संस्करण: 23फरवरी-2009

 

फसलें उजाड़ते आनुवंषिक बीज
 


 

प्रमोद भार्गव

नुवंषिक बीज फसलें फल और सब्जी की पारंपरिक खेती को उजाड़ने का काम कर रहे हैं। आनुवंषिकी अभियांत्रिकी (जेनिटिक इंजीनियरिंग) के बहाने जिस धान को खेतों में बोया, वह बासमती चावल की पट्टी को बरबाद कर देने वाली जहरीली धान साबित हुई। परावधिर्त बीजों से फल और सब्जियों की उम्दा किस्में भी नश्ट हो रही हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं का तो यहां तक कहना है कि राजनेता और नौकरषाहों का गठजोड़ आनुवंषिक बीज तैयार करने वाली कंपनी माइको के हित साधान में लगा है। यही कारण है कि परावधिर्त बीजों से तैयार फसलों, फल व सब्जियो पर किये गये परीक्षणों को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग सार्वजनिक करने में आना कानी कर रहा है। उ. प्र. में किसान इन बीजों से मुक्ति के लिए आंदोलन तक कर रहे हैं। लेकिन केन्द्र सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही।

उ. प्र. में आज कल ''धान बचाओ जीई भगाओ'' आंदोलन चल रहा है। किसानों द्वारा जारी यह मुहिम आनुवंषिक बीज बीटी राईस के विरूध्द है। केन्द्र सरकार द्वारा कुछ समय पूर्व देष के चावल उत्पादक बहुल बारह क्षेत्रों में आनुवंषिक धाान के प्रयोग की इजाजत केन्द्र की अनुमोदन समिति ने दी है। इन क्षेत्रों में उ. प्र. का वह इलाका भी है जो बासमती चावल के उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है। धान का कटोरा माने जाने वाले छत्तीसगढ़ और मधयप्रदेष के महाकौषल क्षेत्र की चावल की पैदावार के लिए उर्वरा कही जाने वाली भूमि पर भी इस जहरीली धान का प्रयोग होने जा रहा है।

महाराष्ट्र हाईब्रीड ब्रीड़ कंपनी माईको धान की आनुवंषिक बीजों के प्रयोग की कोषिष में लगी है। चावल की विर्भिन्न किस्मों को पारंपरिक ज्ञान व तकनीक के बूते उपजाने वाले किसानों को आषंका है कि यदि आनुवंषिक बीजों का प्रयोग धान बाहुल क्षेत्रों में किया जाता है तो इसके विशाणु दूसरे खेतों में फैल सकते हैं यदि ऐसा हुआ तो बासमती और काली मूंछ जैसे चावलों की किस्में जहरीली हो जायेंगी जो मानव स्वास्थ्य और खेतों की उर्वरा षक्ति को जबरदस्त ढंग से प्रभावित करेंगी। नतीजतन भविश्य में किसानों को आर्थिक हानि उठानी होगी।

दरअसल आनुवंषिक धान की खेती के लिए सुरक्षा के व्यापक व कड़े इंतजाम करने होते हैं ताकि इन प्रयोगों का कोई घातक असर दूसरी किस्मों पर न पड़े। अमेरिका में ऐसे ही प्रयोगों के चलते चावल उद्योग को अरबों डालर का नुकसान उठाना पड़ा। यह हानि वायर कंपनी के आनुवंषिक बीज लिबर्टी लिंक चावल, जिसे एल.एल.601 कहा जाता है के चलते हुआ है। इस कारण अमेरिका द्वारा चावल निर्यात का सिलसिला थम गया। वायर बीज कंपनी ने 2001 में इन बीजों का परीक्षण अमेरिका के धान बाहुल्य इलाकों में किया था। इन प्रयोगों से सबक लेने की बजाय इन्हें भारत में दोहराया जा रहा है।

जबकि संयुक्त राश्ट्र के खाद एवं कष्शि संगठन (ए.एफ.ओ.) की रिपोर्ट एनर्जी यूज इन फूड सिस्टम 2007 दर्षाती है कि भारत में चावल उत्पादन की दृष्टि से जैविक खेती के परिणाम सकारात्मक हैं। इन पर जलवायु परिवर्तन का भी एकाएक असर नहीं पड़ता। जैविक खेती स्थानीय प्रकष्तिक संपदा के इस्तेमाल पर ही निर्भर होती है इसलिए किसानों को अतिरिक्त लागत का सामना भी नहीं करना पड़ता। इसके साथ ही सिंचाई के लिए पानी पर निर्भरता 50 प्रतिषत तक घट जाती है जबकि इसके ठीक विपरीत उत्पादन दोगुना बढ़ जाता है।

तमिलनाडू कृषि विष्वविद्यालय ने धान की जैविक खेती के प्रयोग 2004 में किये थे, जिसके आष्चर्यजनक परिणाम निकले। इस पध्दति से तमिलनाडू में 2007-08 में 4 लाख 20 हजार हैक्टर भूमि पर धान की फसल बोई गई थी। राज्य में जब चावल उत्पादन की गणना की गई तो चावल की औसत उत्पादन दर 10 से 13 टन प्रति हेक्टर थी। जो एक कीर्तिमान साबित हुई। इससे तमिलनाडू में चावल का औसत उत्पादन 2005-06 में दो हजार 838 किलो ग्राम प्रति हेक्टर की तुलना में 2007-08 में तीन हजार 860 किलो ग्राम हो गया। इन परिणामों को देखते हुए 2008-09 में साढ़े सात लाख हेक्टर भूमि में धान उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था। जिसके उत्साहजनक परिणाम आने की उम्मीद है। जैविक व पारंपरिक तरीकों से चावल उत्पादन की षुरूआत तमिलनाडू के अलावा आंध्रप्रदेष, त्रिपुरा, पष्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ और गुजरात में भी की गई है। जिसके अनुकूल परिणाम आ रहे हैं। भारत में कुल 240 लाख हेक्टर भूमि में धान की खेती की जाकर चावल की हजारों किस्में पैदा की जाती हैं। जो दुनियां के चावल उत्पादक व निर्यातक देषों के लिए एक मिषाल है। लेकिन आनुवंषिक बीजों के जरिये इन किस्मों की विविधाता के साथ खतरनाक खेल खेला जा रहा है। जिससे धान की गिनी चुनी आनुवंषिक किस्में रह जायें और बीज पर नियंत्रण बहुराश्ट्रीय बीज निर्माता कंपनी का हो जाये ?

भारत में भौगोलिक व मौसमी विविधाता के चलते खाद्यान्न सुरक्षा की दष्श्टि से उथली और गहरी जड़ों वाली फसलें इकट्ठी बोई जाती थीं लेकिन बाहरी तकनीक के फेर में पड़कर हरित क्रांति के अलंबरदारों ने बहुफसलीय खेती की जगह एक फसलीय खेती को प्रधानता दी। इससे भारतीय फसल चक्र प्रभावित हुआ। खेतों में कीटनाषकों के प्रयोग से जीवाष्म कम हुए, फलस्वरूप खेतों की उर्वरा क्षमता प्रभावित हुई, उत्पादकता घटी और आनुवंषिक बीजों के चलन में आने से मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ने लगा। महाराश्ट्र में बीटी कपास उत्पादन के दुश्परिणाम हम भुगत रहे हैं, बीटी बैंगन में आनुवंषिक तकनीक से बेक्टीरिया की मिलावट ने भटा को जहरीला बना दिया है। इंडियन काउंसलिंग ऑफ मेडीकल रिसर्च ने अपनी एक रिपोर्ट में जीएम आलू से होने वाली एलर्जी व त्वचा संबंधी घातक बीमारियों का खुलासा किया है। दरअसल ये वर्णसंकर बीज विकष्त जीवाणु व विशाणुओ  को जन्म देकर मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहे हैं। ये जीवांष भोजन के माधयम से षरीर में प्रवेष कर मनुश्य की प्रजनन क्षमता, धामनी तंत्र व कोषिका तंत्र को बेतरह प्रभावित कर रहे हैं।

इन बीजों के इस्तेमाल के सिलसिले में सोचनीय बात यह है कि इनकी मांग किसान, व्यापारी अथवा उपभोक्ता कोई भी नहीं कर रहा है। फिर भी इन्हें जबरन किसानों की पीठ पर उन्हें बर्बाद करने की दृष्टि से लादा जा रहा है। आखिर जीन रूपान्तरित बीज किसका हित साधा रहे हैं किसान का ? अथवा बीज निर्माता बहुराश्ट्रीय कंपनी मानसेंटों व माईको, सिजेंटा या बालमार्ट का ? आनुवंषिक बीजों के इस्तेमाल के सिलसिले में केन्द्र सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी विभाग की मंषा साफ नहीं है। क्योंकि वह उस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं कह रही है जो जीन रूपान्तरित फसल,फल व सब्जियों पर परीक्षण के बाद तैयार की गई है। इससे जाहिर है कि आनुवंषिक बीज भारतीय फसल चक्र को उजाड़ने का काम कर रहे हैं।
 




प्रमोद भार्गव