संस्करण: 23मार्च-2009

अतिथि भिक्षुक भव:

 

 

 

डॉ. महेश परिमल

      शीर्षक निश्चित रूप से आपको चौंका सकता है। पर सच यही है कि आज अतिथि हमारे लिए चाहे कुछ और हो, पर देवता तो है ही नहीं। उसकी स्थिति किसी भिखारी से कम नहीं होती। आप कहेंगे, ये भी कोई बात हुई। अतिथि भला हमारे लिए भिखारी कैसे हो सकता है? हमारे देश की यह परंपरा है कि अतिथि को देवता की तरह पूजना चाहिए। इसे एक जुमला ही कहा जाएगा, क्योंकि आज अतिथि किसी परेशानी से कम नहीं है। पर यहाँ तो बात ही दूसरी है। शादी का मौसम आ गया है। लोगों का अतिथियों से सामना होने लगा है। कई लोग अतिथियों से परेशान भी हो जाते होंगे। पर कई लोग ऐसे भी हैं, जिनके हृदय में अतिथियों के लिए सम्मान होने के बाद भी आधानिक परंपराओं से इतने जकड़े हुए हैं कि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते। इसके लिए आपको वह घटना अवश्य बतानी पड़ेगी, जिसमें एक पत्र पाते ही एक मित्र के पैरों तले जमीन खिसक गई। हुआ यूँ कि बेटी की शादी की तैयारियाँ पूरे जोर-शोर के साथ चल रही थी। बेटी का पिता भी खुशी-खुशी सारे काम-काज देख रहा था। अचानक उसके हाथ में एक व्यक्ति एक कोरियर पत्र दे गया। पत्र देखकर वह बहुत ही खुश हुआ। ये तो मेरे बचपन के दोस्त का पत्र है। देखें, क्या लिख रहा है? आएगा तो अवश्य, पर शादी से पहले पत्र की आवश्यकता क्यों पड़ी? इन जिज्ञासाओं के साथ उसने पत्र खोला। पढ़ा और निढाल होकर पास ही एक कुर्सी पर बैठ गया। लोग चिंतित हो गए। भाग-दौड़ थम गई। लोग दौड़े-दौड़े आए, आखिर क्या हो गया? बेटी भी दौड़ती चली आई। उसने पिता को देखा। उनका चेहरा एकदम ही निस्तेज हो गया था। अवश्य ही कोई बुरी खबर आई है। पिता को पानी पिलाकर सांत्वना देने की कोशिश की गई। जिज्ञासावश बेटी ने पिता के हाथ में रखा पत्र पढ़ लिया, जो इस प्रकार था-

''तुम्हारी बेटी, नहीं, मेरी बेटी की शादी है, आऊँगा अवश्य आऊँगा। ऐसा कभी हो भी सकता है, भला मैं अपने परिवार के साथ न आऊँ। पर मेरे भाई, अगर तुमने शादी में बुफे सिस्टम रखा है, तो हमें माफ करना, क्योंकि भिखारी की तरह कतार में खड़े होकर भोजन करना हम इंसानों को शोभा नहीं देता। इस तरह से तुम हमारा सम्मान नहीं, अपमान ही करोगे। तुम मुझे सबके सामने दो थप्पड़ मार दोगे, तो इसे मैं तुम्हारा प्यार समझूँगा, पर लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करना मुझे ही नहीं, मेरे परिवार वालों को भी गवारा नहीं है, इसलिए क्षमा करना भाई, हम नहीं आ सकते।''

एक-एक करके सभी ने पत्र पढ़ा। सभी के चेहरे की हवाइयाँ उड़ी हुई थी। बात गलत तो नहीं थी, पर उस पर अमल कैसे किया जाए? अब तो सब-कुछ हो चुका है। बुफे तो होना ही है। आखिर ऐसा क्या है, इस सिस्टम में, जिस पर आज हम चर्चा करेंगे।  याद कर लो, किसी भी पार्टी का वह .श्य। दूल्हा-दुल्हन एक बड़े से हॉल में सजे-धाजे सबको अपनी मुस्कान बिखेर रहे हैं। लोग आ रहे हैं, फिर वहाँ पहुँचने लगे हैं, जहाँ भोजन की व्यवस्था है। छोटी-सी जगह, क्षमता से अधिक लोग। लखपति ही नहीं, करोड़पति भी एक प्लेट लिए कतार में खड़ा है। कई जगह तो मारा-मारी की स्थिति है। लोग टूट पड़े हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए कोई अलग से व्यवस्था नहीं। वे भी खड़े-खड़े भोजन कर रहे हैं। कुर्सियों की संख्या अपेक्षाकृत कम। कुल मिलाकर अफरा-तफरी का .श्य। जिसमें कोई संतुष्ट नहीं है। सभी इसे व्यवस्था को दोष दे रहे हैं और भोजन कर रहे हैं। क्या इसे गिध्दा भोज की संज्ञा नहीं दी जा सकती? जो बलशाली है, वह भरपेट भोजन कर पाएगा। आपने शायद इस ओर धयान नहीं दिया होगा कि पहली बार जब हम भोजन लेते हैं, तब सीधो हाथ से लेते हैं, पर दूसरी बार सारी सामग्री बाएँ हाथ से लेते हैं। क्या यह हमारी सभ्यता है?

मेरी बात कुछ-कुछ समझ में आ रही होगी। आपको बता दूँ कि बुफे डीनर के जन्म के पीछे मूलरूप से मानव की लोभवृत्ति है। यजमान चाहता है कि यहाँ आकर लोग कम खाएँ और बातें अधिक करें। मेहमान कम खाएँ, क्या यह भारतीय परंपरा है? संस्कार यजमान चाहता है कि मेरे यहाँ जो भी मेहमान आए, वह भोजन से पूरी तरह से तृप्त होकर जाए। इसके पीछै यही भावना है कि पहले हमारी यहाँ अतिथि को भोजन के लिए काफी मनुहार की जाती थी। लोग आग्रह कर-करके भोजन कराते थे। इसके पीछे उनकी भावना गलत नहीं थी। जिन्हें याद होगा, वे ये भी याद कर लें, कि भोजन के दौरान किस तरह से घर के बड़े-बुजुर्ग आकर मनुहार करते थे और पूछते थे कि भोजन कैसा बना है? कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई है? कितना अच्छा लगता था। अब इस बुफे डिनर में कहीं दिखती है मनुहार? किसने भोजन ग्रहण किया, किसने नहीं, इसकी जानकारी तो यजमान को कतई नहीं होती। वे तो केवल आवभगत में ही लगे रहते हैं। केटरिंग वाले को ठेका दे दिया है, वही देखेगा?

क्या घर में किसी मेहमान के आने पर हम उसे कहते हैं कि किचन में सब-कुछ रखा है, टेबल पर प्लेट पड़ी है, आपको जो अच्छा लगे, उसे ग्रहण कर लें। कोई भी स्वाभिमानी अतिथि इस तरह के व्यवहार को अपना अपमान ही समझेगा। इस तरह से बुफे डिनर में तो अतिथि का इससे भी अधिक अपमान होता है, इस पर कभी धयान दिया किसी ने? अपने बचपन के मित्र को भोजन के लिए लाइन पर खड़ा होते देखना किसे अच्छा लगता है? इस पर भला किसी ने सोचा? बुफे डिनर लेना हमारी संस्.ति में तो किसी तरह फीट नहीं बैठता। इससे चिकित्सा शास्त्र और धार्म के कितने नियम भंग होते हैं, इस पर किसी ने विचार किया? आर्य संस्कृति के अनुसार खड़े-खड़े तो भोजन कतई नहीं किया जाना चाहिए, खड़े-खड़े तो पशु ही भोजन करते हैं। चिकित्सा शास्त्र का मानना है कि आहार ग्रहण करने का श्रेष्ठ आसन पालथी मारकर बैठना ही सुखासन है। टेबल-कुर्सी पर बैठकर भोजन करने से वह ठीक से पचता नहीं है। इन हालात में जिन्हें हमने अपने यहाँ भोजन के लिए बुलाया है,उन्हें खड़े-खड़े भोजन कराकर हम उसकी अवहेलना ही तो कर रहे हैं। इस तरह की अवहेलना अब एक परंपरा का रूप ले चुकी है। इसका विरोधा करने का सामर्थ्य किसी में नहीं है।

आयुर्वेद कहता है कि भोजन के बाद पानी पीना ही नहीं चाहिए। उसे विष माना गया है। बुफे डिनर या लंच में भोजन के अंत में ही पानी मिलता है, तो क्या हम अतिथि को विष नहीं दे रहे हैं? जैन धार्म के अनुसार थाली धाकर वह पानी पी लेना चाहिए, ताकि जीव हिंसा के पाप से बचा जा सके। बुफे में जब थाली ही नहीं, तो फिर कैसा पाप? इस सिस्टम में यजमान की यह इच्छा ही नहीं होती कि मेहमान अधिक से अधिक भोजन ग्रहण करें। उसकी तो यही इच्छा होती है कि मेहमान कम से कम खाए। जब इस सिस्टम की जड़ों में ही कंजूसी है, तो फिर काहे का मेहमानवाजी। बंद करो ये ढकोसले! वैसे इस परंपरा को खत्म होने में काफी समय लगेगा। क्योंकि इस में लिप्त होकर जो यहाँ आकर एक बार भिखारी बन गया, वह चाहता है कि जिसने उसे भिखारी बनाया, आखिर वह भी तो कभी भिखारी बने। इसलिए वह भी अपने यहाँ बूफे डिनर की व्यवस्था करता है और शान से देखता है अपने यहाँ आए लोगों को, जिन्हें उसने भिखारी बनाया। बदले की परंपरा के कारण यह सब चल रहा है। आवश्यकता है ठोस कदमों की, जो इंसान के भीतर से उठें।

मुझे यह समझ में नहीं आता कि स्कूल के डोनेशन के खिलाफ एक होने वाले पालक इस बुफे डिनर के नाम पर एक क्यों नहीं हो पाते? इसके खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाते। क्यों नहीं, शादी से पहले यजमान को पत्र लिखते कि हमारा यदि सम्मान करने की दिल से इच्छा हो, तो बुफे लंच या डिनर मत रखना। अन्यथा हम नहीं आएँगे। कोई एक तो शुरुआत करे, फिर देखो, एक गलत परंपरा किस तरह से दम तोड़ती है? संभव है फिर हम नीचे पालथी मारकर बैठे हो, हमारे सामने एक चौकी पर बड़ी थाल पर विभिन्न भोजन सामग्री रखी हो और मनुहार के साथ घर के बड़े-बुजुर्ग हमें प्यार से भोजन करा रहे हों, हम तृप्त होकर वहाँ से उठ रहे हों। क्या इस तरह का दृश्य हमारी आज की पीढ़ी देख पाएगी भला?
 


डॉ. महेश परिमल