संस्करण: 23मार्च-2009

''कैसे कर्जमुक्त  हो किसान''

 

 

 

स्वाति शर्मा

       भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ कृषकों की संख्या कुल श्रम बल का 25.7 प्रतिशत है। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान वर्ष 1951-52 में 55 प्रतिशत से घट कर वर्ष 2008 में भले ही 20 प्रतिशत रह गया हो, लेकिन भारतीय कृषि आज भी देश की दो तिहाई से अधिक जनसंख्या के जीवन का आधार है। लेकिन कृषि की रीढ़ की हड्डी समझे जाने वाले किसान की स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं है। सदियों से जमींदारों के चंगुल में फंसा किसान आजादी के बाद अपनी भूमि का स्वामी भले ही हो गया हो, लेकिन उसे स्थानीय साहूकारों से अभी भी मुक्ति नहीं मिल सकी है। एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार देश के आधो कृषक परिवार ऋणग्रस्त हैं। इस सर्वेक्षण में ग्रामीण क्षेत्र के केवल उन परिवारों को शामिल किया गया है, जिनके पास स्वयं की खेती योग्य भूमि है। यदि इसमें कृषि श्रमिकों के परिवारों को भी शामिल कर लिया जाता है, तो ऋणग्रस्त परिवारों का अनुपात और भी ऊंचा होता।

''भारतीय कृषक ऋण में ही जन्म लेता है, ऋण में ही जीवनयापन करता है और ऋण में ही मर जाता है।'' यह टिप्पणी जितनी सही स्वतंत्रता के पूर्व थी, आज भी ज्यादा गलत नहीं है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन द्वारा कराए गए सर्वेक्षण से पता चला है कि देश के आधो से अधिक ऋणग्रस्त कृषक परिवार उत्तर प्रदेश, आंधार प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल तथा मधय प्रदेश से हैं। जनसंख्या की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य होने के नाते ऋणग्रस्त कृषक परिवारों की सर्वाधिक संख्यास उत्तरप्रदेश में ही है। इसके बाद आंधार प्रदेश, महाराष्ट्र, पं. बंगाल तथा मधयप्रदेश का स्थान आता है। तमिलनाडु में अत्याधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाए जाने की होड़ कृषकों में है और वे कर्ज के गर्त में फंसते जा रहे है। कृषि के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल करने वाले राज्य पंजाब में भी 65.4 प्रतिशत कृषक परिवार ऋणग्रस्त हैं, वहीं उसके पड़ोसी राज्य हरियाणा में 40.2 प्रतिशत तथा राजस्थान में 52.4 प्रतिशत कृषक परिवार ऋणग्रस्त हैं। इस सर्वेक्षण में प्रमुख तथ्य यह है कि निर्धानता व ऋणग्रस्तता के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंधा नहीं है। यदि ऐसा होता तो 42.0 प्रतिशत निर्धानता अनुपात वाले राज्य बिहार में कृषक ऋणग्रस्तता का स्तर नीचा न होता।

कृषक ऋणग्रस्तता के मामले में एक तथ्य यह भी है कि हरित क्रांति के बाद से कृषि के आधुनिकीकरण तथा वैज्ञानिकीकरण ने कृषि उत्पादन की लागत को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। उत्पादकता बढ़ाने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ऊंची कीमत पर बेचे जा रहे समुन्नत बीजों तथा उनसे उपजी फसल को कीटों तथा बीमारियों से बचाने के लिए ऊंची कीमतों वाले कीटनाशकों तथा उर्वरकों को खरीदने के लिए कृषकों को ऋण लेने के लिए बाधय होना पड़ा है इसीलिए कृषि विकास में अग्रणी रहे राज्यों-पंजाब, आंधा्रप्रदेश, तमिलनाडु आदि के गर्त में डूबे किसानों द्वारा महंगे प्रयोग सीमित मात्रा में ही किए जा रहे हैं इसीलिए ऋणग्रस्तता का स्तर नीचा है। एक कारण यह भी है कि बैंकों तथा सहकारी साख समितियों से ऋण प्राप्त न करने वाले किसान अंतत: निजी स्रोतों, (महाजनों, साहूकारों, बड़े किसानों) से ऋण लेते हैं, जिसका पता आसानी से सरकारी सर्वेक्षणों में नहीं चल पाता।

ग्रामीण क्षेत्रों के कृषकों, कृषि श्रमिकों, भूमिहीन मजदूरों में व्याप्त निर्धानता का एक प्रमुख कारण उनमें व्याप्त बड़े पैमाने की ऋणग्रस्तता रही है। बैंकों के राष्ट्रीयकरण से पहले अधिकांश ग्रामीणों को अपनी प्रतिवर्ष स्थानीय साहूकारों आदि से ॠण लेना पड़ता था। जिसकी ब्याज की दरें 24 प्रतिशत से 62.5 प्रतिशत वार्षिक तक ऊंची होती थीं। यही कारण था कि एक बार ऋण लेने के बाद वे इससे उभर नहीं पाते थे। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद सहकारी साख ढांचे को मजबूत किया गया। चौथी पंचवर्षीय योजना के अंतिम वर्ष में सरकार ने सीमांत कृषक व कृषि श्रमिक योजना तथा लघु कृषक विकास अभिकरण योजनाएं प्रारंभ की जिनमें कृषकों को बैल, भैंस, गाय, बकरी आदि खरीदने, पंपिग सैट लगवाने, कृषि औजार व उपकरण खरीदने के लिए मधयकालीन ऋण वितरित किए गए साथ ही रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, बीज आदि क्रय करने के लिए फसली ऋण वितरित किए गए। इन ऋणों पर ब्याज की दर औसतन 12 प्रतिशत थी, जो निजी स्रोतों से एक तिहाई से भी कम थी। इससे कृषकों के ऋणभार में कमी आई। इसके बाद भी पंचवर्षीय योजनाओं में एकीकृत ग्राम्य विकास कार्यक्रम, गंगा कल्याण योजना, समुन्नत औजार वितरण योजना आदि में भी कृषकों व अन्य ग्रामीण निर्धानों को संस्थागत साख का वितरण जारी रहा। कृषकों को अति सुविधााजनक शर्तों पर फसली ऋण मुहैया कराने की एक अभिनव योजना किसान क्रेडिट कार्ड योजना है। इसका परिचालन राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक द्वारा किया जा रहा है। ये क्रेडिट कार्ड वाणिज्यिक बैंकों, सहकारी बैंकों तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों द्वारा जारी किए जाते हैं।

सरकार ने अपने स्तर से ग्रामीण ऋणग्रस्तता को कम करने के लिए अनेक उपाय किए हैं, जिनमें ऋण मेलों के आयोजन से लेकर कृषकों के पुराने ऋणों को माफ किए जाने तक की योजनाएँ हैं, लेकिन इससे किसानों की ऋणग्रस्तता के स्तर में उतनी कमी नहीं आई है। इसके पीछे कुछ व्यवहारिक कठिनाइयाँ हैं, जिनका निराकरण किया जाना जरूरी है। उदा. के लिए किसानों को खेती योग्य भूमि के आधार पर उत्पादक ऋण प्राप्त होता है, जो उनकी समस्त साख आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाता। विशेष रूप से मकान का निर्माण व मरम्मत, विवाह व अन्य समारोह, बच्चों की शिक्षा, त्योहारों आदि के खर्च को पूरा करने के लिए उन्हें स्थानीय साहूकारों से ऊंची ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ता है। कई बार ऋण वसूली की दिनांक ऐसी होती है कि इसे पूरा करने हेतु किसानों को अपने उत्पाद किसी भी कीमत पर बेचने हेतु बाधय होना पड़ता है।

भारत सरकार, राज्य सरकारें, रिजर्व बैंक या अन्य सहयोगी संस्थाएं चाहे जितने ही दावे क्यों न कर लें, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निर्धानता व्याप्त है। इसे दूर करने के लिए ऐसे उपाय अपनाए जाने की ज़रूरत है जो कृषकों, भूमिहीन कृषि श्रमिकों एवं अन्य ग्रामीणों की सभी आवश्यकताओं को समझा जाए तथा उन्हें शहरी एवं गैर कृषि उपभोक्ताओं के समकक्ष सस्ती साख मुहैया कराकर स्थानीय साहूकारों के चंगुल से मुक्ति दिलाई जाए।

 


स्वाति शर्मा