संस्करण: 23फरवरी-2009

 

विज्ञान दिवस:28फरवरी2009

कैसे होगें विज्ञान में नए अनुसंधान?


डॉ. सुनील शर्मा

 

भी हाल ही में दिसम्बर 2009में आयोजित राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में युवाओं की घटती भागीदारी पर काफी चिंता व्यक्त की गई थी,तथा इसे देशभर में छात्रों की विज्ञान विषयों के प्रति बढ़ती अरूचि का परिणाम माना गया।विज्ञान के प्रति छात्रों की घटती रूचि के होने दुष्परिणामों पर भी अधिवेशन में मनन किया गया। हालांकि इसके पूर्व मानव संसाधान विकास मंत्रालय द्वारा कराए गये विभिन्न सर्वेक्षणों से भी यह स्पष्ट है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान  आधारभूत विज्ञान विषयों में शोधा एवं स्नातकोत्तर अधययन पाठयक्रमों में छात्रों के दाखिले में लगातार गिरावट आ रही है।

सूत्रों के अनुसार विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के शिक्षण विभागों में भौतिक शास्त्र, गणित, रसायन और जीवविज्ञान जैसे विषयों के स्नातकोत्तर पाठयक्रमों में छात्रों के दाखिले में 80 फीसदी तक की कमी आई है।निश्चित रूप से जब विज्ञान समूह में छात्र प्रवेश ही नहीं लेगें तो वैज्ञानिक कहाँ से निकलेगें एवं नये अनुसंधान कैसे संभव हो सकते है?जबकि वैश्विक स्तर पर हम शोधा एवं अनुसंधान की दृष्टि से पहले ही काफी पीछे हैं,गौरतलब है कि शोधा पेपर प्रकाशन में वैश्विक स्तर पर हमारी हिस्सेदारी महज 2.41प्रतिशत है, जबकि चीन की हिस्सेदारी 10.50 फीसदी है।एवं इस मद में हमारा खर्च जी.डी.पी.का सिर्फ 0.8 प्रतिशत है। वास्तव में देश में विज्ञान के प्रति छात्रों की अरूचि निश्चित ही गंभीर चिंता का विषय है तथा जिसके परिणाम देश के विकास और सुरक्षा के लिए घातक होंगे। उल्लेखनीय है कि पिछले दो तीन दशकों में अंतरिक्ष विज्ञान,परमाणु,चिकित्सा,जैव विज्ञान एवं दूरसंचार के क्षेत्रों में हमारे वैज्ञानिकों ने उल्लेखनीय सफलताऐ  अर्जित की है। परंतु अब हमारे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान और विकास के सामने संकट के बादल हैं। क्योंकि विभिन्न अनुसंधान केन्द्रों में कार्यरत वैज्ञानिक हताशा, मानसिक दबाव एवं आर्थिक रूप से आकर्षणहीन होते कैरियर की वजह से अपने संस्थानों को छोड़ रहे हैं,जिससे प्रयोगशालाएँ खाली हो रहीं हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले 5 वर्षों में रक्षा अनुसंधान विकास एवं संगठन विभाग से लगभग 1100 वैज्ञानिकों ने नाता तोड़ा है। वर्तमान समय में कैरियर की दृष्टि से आकर्षणविहीन होने की वजह से विज्ञान पढ़ने वाले छात्र लगातार घट रहे है, इंटरमिडियट पास करने के बाद विज्ञान के मेधावी छात्र विज्ञान के मूल विषयों की जगह इंजीनयरिंग व तकनीकी पाठयक्रमों को आगे की पढ़ाई के लिए प्राथमिकता देते हैं तथा ये छात्र बी.ई., बी.टेक करने के बाद इसी क्षेत्र के अनुसंधाान कार्यक्रमों से जुड़ने की बजाय या तो आई.टी. क्षेत्र में चले जाते हैं या फिर मेनेजमेंट को अपना भविष्य बना लेते हैं।

वास्तव में विज्ञान के क्षेत्र में विकास के लिए वैज्ञानिकों की ही जरूरत होगी और वो भी आधारभूत विज्ञान विषयों से जुड़े शोधार्थियों की, इसलिए यह जरूरी है कि मेधावी छात्रों को विज्ञान विषय को पढ़ने के लिए आकर्षित किया जाये। विज्ञान के छात्रों और शोधार्थियों को रोजगार की सुनिश्चित गारंटी दी जाये। विज्ञान विषय में पी.एच.डी. करना जटिल व कठिन है। हर एक शोधा नई संभावनाओं को जन्म देता है। परंतु पी.एच.डी. उपाधि के बाद भी बेरोजगारी का दंश शोधा की संभावनाओं को खत्म कर देता है। शोधा के प्रति जिज्ञासुओं को हतोत्साहित करता है।वर्तमान में नये छात्र शोधा के क्षेत्र में पैर रखने से भी कतराते हैं,क्योंकि विज्ञान विषय के हजारों पी.एच.डी. उपाधि धारी बेरोजगार हैं,वो कही गेस्ट फैकल्टी है या संविदा शिक्षक बन जिंदगी काट रहें हैं।

आज मूलभूत विज्ञान विषयों को किनारे कर तकनीकि शिक्षा को बढ़ाबा दिया जा रहा है,वास्तव में हमारे नीति निधर्रकों और नेतृत्व कर्ताओं में भी विज्ञान और तकनीकी की मूल स्थिति को लेकर काफी भ्रम है। जबकि यह स्पष्ट है कि वैज्ञानिक अनुसंधान के विषय में सोचता है मूलभूत सिद्वांतों का अधययन करके भविष्य की कल्पना करता है, जबकि इंजीनियर उस अनुसंधान को परिणाम तक पहुंचाने के लिए वैज्ञानिक की आवश्यकता अनुसार संयंत्रों को डिजाईन करता है। अत: मूलभूत निर्माणकर्ता वैज्ञानिक ही है, इसलिए विज्ञान शिक्षा व वैज्ञानिकों का संरक्षण विकास की पहली शर्त है। देश में विज्ञान शिक्षा दुर्दशा की स्थिति में है, वैज्ञानिकों, प्राधयापकों ओंर शोधार्थियों को दुत्कारा जाता हैं, उनके शोधाकार्य को पश्चिम की नकल कहकर उन्हें अपमानित किया जाता है। वास्तव में विज्ञान में नकल जैसी बात बिल्कुल ही असंभव है, इसमें शोधा के परिणाम अनूठे होते हैं। जिनका विश्लेषण सिर्फ शोधाकर्ता ही कर सकता है, वैज्ञानिक अनुसंधाान विज्ञान के सतत् विकास की एक प्रक्रिया है। एक ही अनुसंधान का दुहराव असहज नहीं होता है जबकि यह दोहराव पुराने अनुसंधान के जरिए नई संभावनाओं के मार्ग प्रशस्त करता है। इसे सारे शोधार्थी स्वीकारते हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालयों में शोधारत छात्रों और प्राधयापकों के द्वारा भेजे गए शोधा प्रस्तावों का निरीक्षण, परीक्षण तथा अनुमोदन लंबी प्रक्रिया है। जिससे शोधाकर्ता हताश होकर मूल विषय से भटक जाता है। वैज्ञानिक अनुसंधान कल-कल बहती जलधारा की तरह है इनमें सततता जरूरी है एवं स्वायतता भी।

वास्तव में यह स्थिति विज्ञान के साथ-साथ उच्च शिक्षा के लिए भी घातक है वर्तमान में जहां तक उच्च शिक्षा संस्थानों की बात है तो वहॉ छात्रों को सुयोग्य शिक्षक नहीं मिल पा रहें हैं। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में वर्षों से शिक्षकों के पद रिक्त है।जिनमें हर वर्ष शिक्षा सत्र की शुरूआत में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति करने की औपचारिकता कर दी जाती है।मधयप्रदेश राज्य इसका अच्छा उदाहरण है यहाँ वर्षों से महाविद्यालयों में कालखंड के आधार पर अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति कर उच्चशिक्षा उपलब्धा कराने की औपचारिकता पूरी की जा रही है।

वास्तव में महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों के स्नातकोत्तर पाठयक्रम शोधा की नर्सरी है। परंतु पूर्णकालिक शिक्षकों का अभाव इन्हें खत्म कर रहा है जिससे विज्ञान के गूढ़ अधययन की संभावना ही खत्म हो रही हैं।सरकारी की नीतियों में शोधा को कहीं अहमियत नहीं दी जा रही है। वास्तव में वर्तमान स्थिति में सुधार नहीं होता तो भविष्य मे ना तो वैज्ञानिक मिलेंगे ना शोधार्थी और ना ही विज्ञान शिक्षक। सरकारें और नीति निर्माता विज्ञान पर मंडराते संकट को समय से पहले समझे तो देश हित में अच्छा होगा। आज अगर विज्ञान को बचाना है तो निरपेक्ष नीति का होना जरूरी है, जिसके निर्धारक वैज्ञानिक हों, प्राधयापक हों और शिक्षाविद हों।


डॉ. सुनील शर्मा