पध्दति की कमियों आदि से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। विद्यार्थी सिर्फ डिग्री के लिए चिन्तित हैं उनमें ज्ञान-पिपासा प्राय: दृष्टिगत नहीं होती। ऐसे में उपजी भौतिकता प्र धान मानसिकता शिक्षा को कलंकित कर रही है।

               प्रश्न कई और बहुत गम्भीर है। विद्यार्थी अनुभवहीन और मानसिक दृष्टि से अपरिपक्व हो सकते हैं। लेकिन  धान के बल पर अपनी सन्तान के लिए मेडिकल शिक्षा की सीट खरीदने वाले को क्या कहेंगे ? कायदे से तो वे भी दोषी है, उन्हें भी जेल भेजा जाना चाहिए। रिश्वत देना और लेना दोनों ही कानूनन अपरा धा हैं। निफ्ट में यौन उत्पीड़न के आरोपी अधिकारी बसन्त कोठारी का भोपाल से जोधपुर तबादला कर दिया जाना और व्यावसायिक परीक्षा मण्डल से भ्रष्ट परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी को हटाकर भोपाल के प्रतिष्ठित महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय में स्थानांतरित कर दिया जाना यही सिध्दा कर करता है कि शिक्षा के प्रति हमारी सरकारी व्यवस्था उदासीन ही नहीं, संवेदनहीन भी है।

               चूंकि प्रदेश भर से शिक्षा में फर्जीवाड़े सामने आ रहे हैं और राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुला धिपति होते हैं, उनके समक्ष इन विसंगतियों के निराकरण की गंभीर चुनौती है। यह चुनौती सरकार के लिए भी है। इसलिए कि शिक्षा जीवन की बुनियाद होती है और यह कदापि कलंकित या कमजोर नहीं होनी चाहिए। जो भी इसे दागदार बना रहे हैं उन्हें कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए और ऐसी पारदर्शितापूर्ण व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे शिक्षा की गरिमा कभी धूमिल न हो।

? डॉ. गीता गुप्त