संस्करण: 23मार्च-2009

चुनाव में
संहिता का उल्लंघन
 

 

 


अंजनी कुमार झा

         भारत निर्वाचन आयोग द्वारा बनाये आचार संहिता का खुलेआम उल्लंघन करने में बाज नहीं आते राजनीतिक दल। परोक्ष रूप से नौकरशाह भी निहित स्वार्थ के कारण इस खेल में शामिल रहते हैं। मतदाताओं को रिझाने में विभिन्न दल तरह-तरह के हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं। मधयप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के फोटो बिजली बिलों में चिपकाकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का खेल भी कोई नया नहीं है। इससे पूर्व सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बांटे जा रहे राशन कार्ड में भी मुख्यमंत्री के फोटो को लेकर मचा बवाल अभी थमा भी नहीं था कि लोकसभा चुनाव में बिजली बिल में फोटों को लेकर कार्यवाही के साथ आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया है। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने जवाब तलब किया है। प्रदेश में ही सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन द्वारा सिवनी जिले में घड़ी बांटी जाने के बाद प्रकरण दर्ज किया गया है। वोटरों को कभी घड़ी तो कभी शराब, नोट, नाना प्रकार के प्रलोभन से अपनी तरफ खींचने की जी तोड़ कोशिश की जाती है। प्रगति रिपोर्ट, पूछताछ, गिरफ्तारी, दुष्प्रचार आदि के बाद भी कठोर कार्रवाई न हो पाने से नेता अपना काम कर चुके होते हैं। पुलिस प्रशासन व अदालत केवल खानपूर्ति ही करते दिखते हैं। तभी तो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने खिलाड़ियों को सम्मानित करने के बहाने नोट का माला पहनाया। विरोधा होने पर सम्मान को बात कहकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया। आचार-संहिता लागू होने के बाद भी सार्वजनिक मंचों से सत्तारूढ़ दलों के नेताओं के झूठे वायदों की फेहरिस्त बांचे जाते हैं। पीलीभीत संसदीय क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी वरूण गांधी द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान एक समुदाय विशेष के खिलाफ भड़काऊ भाषण को लेकर प्राथमिकी दर्ज की गई है। उनके खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 153(ए) और 188 तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। विवादित भाषण का मुख्य अंश है ''अगर कोई हिन्दू के खिलाफ उंगली उठायेगा, यह सोचेगा कि हिन्दू कमजोर है.... तो मैं गीता की कसम खाता हूँ मैं उनके हाथ कांट दूंगा।'' मामला तूल पकड़ने पर वरुण ने ऐसा बयान देने से इंकार करते हुए कहा कि वीडियो रिकार्डिंग में गलत दिखाया गया है। पीलीभीत से सटे रामपुर से चुनाव लड़ रहे पार्टी के राष्ट्रीय उपाधयक्ष मुख्तार अब्बार नकवी ने कहा कि साजिश के तहत अल्पसंख्यकों को भड़काया जा रहा है, ताकि मैं चुनाव हार जाऊं। इस बयान को लेकर नकवी और शहनवाज हुसैन एक हैं क्योंकि दोनों अल्पसंख्यक वोट के लिए लालायित रहते हैं। वोट बैंक को राजनीति के कारण आचार संहिता को कुचलना आम बात हो गयी है। बैंक फुट पर आयी भाजपा अपने प्रत्याशियों को केवल संयमित रहने की सलाह भर दे रही है। आदर्श आचार संहिता की उड़ रही धाज्जियों की भला किसे परवाह है। राजनीति इस तरह घुसपैठ कर गयी है कि यह कहना मुश्किल है कि कौन मर्यादित और कौन नहीं । चुनाव की आहट से पूर्व ही कलेक्टरों सहित अन्य महत्वपूर्ण अफसरों के तबादले कर सत्तारूढ़ दल लाभ लेने के सारे इंतजाम कर लेती है। अब तो ईवीएम मशीन से भी छेड़छाड़ की शिकायतें मिलने लगी हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि लोकतंत्र के साठ वर्ष बीतने के बावजूद कोई असरदायक कदम उठाये गये हो। चुनाव आयोग ने दो मार्च को आम चुनाव और तीन राज्यों उड़ीसा, आंधार प्रदेश और सिक्किम में विधानसभा चुनावों की घोषणा की थी। आचार संहिता लागू होने के केवल एक सप्ताह की छोटी अवधि में केवल गुजरात में ही उल्लंघन की 124 से ज्यादा शिकायतें दर्ज करायी गयीं। शातिर व धार्त किस्म के नेता भला ऐसे नियम-कानून से क्यों डरें। पकड़ में आने से बचने का रास्ता वे ढूंढ लेते हैं। अगर गिरफ्तारी हुई तो उसका भरपूर चुनावी लाभ लेकर खलनायक से नायक बन जाते हैं। यह लोकतंत्र के नियम का दुरूपयोग है। इस पर कड़ी पाबंदी लगनी चाहिए। बिहार के पुलिस महानिर्देशक डी. गौतम होली पर मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को बधाई देने पहुंचे तो इसकी शिकायत चुनाव आयोग में की गयी। बौखलायें नीतिश ने टिप्पणी की कि आचार संहिता लागू होने का मतलब यह नहीं कि सरकार अपना काम-काज बंद कर दे। छत्तीसगढ़ में पुलिस प्रमुख विश्वरंजन को आयोग ने पदमुक्त करने का आदेश दिया तो आईपीएस असोसिएशन ने रैली निकाली। आयोग के आदेश, निर्देश, नियम को राजनीतिक चश्मे से देखने को आदत बदलने की जरूरत है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि चुनाव निष्पक्ष, व शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो। केंद्र व राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं के प्रचार प्रसार पर रोक आयोग स्वस्थ मानसिकता के साथ लगाता है, ताकि मतदाता इन चकाचौंधा प्रचार तंत्रों को देख-सुनकर न भरमा जाये। विधानसभा चुनाव हो या संसदीय चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें खूब आती हैं। आयोग इस मामले में सख्त रवैया अपनाये, ताकि मतदान निर्बाधा गति से हो और मतदाता निष्पक्ष होकर अपने मत का प्रयोग कर सके। लंबे समय तक राजद, सपा, बसपा के अतिरिक्त टीडीपी, अन्नाद्रमुक, द्रमुक जैसी क्षेत्रीय पार्टियां सस्ते चावल, ससते मकान, कम दर पर ब्याज आदि का प्रलोभन देकर नागरिकों का मतिभ्रम करती रही है। इस पर भी आयोग को कड़ी लगाम लगाने की आवश्यकता है।

 

अंजनी कुमार झा