संस्करण: 23मार्च-2009

आतंकवादी से खतरनाक दंगाई
'वैध' और 'अवैध' हिंसा पर एक नज़री
 

सुभाष गाताड़े

भारतीय समाज में हिंसा का प्रश्न विभिन्न स्तरों पर उठता रहता है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि दरअसल हम इस मुद्दे पर कथनी और करनी में एक अन्तराल पाते हैं। हम ऐसे लोगों से अक्सर मिलते हैं जो औपचारिक तौर पर हर किस्म की हिंसा से घृणा करते मिलेंगे, हमारी संस्कृति की सहिष्णुता की कथित महान परम्परा के गुणगान करते मिलेंगे, लेकिन उसी सुर में वह जिसे 'वैधा' हिंसा कहा जाता है उसकी तरफदारी भी करते मिलेंगे। यही वह मानसिकता है जो एक तरफ बुध्द का गुणगान करती है और दूसरी तरफ राज्य द्वारा अपने कहे गये लोगों के खिलाफ बर्बर हिसा का महिमामण्डन करती है।

धयान देने योग्य बात है कि एक ऐसे मुल्क में जो अक्सर अहिंसा के महान पुजारी के यहां पैदा होने की बात करता है, एक किस्म की हिंसा न केवल वैधा समझी जाती है बल्कि उसे पवित्रता/दैवी स्थान भी प्राप्त है। प्राचीन काल से शूद्रों-अतिशूद्रों एवम स्त्रियों के खिलाफ हिंसा को न केवल धाार्मिक स्वीकृति प्राप्त है और आधाुनिकता के आगमन से इस परिस्थिति को बदला नहीं है। हिन्दुओं की पवित्र कही जानेवाली किताबों में तो फक्र के साथ इस बात का भी उल्लेख है कि 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति'। हिन्दोस्तां दुनिया का एकमात्र मुल्क कहा जा सकता है जहां सती प्रथा के नाम पर मृत पति की चिता पर पत्नी को जिन्दा जलाया जाता है और बाद में इस सतीमाता की पूजा की जाती है। अगर पहले के जमाने में नवजात बेटी को बर्बर ढंग से खतम किया जाता था तो आज के माता-पिता टेक्नोलोजी की तरक्की से फायदा उठाते हुए यौनकेन्द्रित गर्भपात तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। यह अकारण नहीं कि 21 वीं सदी में महाशक्ति बनने का इरादा रखनेवाला हिन्दोस्तां एक ऐसा पिछड़ा मुल्क है जहां 3 करोड 30 लाख महिलाएं 'गायब' हैं - अर्थात कोख में ही नष्ट कर दी गयी हैं या पैदा होने पर मार दी गयी हैं। निश्चित ही अगर हम अन्य धार्मों के कथनों एवम व्यवहार पर नज़र डालें तो पा सकते हैं कि उसमें भी इसी तरह अलग अलग कारणों से - कभी परधार्मी होने के नाम पर या कभी रिवाज़ तोड़ने के नाम पर - हिंसा का महिमामण्डन किया गया है।

'वैधा' हिंसा के यह सभी हिमायती 'आतंकवाद' की भर्त्सना करने में कोई संकोच नहीं करते, जो उनके हिसाब से 'अवैधा' हिंसा है। निश्चित तौर पर जिसे 'आतंकवाद' कहा जाता है वह 'वैधा' हिंसा के दायरे में नहीं आता। मगर इस पर किसी ने गौर नहीं किया होगा कि जिसे वैधा या अवैधा हिंसा समझा जाता है, इन दोनों के बीच की विभाजक रेखा बहुत पतली है। इस बात का आकलन करना मुश्किल होता है कि कब कौनसी हिंसा को 'आतंकवाद' के खांचे में डाला जाएगा और कब उससे अधिक पाशवी हिंसा को लोगों की 'स्वाभाविक प्रतिक्रिया' कह कर औचित्य प्रदान किया जाएगा और इस तरह वैधा हिंसा कहा जाएगा।

गौरतलब है कि जहां आतंकवाद का खतरा/दानव इतना सर्वव्यापी दिखता है, इस परिघटना की कोई सर्वानुमति सम्पन्न परिभाषा अभी गढ़ी जानी है। पिछले दिनों चर्चित वेबसाइट काउण्टरपंच डाट ओआरजी पर एक विशेषज्ञ ने उन 108 तरीकों को बताया था जिसके मार्फत इसे परिभाषित किया जा सकता है। निश्चित ही वह एक परिभाषा जो अधिक लोकप्रिय कही जा सकती है या जो सामाजिक सहजबोधा का हिस्सा समझी जा सकती है वह 'गैर-राज्य कारकों' को वरीयता प्रदान करती है और राज्य की कार्रवाइयों के प्रति मौन बरतती है। और इस तरह हम अपने आप को एक विचित्र स्थिति में पाते हैं जहां तमिल गुरिल्लों की हिंसक कार्रवाइयां या लादेन के अनुयायियों की हरकतें जहां 'आतंकवादी कार्रवाइयों' की श्रेणी में शुमार की जाती है, वहीं गाज़ा पट्टी में इस्त्राएली हुकूमत द्वारा किए गए अपराधो को 'अपनी सुरक्षा करने के नाम पर किए गए उपायों' की श्रेणी में शुमार किया जाता है। शायद ही कोई इन्हें 'राज्य आतंकवाद' का दर्जा देता है।

प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश के पैमाने पर हुई सिखविरोधी हिंसा अभी किसी को भूली नहीं होगी। इसके तहत आधिकारिक तौर पर अकेले दिल्ली में एक हजार से अधिक लोग मार दिए गए जब उन्मादी भीड़ ने निरपराधो के गले में जलते टायर फेंक कर उन्हें मार डाला था। हर कोई जानता है कि वह कोई स्वत:स्फूर्त हिंसा नहीं थी, वह एक संगठित योजनाबध्द हिंसा थी जिसकी अगुआई तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस ने की थी। इस जनसंहार को लेकर कई सारे जांच आयोगों की रिपोर्ट आ चुकी हैं। इनमें सबसे पहले प्रकाशित हुई थी 'हू आर द गिल्टी' अर्थात 'दोषी कौन' शीर्षक से प्रकाशित 'सिटिजन्स फॉर डेमोक्रेसी' की रिपोर्ट, जिसने स्पष्ट तौर पर कांग्रेस पार्टी और उसके कारिन्दों को इस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया था। आज इस बात को बहुत कम लोग याद करना चाहेंगे कि उन दिनों समाज के मुखर तबके ने 'स्वाभाविक प्रतिक्रिया' की दुहाई देते हुए इन उन्मादी तत्वों का ही अप्रत्यक्ष्य समर्थन किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी इस हिंसा को यह कह कर औचित्य प्रदान किया था कि 'जब पेड़ गिरते हैं तो धारती हिलती ही है।'

 

इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब तक हम सिखों के खिलाफ इस सुनियोजित हिंसा के दोषियों को एवम असली साजिशकर्ताओं को दण्डित नहीं करते तब तक इसी तर्क को बार-बार दोहराया जाता रहेगा और वह मोदी सरीके लोगों को वर्ष 2002 में अल्पसंख्यकों के खिलाफ की गयी हिंसा को 'क्रिया-प्रतिक्रिया' के तर्क में जायज ठहराने की हिम्मत प्रदान करेगा।

अब उड़िसा को देखें, जहां लम्बे समय तक ईसाईविरोधी हिंसा का दौर जारी रहा। विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े एक सन्त लक्ष्मणानन्द सरस्वती की हत्या के बाद ईसाइयों के खिलाफ संगठित हिंसा का यह सिलसिला शुरू हुआ था। पचास हजार से अधिक लोगों को अपने मुल्क के अन्दर ही शरणार्थी बनानेवाले, तीन दर्जन से अधिक लोगों की मौत का कारण बने और सैंकड़ों मकानों के आग के हवाले किए जाने के इस मधययुगीन सिलसिले को ऐसे ही पेश किया जाता रहा कि आप समझें कि उड़िसा में जो कुछ हो रहा है वह एक 'स्वाभाविक प्रतिक्रिया' है, लिहाजा 'वैधा हिंसा' है।
ढाई साल पहले शिवसेना ने समूचे सूबे में पूरे दिन संगठित हिंसा फैलायी थी। कारण यह बताया गया था कि बाल ठाकरे की पत्नी के पुतले पर किसी ने कीचड़ लगा दिया था, जिसकी वजह से कार्यकर्ता गुस्से में आए। इस काण्ड पर सबसे चिन्ताजनक प्रतिक्रिया सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की थी - जिनका जिम्मा था कि कानून को अपने हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्त कदम बढ़ाने का ऐलान करना - उन्होंने इसे 'भावनात्मक प्रतिक्रिया' कह कर खुद हल्का कर दिया।

बंगलौर से निकलने वाले अख़बार 'डेक्कन हेराल्ड' ( अगस्त 2, 2006) के अपने एक सारगर्भित लेख में जनाब एम आर नारायण स्वामी ने इसी सवाल को उठाया था। उन्होंने पूछा था कि 'अगर किसी मूर्ति पर फेंका गया कीचड़ ताण्डव को औचित्य प्रदान कर सकता है, तो आप उस समुदाय के दिलों में जज्ब गुस्स के बारे में सोचिये जहां वह देखता है कि कानून का पालन करने वाले निरपराधा लोग - जिनमें एक पूर्व सांसद भी शामिल था - उन्हें इसीलिये मौत के घाट उतारा गया क्योंकि कुछ उन्मादी तत्वों ने एक टेरन पर हमला कर कथित तौर पर 59 हिन्दुओं को मार डाला ?' उन्होने साफ लिखा था कि ' किसी भी तरह की हत्या को सही ठहराया नहीं जा सकता, फिर वह बम्बई में हो, दिल्ली में हो, कोइम्बतूर में हो या गोधारा में हो। लेकिन धार्मिक आधारों पर लोगों का धारवीकरण करने की सियासत के चलते, उन्हें सांझी राष्ट्रीय पहचानों से वंचित करने के चलते, एक ऐसी मानसिकता पैदा हुई है जिसके अन्तर्गत लोग आतंकवाद को तो चिन्हित करते हैं लेकिन यह सोचते दिखते हैं कि दक्षिणपंथी हिन्दू समूहों द्वारा अंजाम दी जा रही हिंसा कहीं न कहीं उचित है। जो वह किसी भी रूप में नहीं हो सकती।'

'वैधा-अवैधा हिंसा' से सम्बधित एक अनछुआ पहलू तब सामने आता है जब हम दंगों और उससे सम्बधित हिंसा के बारे में बात करते हैं। परिस्थिति की गम्भीरता को समझने के लिए हम साम्प्रदायिक हिंसा से सम्बधित कुछ पुराने आंकडो की बात करते हैं। केन्द्रीय गृह मंत्रालय के तहत 'ब्युरो आफ पोलिस रिसर्च एण्ड डेवलपमेण्ट' ने किए अधययन में यह बात सामने आयी थी कि वर्ष 1954 से 1996 के दरमियान दंगों की 21,000 घटनाओं में 16,000 से अधिक लोग मारे गए थे, जबकि एक लाख से अधिक घायल हुए थे। इनमें से मुट्ठीभर लोगों को ही अपने अपराधो की सज़ा मिल सकी है।' (कम्युनल रायटस्, इण्डिया टुडे, जुलाई 21, 2003)

दंगापीड़ितों की इस दशा के बारे में सुप्रीम कोर्ट की वकील एवम चर्चित मानवाधिकारकर्मी सुश्री इन्दिरा जयसिंह एक अहम मसला उठाती हैं ''हमारी कानूनी प्रणाली इस प्रश्न का जवाब देने में अभी तक असफल रही है। ''आखिर ऐसी व्यापक हत्याओं के बारे में राज्य के प्रमुख की क्या संवैधानिक और व्यक्तिगत जिम्मेदारी बनती है।' और वह प्रस्ताव रखती हैं ''जिन लोगों ने हत्याओं को अंजाम दिया है, उन्हें जिम्मेदार ठहराने के साथ साथ हमें चाहिए कि हम सत्ता में बैठे उन लोगों को भी जिम्मेदार ठहरायें जो हत्या रोकने में असफल रहे, या नफरत भरे वक्तव्यों से उसे प्रोत्साहन प्रदान किया, और लच्छेदार भाषा में उसे औचित्य प्रदान किया।'' ( 1984 इन द लाईफ आफ ए नेशन, इण्डियन एक्स्प्रेस, नवम्बर 1, 2004)
यह बात नोट करनेलायक है कि वही नागरिक समुदाय जो आतंकवाद की सख्ती से मुखालिफत करने को तैयार रहता है, वह दंगे जैसी अंधाधुध हिंसा और आगजनी के प्रति बहुत अस्पष्ट रूख अख्तियार करता है। यह बात तो तब है जब आजादी के बाद के दंगों के अधययन हमें बताते हैं कि आज दंगे स्वत:स्फूर्त कार्रवाइयां नहीं बल्कि संगठित कदम होते है। पाल आर ब्रास जैसे समाजशास्त्री जिन्होंने भारत में दंगों पर विशेष अधययन किया है तथा जिनका मानना है कि मुल्क में 'संस्थाबध्द दंगा प्रणालियां' अब विकसित हो चुकी हैं। यह एक अहम तथ्य है। हमें इस तथ्य को बार बार रेखांकित करना चाहिए क्योंकि आज हम यही देख रहे हैं कि 'स्वत:स्फूर्तता' की दुहाई देते हुए दंगापीड़ितों को न्याय से लगातार इन्कार किया जा रहा है।

अपने चर्चित आलेख 'डिफाइनिंग टेरर एण्ड रायटस्, ( डॉन, 28 जून 2008) में चर्चित वकील इक्बाल अन्सारी साफ लिखते हैं : '' हम आसानी से इस बात को भूल जाते हैं कि सार्वजनिक व्यवस्था के बारे में एडमिनिस्टेरटिव रिफार्म्स कमीशन की पांचवी रिपोर्ट तथा गुजरात दंगों को लेकर चली सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने साम्प्रदायिक हिंसा को राज्य और समाज के लिए आतंकवाद से बड़ा खतरा घोषित किया है। इससे अधिाक महत्वपूण है मुम्बई 1993 के सीरियल ब्लास्ट को लेकर श्रीकृष्ण कमीशन द्वारा और 1998 के कोइम्बतूर बम धामाकों पर न्यायाधीश गोकुल कृष्णा द्वारा की गयी टिप्पणियां जिसमें उन्होंने दंगा और आतंकवाद के बीच के रिश्ते को अधिक स्पष्टता के साथ रखा है।
कोइम्बतूर बम धामाकों के बारे में विद्वान जज के मुताबिक 1997 के 'दंगों' में मुसलमानों की सुनियोजित हत्या ने मुस्लिम युवकों के एक हिस्से को क्षुब्धा एवं निराश कर दिया, जिन्हें व्यवस्था में उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आयी, इसके चलते उन्होंने आतंकवाद का सहारा लिया।''

इस समूची बहस के सभी सन्दर्भ नए सिरेसे प्रासंगिक मालूम पड़ते हैं जब हम देखते हैं कि 26 साल पहले घटित हुए नेल्ली कतलेआम के कातिलों को आज भी सज़ा नहीं मिल पायी है। वह 18 फरवरी 1983 का दिन था जब हथियारबन्द दस्तों ने असम के नागोंव जिले के 14 गांवों में फैली मुस्लिम आबादी को निशाना बनाया और छह घण्टे के अन्दर आधिकारिक तौर पर 1,800 मुस्लिमों को ( अनधिकृत/अनॉफिशियली 3,300 लोग) मार डाला। आजाद हिन्दोस्तां के इतिहास की धार्मिक-नस्लीय कतलेआम की इस सबसे गम्भीर कही जा सकनेवाली वारदात को अंजाम देने के लिए हमलावरों ने यही बहाना बनाया कि वे सभी बांगलादेश से आए शरणार्थी है। पिछले दिनों अंग्रेजी पत्रिका 'तहलका' ने इसे लेकर की स्टोरी ( 14 मार्च 2009) में यही बताया कि इसे लेकर जो तिवारी जांच आयोग बना था, उसकी रिपोर्ट पिछले 25 सालों से धाूल खा रही है। एक तरह से देखा जाए तो नेल्ली के इस कतलेआम को लेकर सत्ताधारी पार्टी एवम विपक्षी पार्टी के बीच एक अलिखित सी सहमति बनी है कि इस कुख्यात कतलेआम को कभी एजेण्डे पर नहीं लाना है। यह अकारण नही कि विगत 26 सालों में असम में सत्तासीन कांग्रेस या विपक्षी असम गण परिषद आदि की सरकारों ने तिवारी जांच आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग को हमेशा ठुकराया है। पिछले ही साल जब एक जापानी विदुषी ने इस कतलेआम को लेकर अपने पर्चे को एक सेमिनार में पेश करना चाहा तो उसे आखरी लमहे पर अपनी प्रस्तुति से रोका गया और कोई कारण नहीं दिया गया।

साम्प्रदायिक दंगों की घटनाओं की ओर बार बार लौटने की बात जबभी उठती है, हम अक्सर एक द्वंद का सामना करते हैं। लोग पूछते हैं कि क्या यह जरूरी नहीं कि हम नया पन्ना पलटें और अपने भयानक अतीत से मुक्त हों। यह बात भी उछाली जाती है कि अगर हम हत्याओं, जनसंहारों की बात करेंगे तो बड़ी मेहनत से विभिन्न समुदायो के बीच जो अमन कायम किया गया है, वह भंग हो सकता है। लेकिन क्या अब यह वक्त नहीं आ पहुंचा है कि स्थायी शान्ति हासिल करने के लिए हम न्याय की मांग को बुलन्द करें। क्या वास्तविक न्याय के बिना असली शान्ति कायम हो सकती है कभी ?
 

सुभाष गाताड़े