संस्करण: 23मार्च-2009

जेनेटिकली मोडिफाइड (जी.एम) फसलों का भयानक सच


डॉ. सुनील शर्मा

जिस तरह हम पौराणिक आख्यानों में सृष्टि के सृजनकर्ता शिव द्वारा दैत्य भस्मासुर को दिए वरदान से सृष्टि के अस्तित्व पैदा हुए संकट की बातें सुनते आए है, बिलकुल वैसा ही संकट आज दुनिया के सामने वर्तमान के सृजनकर्ता विज्ञान द्वारा सृजित जी.एम यानि की जेनिटकली मोडिफाईड फसलों के माधयम से आ खड़ा हुआ है।प्रारम्भ में जिन जेनिटकली मोडिफाईड फसलों को कृषि विशेषज्ञ एवं वैज्ञानिक दुनिया में खाद्यान्न संकट के हल तथा कुपोषण से मुक्ति का साधान ,भूमि की उर्वरकता कम होने तथा ग्लोबल वार्मिंग की वजह से घटती उत्पादकता एवं घटते जल संसाधानों तथा बढ़ती मांग में सामंजस्य बनाये रखने के लिए विज्ञान का वरदान मान रहे थे।वही वैज्ञानिक इन्हीं जी.एम फसलों के मानव स्वाथ्य एवं पर्यावरण विरोधी परिणामों से हतप्रभ है। वास्तव में कुछ मामलों में जहाँ उत्पादकता की दृष्टि से जी.एम फसलें काफी लाभदायक सिद्व हो रहीं वहीं मानव स्वास्थ एवं पर्यावरण के लिए काफी खतरनाक सिद्व हुई है जिससे दुनिया भर के पर्यावरणविद् और कृषि वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग इन जेनिटकली मोडिफाईड फसलों का विरोधा कर रहा है। इस संदर्भ में अभी हाल ही में नई दिल्ली में विमोचित जेफरी एम स्मिथ की पुस्तक 'जेनेटिक राउलेट' यानि कि दाँत वाली जीन काफी चर्चित हो रही है इस किताब में जेफरी एम स्मिथ ने जेनेटिकली मोडिफाइड आर्गेनिज्म के मानव व पर्यावरण पर पड़ रहे कुप्रभावों का विवरण विश्व के पैंसठ वरिष्ठ वैज्ञानिको द्वारा किए गए प्रयोगों के आधार पर दिया है,इसके अनुसार चूहों पर किये परीक्षणों से सिद्व होता है कि जी.एम.उत्पादों से उनमें एलर्जी,हार्मोनिक गड़बड़ी,श्वसन तंत्र संबंधी बीमारियाँ पैदा हुई, कई चुहों की किडनी विकसित नहीं हो पाई है तथा कई विकलांग पैदा हुए। परीक्षणों से स्पष्ट हुआ है कि जी.एम. फसलें जहरीली,रोग प्रतिरोधाकता का हृस करने वाली तथा नपुंसकता के दोष उत्पन्न करेंगी। इन वैज्ञानिकों के अधययन से यह बात भी स्पष्ट है कि जेनिटकली मोडिफाईड फसलों की उत्पादकता भी नान जेनिटकली मोडिफाईड फसलों की तुलना में कम है।हांगकांग में उत्पन्न जेनेटिकली मोडिफाइड पपीते के हानिकारक परिणामों का अधययन वैज्ञानिकों ने किया है।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी इनके अनेक कुप्रभाव सामने आए है, जैसे वैज्ञानिकों को संभावना हैे कि क्रास परागण से उत्पन्न जैविक प्रदूषण से इन पौधोमें विद्यमान प्रतिरोधी बी.टी.जीन दूसरे लाभदायक नानटाग्रेट कीटों को भी मार देंगे, इन पौधो में मौजूद तृणनाशी प्रतिरोधाता वाले पौधोके परागकण हवा द्वारा उड़ कर दूसरे सामान्य बिना प्रतिरोधाता वाले पौधोपर जाने पर आक्रामक, स्थायी और अधिक शक्तिशाली खरपतवार पैदा करेंगे। इन पराजीनी पौधोके वायरस स्त्रोत से प्राप्त डी.एन.ए. खंड विभिन्न रोगो के पैथोजेनिक वॉयरस के डी.एन.ए. खंड से संकरण कर अधिक आक्रामक वॉयरस पैदा करेंगे जो आगे के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दें,ये आशंकायें अकारण नहीं हैं, क्योंकि ट्रांसजीनी पौधो में व्याप्त अधिकतर जीव वॉयरस तथा वैक्टीरिया से प्राप्त किये गये होते हें जिनमें से कुछ तो रोग पैदा करने वाले भी हैं। इसके अलावा बी.टी.जीन युक्त फसलों के कारण  जैव विविधाता को भारी खतरा है क्योंकि कोई विशेष प्रकार का वॉयरस पैदा होकर किसी विशिष्ट जीव प्रजाति को नष्ट कर सकता है। ज्यादातर ट्रांसजैनिक फसलों में ट्रेटर या टर्मिनेटर जीन होते हैं। जिसकी वजह से इन फसलों से प्राप्त बीज पुन: फसल उगाने के काम में नहीं लाये जा सकते।इस तरह किसानों को हर साल नई फसल के नये बीज खरीदने पड़ेंगे और फसल की उत्पादन लागत में भारी वृध्दि होगी। विभिन्न कंपनियों द्वारा उत्पादित जी.एम. बीज. किसी विशिष्ट उर्वरक और कीटनाशक को ही स्वीकार करते हें। इस तरह जी.एम. फसले कृषि उत्पादन में एकाधिकारवाद को बढ़ावा देंगीं

वास्तव मे आज से लगभग 15 साल पहले विकसित किये गए इन जी.एम. बीजों को अब तक दुनिया के सिर्फ 22 देशों ने अपने यहां खेती में उपयोग करने की अनुमति दी है तथा विरोधा और भय के बीच दुनिया भर की कुल खेती की मात्र 1.5 फीसदी पर ही इन बीजों के जरिए खेती होती है। विश्व के अनेक देशों में इन बीजों के परीक्षण और खेती में उपयोग पर प्रतिबंधा भी लगाया है।फिर भी हमारे देश में इनके कुप्रभावों पर विशेष रूप से गौर नहीं किया जा रहा है। यह बात विचारणीय है कि जिस बीज से फल के अंदर कीटनाशक पैदा हो सकता है तो उससे उत्पन्न चीजों को खाने से इंसान के शरीर में भी कीटनाशक पैदा हो सकता हैं। जी.एम. फसलों के समर्थक इनके सुरक्षित होने के संबंधा में कितना ही ढ़िढोरा क्यों ना पीटें परंतु दीर्घकालिक रूप से इनके परिणाम अच्छे नहीं होगें। हमें अपनी खाद्य आपूर्ति जी.एम फसलों के सहारे सुनिश्चित करने का रास्ता नहीं तलाशना चाहिए क्योंकि यह मूलत: प्रकृति विरोधी कार्य है और प्रकृति का विरोधा सुरक्षा नहीं वरन् विनाश का आमंत्रण होता है।
 

 


डॉ. सुनील शर्मा