संस्करण: 23फरवरी-2009

पवित्र अपवित्र नगर का
विभाजनकारी खेल


 

वीरेंद्र जैन

ध्यप्रदेश सरकार ने गत 10 फरबरी 2009 को आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में मैहर, चित्रकूट और सलकनपुर को भी पवित्र क्षेत्र घोषित करने का फैसला ले लिया। इस फैसले के परिणाम स्वरूप अब प्रदेश में दो तरह के नगर और दो तरह के नागरिक हो गये हैं, एक पवित्र नगर वाले और दूसरे अपवित्र नगर वाले। रोचक यह है कि उक्त फैसला उस पार्टी की सरकार ने लिया है जिसके एजेन्डे में समान नागरिक आचार संहिता की मांग प्रमुख मांगो में सम्मिलित है। फैसले के परिणाम स्वरूप उक्त नगरो में शराब, अंडा, और मांस की बिक्री प्रतिबंधित कर दी जायेगी।

उल्लेखनीय है कि इन नगरो को पवित्र घोषित करने के लिए आम नगर वासियो की ओर से ना तो कोई प्रभावकारी मांग ही उठी थी और ना ही उक्त क्षेत्रो की जनता की बहुमत राय ही जानने की कोई कोशिश ही की गयी। हमारे धर्मनिरपेक्ष संविधान में पवित्र अपवित्र नगरो जैसे विभाजनकारी कार्यो की कोई व्यवस्था नही की गयी है अपितु अपने स्वतंत्रता संग्राम के दौर से ही हम पूरे देश की माटी को पवित्र और पूज्य मानने की भावना से ओत प्रोत हैं। प्रारंभ में किसी धार्मिक आधार पर उठाया गया छोटा सा कदम आगे जाकर खतरनाक भावनात्मक सवालो या विवादो में बदल सकता है। मधयप्रदेश मंत्रिपरिषद द्वारा उठाये गये इस कदम में बतायी गयी आचार संहिता पूरे हिन्दुओ की आचार संहिता न होकर उसके एक छोटे से पंथ की आचरण संहिता का हिस्सा है और इस तरह यह दूसरे धर्मो के बीच ही नही अपितु हिंदुओ के दूसरे पंथो के बीच भी विभाजन पैदा करता है। तेरहवी शताब्दी में माधवाचार्य ने जिन षड दर्शनो की चर्चा की है उनमे शैव, शाक्त, वैष्णव, जैन, बौध्द और चार्वाक दर्शन सम्मिलित हैं। इनमे से बाद में, प्रथम तीन को हिन्दू धर्म के दायरे में समेट दिया गया। इनमे से प्रथम दो के मानने वालो में पवित्रता के नाम पर प्रतिबंधित की गयी वस्तुओ के उपयोग की कोई मनाही नही है। पवित्र नगरी उज्जैन में प्रसिध्द भैरो मंदिर में शराब का प्रसाद चढता है, शैव उपासको के बीच भंग, गांजा आदि नशो का प्रयोग सामान्य है देवी मंदिर में बलि की बहुत पुरानी परंपरा है। केवल वैष्णवो और जैनो में मांसाहार वर्जित है। बौध्दो में हिंसा करना पाप माना गया है किंतु अनेक बौध्द अपनी स्वरूचि के अनुसार मृत पशु का मांस सेवन करते हैं। अभी कुछ वर्षो पूर्व ही भाजपा नेता श्रीमती मेनका गांधी और दलाई लामा के बीच का पत्र व्यवहार सार्वजनिक चर्चा का विषय बना था जिसमे मनेका गांधी ने उनसे मांसाहार न करने की अपील की थी।

ओशो रजनीश ने तो महावीर पर बोलते हुये कहा था कि महावीर को कभी ये कहने की जरूरत नही पड़ी कि मांस मत खाओ। उन्होंने अहिंसा का जो संदेश दिया था उसे आत्मसात करने वाला मांस खा ही नही सकता। इसलिए समाज में अहिंसा का संदेश और व्यवहार मांसाहार न करने की सलाह से अधिक महत्वपूर्ण है।

तथाकथित पवित्र नगर की घोषणा करने वाली सरकार के लोगो की पार्टी और उसकी मातृ संस्था के चरित्र और इतिहास पर दृष्टि डालने पर इस घोषणा की पृष्ठभूमि स्पष्ट हो जाती है। भाजपा और आरएसएस को धार्म से कुछ भी लेना देना नही है अपितु उन्हे धर्म की रक्षा के नाम पर सेना बनाने और उस सेना को तथा धर्म के नाम पर उसे मिले समर्थन को अपने राजनीतिक हितो में भुनाने की चिंता रहती है व उसी को दृष्टि में रख कर वे सारे कदम उठाते हैं। उनके द्वारा ना तो कोई धर्मिक कार्य किया जाता है और ना ही धर्मो में निहित मानवीय भावनाओ से उनकी राजनीति का कोई रिश्ता होता है। वे केवल विवादास्पद धर्मस्थलो की चिंता करते हैं जिससे उसके बहाने समाज में विभाजन पैदा कर सके व बहुसंख्यको की भावनाओ को अपने राजनीतिक समर्थन में बदल सके।

सरकार द्वारा पवित्र नगर घोषित कर देने से कोई पवित्र नगरी अधिक पवित्र नही हो जाती अपितु इस कार्य से दूसरे धर्म वालो को अपने धर्म की आचार संहिता पर लग रहे प्रतिबंधो के कारण गुलामी का अहसास होता है व प्रतिरोधा की भावना पनपती है। यह भावना आगे चल कर किसी दुर्घटना के बाद आपसी तनाव और हिंसा में प्रकट होती है। अगर प्रदेश में किसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी की सरकार होती तो वह लाखो लोगो के आस्था के केन्द्रो को धर्मिक पर्यटन स्थल का नाम देकर उसके लिए विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण के अर्न्तगत लाकर एक ऐसा मास्टर प्लान तैयार करवाती जिसमे प्लान के अनुसार ही विक्रय स्थलो के आवंटन की व्यवस्था होती। इन स्थलो में मांस और मांसाहार के लिए कोई स्थान नही दिया जाता। शराब की दुकानो के केन्द्र तो पहले ही से सरकार ही तय करती है इसलिए वह उन स्थलो पर शराब की दुकानो के लाइसेंस ही नही दे सकती थी। सार्वजनिक स्थल पर शराब पीने व पीकर हंगामा करना तो पूर्व से ही अपराधा है जिसे उक्त क्षेत्रो में कानून व्यवस्था को कठोरता से लागू कर यह लक्ष्य पाया जा सकता था। किंतु इस तरह के आचरण से भाजपा व संघ का राजनीतिक स्वर्थ हल नही होता और ना ही अपने पक्ष के लोगो का भावनात्मक विदोहन संभव हो पाता।

पुरातत्व स्मारको से भरपूर इस प्रदेश में जगह जगह तीर्थस्थल भरे पड़े हैं व पूरी आशंका है कि भविष्य में उद्योगो की मांग को, अपने नगर को पवित्र स्थल घोषित करने की मांग से भटका दिया जाये और नौकरी तथा विकास की जगह पवित्र नगरी घोषित करने की मांग ले ले। हो सकता है कि मुसलमानो द्वारा ईद के दिन दी जाने वाली कुर्बानी प्रदेश भर में आपसी टकराव का आधार बन जाये। अच्छा होता कि अगर सरकार में यह सद्बुध्दि पैदा होती जो धार्म में निहित मानव सेवा को ही धार्म मानकर ऐसा वातावरण तैयार करती कि सब एक दूसरे के धर्म का सम्मान करते आंतरिक सुरक्षा में खर्च हाने वाले रूपयो की बचत होती। आखिर कितने दिनो से हम बिना पवित्र नगरियाँ घोषित किये अपने तीर्थो को सुरक्षित ही नही रखे हुये हें अपितु एक दूसरे के धर्म के प्रति सम्मान रखते रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि आज धर्म को मानने वालो और धर्म के राजनीतिक स्तेमाल करने वालो के बीच के भेद को पहचाना जाये।
 

वीरेंद्र जैन