संस्करण: 23फरवरी-2009

रैगिंग : किसी को मजा,
किसी की मौत

 

 

अंजनी कुमार झा

भाजानलेवा साबित हो रहे रैगिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब तकनीकी शिक्षा संस्थानों के प्रशासन को सतर्क हो जाना चाहिए। पीड़ित छात्र या छात्रा के साथ अब न्याय की उम्मीद ज्यादा बंधा गई है। साथ ही दंड के कठोर विधाान के कारण अब उम्मीद की जा रही है कि ऐसे अमानुषिक व्यवहार शायद न किये जायें। सर्वोच्च न्यायालय को कड़े कदम उठाने पड़ें क्यॉकि रैगिंग के नाम पर दानवी कृत्य होते थे जो सभ्य समाज की धाज्जियां उड़ाता था और पीड़ित परिवार केवल विलाप को विवश रहता था। अनुकंपा व मुआवजे मौत या प्रताड़ना की पीड़ा को तो वापस नहीं ला सकता। अदालत के स्पष्ट निर्देश हैं कि सभी संस्थान रैगिंग रोकने के लिए भारतीय दंड संहिता का पालन करेंगे और पुलिस को भी रैगिंग पर प्रथम दृष्टया संज्ञान लेते हुए तत्काल प्राथमिकी दर्ज करनी होगी। प्राथमिकी दर्ज न करने पर पुलिस तक दोषी करार दी जा सकती है। प्रबंधान पर लटकती तलवार के साथ मान्यता समाप्त होने तक के कड़े प्रावधाान से शिक्षण संस्थाओं में हड़कंप मचा है। अगर निमयों का अक्षरक्ष: पालन हुआ तो प्रथम वर्ष के छात्र अपनी पढ़ाई बिना किसी भय के कर पायेंगे। अभिभावकों को भी चैन मिलेगा। वस्तुत: डर, झिझक मिटाने के साथ आईक्यू टेस्ट के लिए सीनियर फ्रेशर को बुलाते थे। बातचीत के जरिये उनकी झिझक खत्म की जाती थी और डर के भूत को समाप्त किया जाता था। यह प्रणाली अगर स्वस्थ मानसिकता के साथ अमल में लाई जाए तो बुरा नहीं है, किंतु इसका मजाक उड़ाते हुए कष्ट देकर हंसी लेने की कोशिश की गई जो अमानवीयता को बढ़ाया। राघवन कमेटी को आधार बनाकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिये महत्वपूर्ण निणर्य से कुछ लोग असंतुष्ट है। उन्हें ये कदम अत्यंत सख्त लग रहे हैं। भला, कोई उनसे पूछे कि इंट्रोडक्शन के नाम पर नग्नता की सारी सीमा पार करने की छूट क्या उचित है। घर परिवार की बर्बादी के साथ विक्षिप्त बनाने की स्थिति के लिए दंड तो तय करना चाहिए। खेल-खेल में जान देना क्या ढीले-ढाले नियमों के समर्थक परिवार के सदस्य दे पायेंगे। ऐसे अवसरों पर मैनेजमेंट कोटा, वीआईपी आदि की बातें कर भरपूर छूट दी जाती है। बहुत से संस्थानों में फ्रेशर्स के शुरूआती महीने डर और तकलीफ में गुजरते हैं। वे नहीं जानते कि कब उन्हें किसी शर्मनाक या बुरी यातना के लिए तलब कर लिया जाए। रैगिंग में मानसिक, शारीरिक या यौन शोषण के रूप में मौजूद हैं। कई मामलों में यह मानसिक बलात्कार की तरह होती है। हर साल कॉलेज खुलने पर प्रताड़ना की हद तक जाने की अनगिनत खबरें शिक्षा संस्थानों को शर्मसार करती हैं। छात्र भय व दहशत की चादर लपेटे मुख्य दार को प्रवेश करते हैं। हल्की सी आहट भी उन्हें खौफनाक दृश्य दिखा जाती है। देश की 322 विश्वविद्यालयों और साढ़े 14 हजार कालेजों में हर साल कदम रखने वाले लगभग 70 लाख छात्रों के लिए रूह को कंपा देने वाली यातनाएं दी जाती है और पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना रहता है। पीड़ित छात्र-छात्राओं पर इसका बहुत गहरा असर पड़ता है। उनमें डर का अहसास बुरी तरह बैठ जाता है। वे जीवन के संबंधा में नकारात्मक सोच से घिर जाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व लखनऊ में स्टेट आर्किटेक्चर कॉलेज के दो दर्जन से ज्यादा छात्रों को रैगिंग के डर से भागना पड़ा। सीनियर्स उन्हें घंटों सीधाा खड़ा रखते थे या रातभर डांस करने के लिए मजबूर करते थे। हैदराबाद के एक कॉलेज के छात्र ने नैराश्य होकर ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या कर ली। जलपाईगुड़ी इंजीनियरिंग कालेज के छात्र ने निर्वस्त होने पर सल्फास खा ली। पुणे के मेडिकल कालेज के छात्र को लड़कियों के सामने मुंह पर कालिख पोती तो उसने प्रतिशोधा में सीनियर को मौत के घाट उतार दिया। ऐसे हजारों उदाहरण हैं जहां छोटे-बड़े जूनियर-सीनियर, बड़े भाई-छोटे भाई के संबंधा का निर्वाह करने के बजाय केवल 'इस्तेमाल' करने तक सीमित रखा जा रहा है। परिवार की सुरक्षित जिंदगी से आये छात्रों के लिए मामूली रैगिंग सह पाना भी दुश्वार हो जाता हैं नशा करने से लेकर सेक्सुअल एक्ट के लिए मजबूर करने की प्रवृत्ति में इजाफा होने से घृणा, प्रतिशोधा की भावनायें बढ़ी हैं। हमें यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए कि रैगिंग का एक सिलसिला है, जो चलता रहता है। रैगिंग के जरिये सताया गया छात्र अगले साल क्रूर तरीके से बदला लेता है। यह अनì