संस्करण: 23मार्च-2009

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आतंकवादी से खतरनाक दंगाई
'वैध' और 'अवैध' हिंसा पर एक नज़री
       भारतीय समाज में हिंसा का प्रश्न विभिन्न स्तरों पर उठता रहता है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि दरअसल हम इस मुद्दे पर कथनी और करनी में एक अन्तराल  >सुभाष गाताड़े


दोष वरूण का नहीं उसकी पार्टी का है
        रूण गांधी ने अपने चुनाव क्षेत्र की आमसभा में जो कुछ विवादास्पद कहा उसे एक पुरानी कहावत के अनुसार इस तरह कहा जा सकता है कि 'नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है'।>वीरेंद्र जैन


संघ सुप्रीमो कृपया देश को मध्ययुग में न ले जाएं

            राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बस चले तो वह हमारे देश को 10वीं व 11वीं सदी के वातावरण में जीने को मज़बूर कर दे। अभी हाल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर  ।>एल.एस.हरदेनिया


चुनाव प्रचार में मुखौटा पड़ गया मुद्दों का टोटा

         लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचनों में विभिन्न राजनैतिक दल और उनके नेतागण मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए कई तरह के धातकरम करने लग गये हैं।  >राजेंद्र जोशी


चुनाव में संहिता का उल्लंघन
    भारत निर्वाचन आयोग द्वारा बनाये आचार संहिता का खुलेआम उल्लंघन करने में बाज नहीं आते राजनीतिक दल। परोक्ष रूप से नौकरशाह भी निहित स्वार्थ के >अंजनी कुमार झा


रैगिंग : एक सामाजिक अपराध

    धार कुछ वर्षों से भारतीय विद्यार्थियों में बढ़ती हिंसा उग्र रूप धारण कर रही है। जिससे शैक्षणिक संस्थानों का वातावरण अविश्वसनीय रूप से भयावह हो चला है। >डॉ. गीता गुप्त


स्त्रियां कब तक इस कदर जलती रहेंगी ?

      भारत में सबसे अधिक युवा महिलाएं जल कर मरती हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर का मेडिकल जर्नल 'लानसेट' में छपे ताजे अधययन की रिपोर्ट चर्चा का विषय बनी है। मालूम हो कि जलने की इन घटनाओं में ''रसोई की दुर्घटनाएं,  >अंजली सिन्हा


जेनेटिकली मोडिफाइड (जी.एम) फसलों का भयानक सच
       जिस तरह हम पौराणिक आख्यानों में सृष्टि के सृजनकर्ता शिव द्वारा दैत्य भस्मासुर को दिए वरदान से सृष्टि के अस्तित्व पैदा हुए संकट की बातें सुनते आए है, बिलकुल वैसा ही संकट आज  >डॉ. सुनील शर्मा


''कैसे कर्जमुक्त हो किसान''

      भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ कृषकों की संख्या कुल श्रम बल का 25.7 प्रतिशत है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान वर्ष 1951-52 में 55 प्रतिशत से घट कर वर्ष 2008 में भले ही 20 प्रतिशत रह >स्वाति शर्मा


अतिथि भिक्षुक भव:
      शीर्षक निश्चित रूप से आपको चौंका सकता है। पर सच यही है कि आज अतिथि हमारे लिए चाहे कुछ और हो, पर देवता तो है ही नहीं। उसकी स्थिति किसी भिखारी से कम नहीं होत  >डॉ. महेश परिमल


कब आएगी मेट्रो ट्रेन

     भी बड़ा शहर बना, फिर महानगर की कतार में खड़ा हुआ भोपाल शहर। अतिक्रमण का दर्द भोगने के बाद अब शहर की सुंदरता राजनेताओं के माथे की लकीर बन गयी है। हमारे राजनेता पहले भोपाल को पेरिस बनान >निलय श्रीवास्तव



 23मार्च 2009

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