संस्करण: 23मार्च-2009

स्त्रियां कब तक इस कदर जलती रहेंगी ?
 

 

 

अंजली सिन्हा

भारत में सबसे अधिक युवा महिलाएं जल कर मरती हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर का मेडिकल जर्नल 'लानसेट' में छपे ताजे अधययन की रिपोर्ट चर्चा का विषय बनी है। मालूम हो कि जलने की इन घटनाओं में ''रसोई की दुर्घटनाएं, आत्मदाह या घरेलू हिंसा के विभिन्न प्रकार'' शामिल रहते हैं। अधययन के मुताबिक 15 से 34 साल के उम्र की महिलाओं की संख्या मरनेवालों में सबसे अधिक है। अधययन के मुताबिक 1.63 लाख महिलाएं सालाना जल कर मरती है जो कि सालाना सभी मौतों का 2 फीसदी है और इसमें 1.06 लाख महिलाएं युवा हैं। अगर हम भारतीय पुलिस के आंकड़ों पर गौर करें जो 'नेशनल क्राइम रेकार्ड ब्युरो' के आंकड़ों पर आधारित होते हैं तो पता चलता है कि इसमें मौतों की संख्या काफी कम बतायी गयी है। ब्युरो के आंकड़ों की तुलना में 'लान्सेट' के आंकड़े छह गुना ज्यादा हैं।

अगर जल कर मरनेवालों में स्त्रियों एव पुरूषों का अनुपात देखें तो पता चलता है कि पुरूषों की तुलना में तीन गुना महिलाएं जल कर मरती हैं। इन मौतों में अधिकांश रसोई में होने वाली दुर्घटनाओं के कारण जलना बताया गया है जिसमें अलग-अलग कारणों से हत्या और आत्महत्या दोनों शामिल हैं। यह आंकड़ा वाकई अचम्भित करनेवाला है कि हमारे देश में इतनी बड़ी संख्या में महिलाएं जल कर मर जाती हैं और समाज में यह मुद्दा उद्वेलित करनेवाला मसला नहीं बन सका है। कहने के लिए हमारे यहां घरेलू हिंसा रोकने के लिए कानून बना है, लेकिन उसके लिए मामूली बजट आवण्टन दिखता है। अगर आंधार प्रदेश में यह आंकड़ा 10 करोड़ है तो पूरे मधयप्रदेश के लिए यह आंकड़ा 2.92 करोड़ रूपए है।

किसी भी अस्पताल के बर्न वार्ड का जायजा लेकर इस हक़ीकत से रूबरू हुआ जा सकता है कि वहां जली या झुलसी महिलाएं अधिक हैं या पुरूष और वे किस तरह जले हैं। पुरूष भी जलते हैं लेकिन उनके लिए अपना ही घर खतरा नहीं होता। वे कभी दंगों की आग में तो कभी जातीय हिंसा की चपेट में आकर जल जाते हैं।

कुछ साल पहले गुजरात से ख़बर आयी थी कि वहां हर साल 300 से अधिक महिलाओं की स्टोव फटने से मौतें हुई। इन आंकड़ों से चिन्तित किसी पत्राकार ने जब थोड़ी तहकीकात की तो पता चला कि यह मौतें एक ऐसे समयम हो रही हैं जब पम्प करनेवाले स्टोव की तुलना में -जिनके फटने की सम्भावना होती है - बाती स्टोव का प्रयोग होता है जिसके फटने की सम्भावना नहीं होती है। जाहिर है कि ये तमाम मौतें सन्देहास्पद मौतें कही जा सकती हैं जिसमें कहीं न कहीं उनके 'आत्मीय जनों' का हाथ दिख सकता है। ताज्जुब की बात यह है कि हर साल ऐसी घटनाओं के रेकार्ड पुलिस थानों में दर्ज होने के बावजूद उन्हें इन मौतों पर सन्देह नहीं होता और दुर्घटना का मामला दर्ज कर फाइल बन्द की जाती है। सन 2005 में जहां पूरे राज्य में 343 महिलाएं ऐसी दुर्घटना का शिकार हुईं तो वर्ष 2006 के नवम्बर माह तक यह आंकड़ा 330 को पार कर चुका था।

यह भी मुद्दा धयान देने लायक है कि हमारे समाज में जला देने या जल जाने की प्रथा इतनी प्रचलित कैसे हुई। मनु के विधान पर संचालित समाज में अपने पति की मौत के बाद उसकी चिता पर उसकी पत्नी खुद आत्महत्या कर लेती थी या परम्परा तथा रिवाज के नाम पर उसे जलने के लिए मजबूर किया जाता था। मुगलकाल में राजपुताने में जौहरव्रत का उल्लेख मिलता है जहां राजा की हार होने पर उसकी रानियां आग में कूद कर जौहार कर लेती थीं। निश्चित ही हमारे धार्मिक रीतिरिवाजों में कहीं इसकी स्वीकृति है जैसे हवन करना, होलिका जलाना आदि।

कहा जाता है कि कुछ का पीड़ा भरा जीवन तो जलने से खतम हो जाता है, लेकिन कुछ जो जलती तो नहीं है लेकिन विभिन्न प्रकार के उत्पीड़नों के चलते वह ठीक से जीती भी नहीं हैं। ऐसों का तो कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है। दहेज का ही नहीं बल्कि 'असुन्दर' होने का, बेटी पैदा करने का, घर से निकाले जाने का आदि कई प्रकार के उत्पीड़नों की वे शिकार होती हैं।

सोचनेवाली बात है कि यदि किसी व्यक्ति से किसी का तालमेल नहीं बैठता हो, जीवनशैली में लोग एक-दूसरे के साथ समझौता नहीं कर पा रहे हों तो अलग होने का रास्ता चुनने के बजाय हत्या जैसे अपराधा को लोग अंजाम क्यों देते हैं। तलाक की बढ़ती दर को लेकर अक्सर चिन्ता प्रकट की जाती है लेकिन यदि यह विकल्प नहीं होगा तो अपराधा और बढ़ेंगे। मारनेवाला व्यक्ति या तो अपने अपराधा के अंजाम पर पहले नहीं सोच पाता है या बच निकलने की गुंजाइश होती है इसलिए भी लोग ऐसा कर लेते हैं। लड़की को खुद तथा उसके मायके वालों को भी समस्या का अन्दाजा तो होता है लेकिन वे भी सही समाधान निकालने के बजाय इन्तजार करते हैं कि सब ठीक हो जाएगा।

दरअसल होना तो यही चाहिए कि ससुरालवालों की छोटी से छोटी मांग का प्रतिरोधा शुरू से हो, जबकि लड़कियां भी प्रयास करती हैं कि उनकी मांगें पूरी हों और उसके सहारे ससुराल में उनका मान-सम्मान बढ़े। उन्हें भी अब यह सीखने और जानने की जरूरत है कि उनका सम्मान और आत्मसम्मान इसी में है कि वे स्वयं अपनी घर-गृहस्थी चलानेलायक बनें, न इस घर (मायके) का आसरा रखें न उस घर (ससुराल) का। ऐसी स्थिति में यदि कोई ससुराली कुछ मांग करे तो उसे टके सा जवाब मिले और आइन्दा ऐसा सोचे भी न इसका भरपूर संकेत पहले ही मिल जाए।

लड़के भी जानबूझ कर अपने घरवालों के सामने स्पष्ट पक्ष नहीं लेते हैं या वे भी बिन मेहनत कुछ हासिल हो जाए इसी फिराक में रहते हैं, उन्हें भी पहले ही दिन पता चलना चाहिए कि उनकी हद क्या है !
 




अंजली सिन्हा