संस्करण: 23फरवरी-2009

मुख्यमंत्री का कथन और
मालवा की प्यास

जीवनसिंह ठाकुर

ज्जैन में म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि उज्जैन सहित मालवा की प्यास बुझाने के लिए नर्मदा को लाएगें इस योजना पर 'दस हजार करोड़' रुपए खर्च होंगे। पानी की व्यवस्था की जाये तो यह तो अच्छा है। लेकिन जो स्त्रोत सूख गये हैं या तथाकथित विकास के नाम पर नष्ट कर दिये गये है उनका क्या ? पूरे मालवा में जल स्त्रोतों के पाताल (रसातल) में चले जाने के कारणों का स्पष्ट पता लगाया जाना चाहिये और जो स्त्रोत थोड़े बहुत बचे है उनकी सुरक्षा अनिवार्य करनी होगी। एक तरफ नर्मदा का निरंतर दोहन होगा दूसरी तरफ पर्यावरण विनाश जारी रहेगा। बेहतर होगा कि ''मालवा अंचल'' के बुनियादी परिवेश और पर्यावरण को समझा जाये। विनाश प्रक्रिया जारी रखते हुए ''जल की व्यवस्था'' करते जाने में एक दिन (जो ज्यादा दूर नहीं है) म.प्र. की कमर टूट जाएगी। ''विनाश प्रक्रिया'' का चेहरा बेनकाब किया जाये और उसे रोकने पर सख्ती की जाये यह मालवा में ''जल संरक्षण जन आंदोलन'' के बिना संभव नहीं होगा। मालवा में तथाकथित ''विकास'' (जो 'विनाश' का पर्याय बन गया है) की योजना में जनता की भागीदारी सरकारों, पूंजीपतियों, नौकरशाही ने एक दम खारिज कर दी है इससे जनता महज ''मन मसोसती आबादी'' में बदल गई है। विकास में भी लोकतंत्र होना चाहिये-जनता का हित कहां है कैसे हो यह तो स्थानीय जनता ही तय करेगी। लेकिन म.प्र. में ''विकास तानाशाही'' विकसित हो गई है। यह भयाक्रांत करने वाला शब्द बनता जा रहा है कोई भी व्यक्ति यह नहीं कहता कि म.प्र. का विकास न हो, प्रत्येक व्यक्ति शानदार मप्र चाहता है-लेकिन जल, वन, विहिन प्रदेश नहीं। कुछ दिन पूर्व ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था ''प्रदेश की जमीन पर सोना उगा कर ही दम लूंगा'' इरादा नेक है वे कह चुके है कि वे सरकार और जनता को बराबरी पर लाएगें। हो सकता है कि विकस की जनवादी धारा का सूत्रपात हो। लेकिन बिना जन अभियान के ये कैसे होगा ? हमें ज्यादा दूर न जा कर इंदौर की स्थिति ही देख लें। इंदौर नगर निगम ने 3152 पेड़ों को काटने की अनुमती दे दी है। पिछले पांच वर्षों में 5000 हजार पेड़ काट दिये गये है। वी.आईपी. रोड़ के लिये 200 पेड़ शहीद हो रहे है। (स्त्रोत-नई दुनिया) 

आज प्रदेश में हर आम और खास यह पूछ रहा है कि विकास का 'बुल्डोजर' हरे भरे पेड़ों पर से ही क्यों गुजर रहा है ? बावड़ियों, जलस्त्रोतों पर से ही क्यों जा रहा है ? हरे भरे सदियों में तैयार खेतों पर से ही दनदनाता जा रहा है ? आखिर क्यों, क्या इन्हें बचाया नहीं जा सकता ? पूरा मालवा इस बुल्डोजरी विकास के अश्वमेघ की चपेट में है। इस अश्वमेघ के बुल्डोजरी गति के विधवंसक अश्व की वल्गाएँ कौन पकड़े ? एक बड़ा सवाल है।

लेकिन अब मालवा अंचल में विकास के इस डरावने चेहरे की नकाब उतारनी ही होगी, देशीपन, पर्यावरण के अनुकूल विकास के लिये नितांत आवश्यकता है। अब ज्यादा देर नहीं की जाये 'मालवी संकोच' दुर्बलता माना जा रहा है इसे नये तेवर के साथ निर्भय, अभय मालवा बनाना जरूरी है




 

जीवनसिंह ठाकुर