संस्करण: 23फरवरी-2009

 

भारत में मातृ-मृत्यु दर
वृध्दि चिंताजनक


 

डॉ. गीता गुप्त

क्कीसवी सदी में भी भारतीय महिलाएँ इतनी जागरूक नहीं हो सकी हैं कि मातृ-मृत्यु दर को बढ़ने से रोका जा सके। देश में प्रति वर्ष 78 हज़ार महिलाओं की प्रसव काल में मृत्यु दुर्भाग्यपूर्ण हैं सर्वाधिक बुरी दशा उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मधय-प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और असम की है जहाँ 42: महिलाएं प्रसव के दौरान मौत का शिकार हो जाती हैं। सन् 2006 की एक रपट के अनुसार प्रति एक हज़ार पर शिशु-मृत्यु दर उत्तर प्रदेश में 46, उड़ीसा में 52, मधय प्रदेश में 51, छत्तीसगढ़ में 43 और राजस्थान में 45 है। उचित देखभारत और आवश्यक चिकित्सा-सुविधा के अभाववश हर सात मिनट में एक महिला प्रसव संबंधा कारणों से मौत के मुंह में समा जाती है।

15 जनवरी 2009 को जारी यूनीसेफ की रपट 'स्टेट ऑफ द वल्डर्र्स चिल्ड्रेन 2009' के अनुसार प्रतिवर्ष एक करोड़ महिलाएँ गर्भ संबंधी समस्याओं से प्रभावित होती हैं। अमेरिका एवं इंग्लैण्ड की तुलना में भारत में प्रसव के दौरान मृत्यु की आशंका तीन सौ गुना अधिक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2 के अनुसार, देश में 44% गर्भवती महिलाओं को ही प्रसव पूर्व देखभाल मिल पाती थी। अब सर्वेक्षण-3 के अनुसार यह आंकड़ा बढ़कर 52% हो गया है। तथापि देश में हर साल बढ़ रही शिशु-मृत्यु दर चिंताजनक है। प्रतिवर्ष दस लाख बच्चों की मौत 28 दिन की उम्र पूरी करने से पूर्व ही हो जाती है।

दरअसल भारतीय स्त्रियां अद्यपर्यंत अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत नहीं हैं। उन्हें प्रसव के पूर्व कम-से-कम तीन बार चिकित्सालय जाना ही चाहिए। पर यहाँ स्थिति यह है कि प्रसव पूर्व आवश्यक परीक्षण हेतु अस्पताल जाना तो दूर, प्रसव भी घर पर ही दाइयों से करवा लिया जाता है। भले ही इसमें जान क्यों न चली जाए! गर्भवती महिलाओं में रक्ताल्पता एक गंभीर समस्या है, जो पोषण की कमी को दर्शाती है। इसके अलावा अनचाहे गर्भपात से भी मातृ मृत्यु-दर में वृध्दि होती है। प्राय: हर चौथा शिशु परिवार में अनचाहा होता है इसलिए उसे गर्भपात का शिकार होना पड़ता हैं। गांवों में परिवार नियोजन के साधान स्त्रियों को सहज सुलभ नहीं होते और गर्भपात की उचित सुविधा भी नहीं होती अतएव झोला छाप चिकित्सकों की मदद ली जाती है। इसके परिणाम घातक होते हैं।

महिला-साक्षरता में वृध्दि के बावजूद अभी सामाजिक परिवेश में इतना बदलाव नहीं आ पाया है कि स्त्रियां स्वतंत्रतापूर्वक अपने स्वास्थ्य संबंधी निर्णय ले सकें। हालांकि सरकार की 'जननी सुरक्षा योजना' के कारण उनमें जागरूकता आने लगी है। घर में दाई से प्रसव कराने की बजाय संस्थागत प्रसव में उनका रूझान बढ़ रहा है पर इसकी गति धीमी है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के माधयम से स्वास्थ्य-सेवाओं में सुधार संभव है। सरकार इसके लिए पर्याप्त राशि भी उपलब्धा कराती हैं लेकिन जो तथ्य प्रकाश में आये हैं उनसे पता चलता है कि इस मद में सुलभ करायी गयी राशि राज्यों द्वारा खर्च ही नहीं की गयी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इस सच को भी स्वीकारना होगा कि नौकरशाह अकेले इस योजना को सफल नहीं बना सकते। इसके लिए पर्याप्त संख्या में विशेषज्ञों, चिकित्सकों और परिचारिकाओं की सेवाएँ उपलब्धा हों, ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। मातृ-मृत्यु दर में वृध्दि को देखते हुए उसके कारणो पर ग़ौर करना होगा। यह सरकार का दायित्व है। लेकिन कुछ जिम्मेदारी समाज की भी है। अनुकूल वातावरण का निर्माण समाज द्वारा ही संभव है। सरकार का काम सरलतापूर्वक सेवाऐ सुलभ कराना है। चाहे परिवार-नियोजन के साधान हों या प्रसव संबंधी सुविधाएं-सब कुछ ज़रूरतमंद महिलाओं को आसानी से मिल सके, सरकार को ईमानदारी से ऐसा प्रयास करना होगा।

देखा गया है कि प्रसव के दौरान मौतें 38% हेमरेज, 11% रक्तदोष, 5% तनाव व घबराहट, 5% अनियमित श्रम, 8% गर्भपात तथा 34% अज्ञात कारणों से होती हैं। हालांकि अस्पतालों में प्रसव कराने का चलन धीरे-धीरे बढ़ रहा है परंतु अभी भी 60% असुरक्षित प्रसव घर पर ही कराये जाते हैं। चिंताजनक बात यह है कि अस्पताल में प्रसव के दौरान दो तिहाई मौतें हो जाती हैं। सिर्फ केरल ऐसा राज्य है जहाँ पांच सौ में से एक स्त्री की मौत प्रसव काल में होती है। जहाँ भी मातृ-मृत्यु दर कम है, वहाँ का समाज जागरूक है इसलिए वहाँ संस्थागत प्रसव अधिक सफल होते हैं। दुर्भाग्य से, मधय प्रदेश में स्थिति खराब है। यह कटु सत्य है कि स्त्री के स्वास्थ्य पर अब तक सायास कोई व्यय नहीं किया जाता। अस्वस्थ होने पर उसे अस्पताल ले जाने की बात लोगों के दिमाग में तब तक नहीं आती, जब तक स्थिति बिगड़ न जाए। अस्पताल जाने और इलाज के लिए आवश्यक धान का अभाव भी इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। प्रसव पूर्वक आवश्यक जांच के लिए महिलाए प्राय: चिकित्सक के पास नहीं जाती और ख़र्च होने के कारण ही अस्पताल में प्रसव नहीं कराना चाहती। अतएव सरकार द्वारा नि:शुल्क चिकित्सा सुविधा मुहैया कराये जाने की ही नहीं, इसके व्यापक प्रचार-प्रसार की भी आवश्यकता है। ताकि संस्थागत प्रसव समाज में परंपरा का रूप ले सके और सुरक्षित मातृत्व की कल्पना यथार्थ में परिणत हो सके।

स्मरण रहे कि अशिक्षा और मातृ-मृत्यु में गहरा संबंधा है। अशिक्षित स्त्रियों को स्वास्थ्य संबंधी समुचित जानकारी नहीं होगी। शासन द्वारा प्रदत्त सुविधााओं से भी वे अपने अज्ञानवश लाभ नहीं उठा पातीं। इसके अलावा उनकी निर्धानता भी मातृ-मृत्यु दर को बढ़ाती है। दरअसल प्रसव के पूर्व सही देखभाल का क्या महत्व है, यह उन्हें ज्ञात नहीं होता। प्रसव के उपरांत भी अधिकतर मौतें इसलिए होती हैं कि स्त्री की देखभाल ठीक से नहीं की जाती, उसकी स्वास्थ्य रक्षा को गंभीरता से नहीं लिया जाता। परिवारजन भी उसे जल्द से जल्द घर के कामों में खटते हुए देखना चाहते हैं।जबकि प्रसव के पूर्व व बाद में भी समान रूप से स्त्री की समुचित देखभाल नितांत आवश्यक है। ज़रा सी चूक उसके लिए घातक सिध्द हो सकती है।

अक्सर देखने-सुनने में आय है कि आसन्नप्रसवा महिला को जब अस्पताल में भर्ती किया जाता है तो प्रसव के बाद शीघ्र (कभी-कभी तो घण्टा भर बाद) ही छुट्टी दे दी जाती है। ऐसी स्थिति में बहुत अधिक रक्त स्त्राव कारण उसकी मृत्यु के मामले भी प्रकाश में आये हैं। भारत में ग्रामीण अंचलों, कसबों और छोटे शहरों की स्त्रियों को असुरक्षित प्रसव के ख़तरों का सर्वाधिक सामना करना  पड़ता है। सरकार को इस दिशा में प्रयास करना चाहिए कि प्रसव पूर्व और बाद की जटिलताओं के निराकरण के लिए स्त्री को पर्याप्त शासकीय सहायता मिले। इन स्त्रियों को नि:शुल्क चिकित्सा-सुविधा उपलब्धा करायी जाए। बढ़ते लिंगानुपात और शिशु-मृत्यु दर को रोकने के लिए भी मातृत्व की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।

जब तक स्वास्थ्य संबंधी शासकीय सुविधााओं का लाभ स्त्रियों को नहीं मिलेगा तब तक भारत में मातृ एवं शिशु-मृत्यु दर को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं होगा। विश्व भूख सूचकांक में भारत के सबसे भूखे प्रांत के रूप में बदनाम मधय प्रदेश शिशु मृत्यु दर के मामले में भी अव्वल नंबर पर है। दिल्ली स्थित प्रमुख संगठन पापुलेशन फाउण्डेशन ऑफ इंडिया की ताज़ा रपट में भी मधय प्रदेश को शिशु मृत्यु दर के मामले में सबसे ऊपर रखा गया है। उड़ीसा दूसरे, उत्तर प्रदेश तीसरे और राजस्थान चौथे क्रम पर है। सबसे निचले क्रम पर केरल है, जहाँ शिशु-मृत्यु दर प्रति हज़ार मात्र 18 है। दुर्भाग्य से, मधय प्रदेश में स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं के कार्यान्वयन में वांछनीय सफलता नहीं मिली है। यहाँ दाइयों के प्रशिक्षण पर बल दिया गया जबकि दाइयों की बजाय नस और ए.एन.एम. को प्रशिक्षित किया जाना लाभप्रद होता। यह भी सच है कि यहाँ नसबंदी पर तो बहुत अधिक धयान दिया जाता है परंतु संस्थागत प्रसव को प्रोत्साहित करने की चेष्टा नहीं की जाती।

यह तय है कि सरकार और समाज के समन्वित प्रयासों से ही इस विकराल समस्या का समाधान हो सकता है। यदि शिक्षा संस्थाओं, चिकित्सालयों और सामाजिक संस्थाओं के माधयम से ईमानदार प्रयास किये जाएँ तो निश्चय ही सकारात्मक परिणाम सामने आएँगे। केंद्र और राज्य सरकारें रणनीति बनाकर यथोचित क़दम उठायें और इसमें उन्हें समाज का पूरा सहयोग प्राप्त हो, तो मातृ मृत्यु दर को बढ़ने से रोका जा सकता है और संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित् मिलेनियम लक्ष्य की प्राप्ति भी संभव है।

 


डॉ. गीता गुप्त