संस्करण: 23मार्च-2009

चुनाव प्रचार में मुखौटा
पड़ गया मुद्दों का टोटा



राजेंद्र जोशी

लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचनों में विभिन्न राजनैतिक दल और उनके नेतागण मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए कई तरह के धातकरम करने लग गये हैं। राजनीति में नैतिकता, मर्यादा, अनुशासन और निष्ठा जैसे शब्द तो अब निष्प्राण से हो गये हैं। राजनैतिक कलाबाजियां और पैतरें ही अब तो सहारा रह गये हैं मतदाताओं के बीच जाने के।

निर्वाचन के समय राजनैतिक पार्टियों द्वारा जारी किए जाने वाले घोषणापत्र तो अब मात्र रश्म अदायगी रह गये हैं। घोषणापत्रों में जिस तरह के मुद्दे शामिल किए जाते हैं उन्हें पढ़ने से तो लगता है कि ये राजनैतिक दल सत्ता में आते ही स्वर्ग को जमीन पर उतार लायेंगे, संपूर्ण व्यवस्था को एकदम दुरूस्त कर देंगे और समाज को स्वर्णिम बना देंगे। जनकल्याण और विकास के प्रस्तावित कामों की फेहरिस्त इतनी ज्यादा आकर्षक और लुभावनी होती है कि यदि ये सभी प्रस्ताव जमीन पर उतर जाय तो देश और प्रदेश स्वर्ग बन जाय। लेकिन सत्ता पर काबिज हो जाने के बाद सत्ताधाीश को पावर का ऐसा चस्का लग जाता है कि उसकी मदहोशी में वे जनता से किए वायदे, आश्वासन और संकल्पों को जूते की नोंक से कुचलते रहते हैं। कुछ इसी तरह की करतूतों और अपने विपरीत आचरण और व्यवहारों के कारण घोषणापत्र आम जनता की नज़र में झूठ के पुलिंदे साबित होते जा रहे हैं। राजनेताओं की कथनी और करनी में दिखाई दे रहे बड़े अंतर की वजह से उनके व्यक्तित्व का मतदाताओं पर कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ पाता है। बड़े राजनैतिक दलों के भीतर राजनीति की शुचिता के जो भाव होना चाहिए अब उनमें अभाव आता जा रहा है।

जब निर्वाचन-युध्द का मैदान तैयार होने लगता है तब पार्टियों और नेताओं में जनता के बीच अपनी छवि को उज्ज्वल दिखाने की प्रतिस्पधरा का दौर शुरू हो जाता है। अब वह समय आ गया है जब किसी राजनैतिक पार्टी में सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं के चेहरों की दम पर जनता को प्रभावित करने का माद्दा नहीं बचा है। ऐसे में राजनैतिक पार्टियां अपने बीच के किसी एक घोषित नेता के नाम पर मतदाताओं के आगे झोली फैलाकर उनसे वोट की भींख मांगने लगे हैं। स्वाभाविक है अपनी ही पार्टी में सर्वमान्य घोषित नेता देश और प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंच नहीं सकता, अत: उस नेता के मुखौटे बनाकर अपने समर्थकों के चेहरों पर लगाये जाने लगे हैं। यह सब इसलिए किया जाने लगा है कि दूर-दूर तक के लोग उस पार्टी के स्टार नेता का चेहरा अपने बीच में उपस्थित महसूस कर सके।

घोषणापत्रों के प्रति जनता में बढ़ते अविश्वास की वजह से विकास और कल्याण कार्यक्रमों की दम पर अब चुनाव लड़ना अप्रासंगिक हो गया है। ऐसे में नौटंकियों का ही सहारा बचा है। आम जनता पर वशीभूत मंत्र डालने के लिए सर्कसनुमा करतबों की भरमार देखी जाने लगी हैं। जिस तरह सर्कस में या नाटक मंडलियों में कोई मसखरा बीच बीच में उपस्थित होकर दर्शकों से तालियां पिटवाता रहता है, उसी तरह चुनावी मंच पर कुछ इसी तरह की कलाबाजियो में पारंगत नेता सभाओं में जनता से तालिया बटोरने का किरदार निभाने लगे हैं। कोई नेता डांस कर रहा है, कोई ढोलक, झांझ, मंजीरे बजाने लगता है, कोई लोकधुनों पर ठुमकियां भरने लगता है। कोई भजन गा रहा है, कोई लतीफे सुना रहा है, कोई किसी की नकल उतार रहा है। बड़ा अजीब दृश्य हो जाता है, निर्वाचन के दौरान नेताओं और दलों में प्रतिस्पधर्ओं के नाम पर। कभी कभी तो यह लगने लगता है कि चुनावी-समर का मैदान लाफ्टर चैलेंज का मंच बन गया है।

राजनैतिक मंच की सजावट में अब एक नया चलन शुरू हो गया है और वह है मुखौटा-प्रदर्शन। सुपर स्टार प्रचारकों के मुखौटे तैयार होने लगे हैं और ये जगह-जगह स्थानों पर प्रदर्शित किए जाने लगे हैं, जनता को....... बनाने के लिए। शायद ये सुपर स्टार इस भ्रम में हैं कि उनके मुखौटों का प्रभाव आम लोगों पर पड़ जायगा और वे जनता को अपने पक्ष में बटोरकर अपने 'रात्रि में जागने वाले पक्षी को' सीधा कर लेंगे। लगता है ये लोग अपने असली चेहरों की करतूतों से कुछ हद तक डरे और सहमें से हो गये हैं। उनके या इनके समर्थकों के मन में यह भ्रम भी पल रहा होता है कि जनता हमारे मुखौटे को ही असली समझकर रीझने लग जायगी।

मुखौटाधारियों को यह समझ लेना चाहिए कि यह 21 वीं सदी है और इसमें आज की पीढ़ी इतनी शार्प और चौकन्नी है कि वह असली और नकली का भेद खूब समझती है। वह यह भी समझती है कि मुखौटों की राजनीति के पीछे उद्देश्य क्या है और इसके पीछे किस तरह की स्वार्थ भावना छुपी होती है। मुखौटे भी किसी तरह से जन को मोहित करने के साधान नहीं हो सकते। ये मुखौटे नाटक के मंच पर ही शोभायमान लगते है जो मनोरंजन का एक बेहतर माधयम भर है।

 


 

राजेंद्र जोशी