संस्करण: 23फरवरी-2009

 

राष्ट्रीय एकता मजबूत करने के
लिए गांधीवादियों का शंखनाद

 

एल.एस.हरदेनिया

नेक गांधीवादी संगठनों और गांधीवादियों की संयुक्त पहल पर बंगलौर में 13 से 15 फरवरी 2009 तक राष्ट्रीय एकता सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में देश के विभिन्न स्थानों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। सम्मेलन में राष्ट्रीय एकता को चुनौतियां और उनसे मुकाबला करने की रणनीति पर विचार किया गया।

सम्मेलन का आयोजन श्री श्री रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग के अनतर्राष्ट्रीय केन्द्र में किया गया था। सम्मेलन में शामिल सभी प्रतिनिधियों को केन्द्र में ही स्थित विशाल भवनों में ठहराया गया था।

सम्मेलन का उद्धाटन करते हुए श्री श्री रविशंकर ने कहा कि सही राष्ट्रीय एकता उसी समय कायम हो सकती है जब सभी देशवासी एक सूत्र में बंधाकर बांटने वाली ताकतों को शिकस्त दें। उन्होंने मुंबई की आतंकवादी घटनाओं से सबक सीखने की आवश्यकता पर जोर दिया। आपने कहा कि ईराक को अमेरिका ने पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। मैंने अपने ईराक प्रवास के दौरान वहां की त्रासद स्थितियों को देखा है। वहां दस लाख से भी ज्यादा बच्चे अनाथ हो चुके हैं। वहां एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए परमिट की आवश्यकता होती है। किसी भी स्थान पर प्रवेश पाने के पूर्व तीन प्रकार के सुरक्षा कर्मचारियों द्वारा आपकी जाँच की जाती है। इन तीन सुरक्षा कर्मियों में से एक अमरीकी होता है। हमारे देश में अनेक क्षेत्रों में गंभीर स्थितियां हैं। इन क्षेत्रों में कश्मीर, असम सहित पूर्वोतर के राज्य शामिल हैं। ईराक, कश्मीर व पूर्वोत्तर की घटनाओं से स्पष्ट है कि हिंसा से समस्याओं का हल नहीं हो सकता।

श्री श्री रविशंकर के अलावा उद्धाटन सत्र को भूतपूर्व मंत्री व कर्नाटक के पूर्व मुख्य सचिव डॉ. जे. एलेक्जेन्डर, महात्मा गांधी की पोती तथा कस्तूरबा मेमोरियल ट्रस्ट की उपाधयक्ष श्रीमती तारा भटाचार्य, पूर्व केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, प्रख्यात समाजसेवी डॉ. एस. एन. सुब्बाराव, विश्ववाद के एनसाईक्लोपीडिया के मुख्य संपादक डॉ. जोधा सिंह ने भी संबोधित किया।

उद्धाटन सत्र के बाद पहला वैचारिक सत्र प्रारंभ हुआ। वैचारिक सत्र में सर्वप्रथम भारत निर्माण प्रतिष्ठान के सचिव तथा सम्मेलन के मुख्य आयोजक एस. व्ही. मंजूनाथ ने सम्मेलन की विषयवस्तु पर प्रकाश डाला।

मंजूनाथ ने अपने चार पृष्ठ के पेपर में कहा कि इस समय देश की एकता को सबसे गंभीर खतरा विभिन्न धार्मांवलंबियों के बीच बढ़ती असहिष्णुता से है। इस असहिष्णुता को निहित स्वार्थी तत्व दिन-रात हवा देते रहते हैं। इसके फलस्वरूप आतंकवादियों समेत अनेक विघटनकारी ताकतें सिर उठा रही हैं। एक ओर जहाँ आतंकवाद का नाता मुसलमानों से जोड़ा जाता है वहीं उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ हिन्दू संगठन भी हिंसक गतिविधियों में संलग्न पाये जा रहे हैं। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी छुआछूत का कलंक व्याप्त है। इस प्रवृत्ति से पीड़ित दलितों का एक वर्ग हिंसा का सहारा लेता है। गरीबी भी एक ऐसा अभिशाप है जिससे देश की एकता प्रभावित होती है। विश्व बैंक के अनुसार हमारे देश में 42 प्रतिशत जनता आज भी गरीबी से पीड़ित है। भाषायी राज्यों के गठन के बावजूद भाषा के नाम पर विवाद हो रहे हैं। इतने वर्षों के बाद भी हमारे देश में सारे देश की एक राष्ट्रभाषा नहीं है। इन सब विवादों और देश की एकता को खतरा पहुंचाने वाले तत्वों के बावजूद एक क्षेत्र ऐसा है जो संपूर्ण देश को एक सूत्र में जोड़ता है। वह सूत्र है संस्कृति का। संगीत, नृत्य, नाटक और कला के अन्य स्वरूपों से जुड़ी सांस्कृतिक गतिविधियो के विभिन्न आयाम देश को एकता के एक सूत्र में जोड़ते हैं। सबसे ज्यादा चिंता की बात है कि सरकार,  राजनैतिक पार्टियां और राजनेताओं में से कोई भी राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के प्रति चिंता प्रगट नहीं करता। इस सम्मेलन के दौरान हमें उन उपायों को खोजने का प्रयास करना है जिनसे राष्ट्रीय एकता की नींव को और मजबूत किया जा सके।

मंजूनाथ के भाषण के बाद अनेक प्रतिनिधियों ने अपने विचार प्रगट किए। आरिफ मोहम्मद खान, जिन्होनें शाहबानो मामले में मतभेद के कारण राजीव गांधी की मंत्रिपरिषद से इस्तीफा दिया था, कहा कि शाहबानो मामले में कानून बदलने से और राम मंदिर के दरवाजे खुलवाने से देश में जो वातावरण बना उससे देश की एकता काफी हद कमजोर हुई है। अनेक प्रतिनिधियों ने मंगलौर की घटनाओं को दु:खद बताते हुए कहा कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा हिन्दू छात्र-छात्राओं से कहा जाता है कि वे मुसलमान व ईसाई छात्रों से किसी भी प्रकार का संबंधा न रखें। फूट डालने की इससे ज्यादा गंभीर हरकत और कोई हो नहीं सकती। उत्तरप्रदेश से आए प्रतिनिधियों का कहना था कि उत्तरप्रदेश जातिवाद और साम्प्रदायिकता के कारण बुरी तरह से विभाजित है। इसी तरह का विभाजन अन्य राज्यों में भी हो रहा है। यह भी बताया गया कि बांटने वाली ताकतें युवकों को बरगला रही हैं और इससे इन ताकतों को और बल मिलता है। तमिलनाडू से आए एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ने कहा कि इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि अंग्र्रजों ने भारत(इंडिया) दिया और गांधीजी ने हमें भारतीयता दी। हमें उन आधारों को मजबूत करना चाहिए जिन पर महात्मा गांधी की भारतीयता खड़ी थी। हमें उन तत्वों को एक होकर मजबूती से शिकस्त देना चाहिए जो हमें  धर्म, सम्प्रदाय और जाति के नाम पर बांटने का प्रयास करते हैं। साम्प्रदायिक प्रचार, साम्प्रदायिक साहित्य को प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए। देश की एकता को कमजोर करने में मीडिया प्रमुख भूमिका निभा रहा है। यदि देश की एकता को मजबूत करना है तो हमें चुनाव प्रणाली में बुनियादी सुधाार करना होगा। वर्तमान में साम्प्रदायिक और देश को विभाजित करने वाली राजनैतिक पार्टियां भी चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त कर लेती हैं और लोगों को धर्म व जाति के नाम पर अपना वोट बैंक बना लेती हैं और फिर इस वोट बैंक के सहारे सत्ता पर काबिज हो जाती हैं और सत्ता का दुरूपयोग विभाजन की रेखा को और गहरा करने के लिए करती हैं। अत: चुनाव प्रणाली में इस तरह का सुधार किया जाना चाहिए जिससे इन ताकतों को प्रजातांत्रिक प्रक्रियाओं का लाभ न मिल सके। भारत विभिन्न धर्मोका देश है। देश की एकता उस समय तक मजबूत नहीं होगी जबतक विभिन्न धर्मोको मानने वाले सह-अस्तित्व से जीने की कला न सीखें। यह बात प्राय: कही जाती है कि सभी धर्मोका संदेश एक है परंतु इस सत्य से हमें सर्वप्रथम बच्चों को अवगत कराना चाहिए। यह उसी समय संभव है जब हम शिक्षण संस्थाओं, विशेषकर स्कूलों के पाठयक्रम में सर्वधर्म समभाव को शामिल करें। अनेक वक्ताओं ने कहा कि सामंतवाद व छुआछूत का चोली-दामन का साथ है। छुआछूत के अभिशाप को मिटाने के लिए हमें सामंतवादी अवशेषों को दफन करना होगा। इसके लिए हमारे धर्मशास्त्रों की सही विवेचना आवश्यक है। गांधीजी ने कहा था कि यदि वर्ण व्यवस्था हिन्दू धर्म का हिस्सा है तो मैं हिन्दू बना रहना नहीं चाहता। इस तरह के विचारों की आज भी आवश्यकता है।

सम्मेलन में महिलाओं और आदिवासियों की स्थिति पर भी विचार किया गया और यह मत प्रगट किया गया कि दोनों की स्थिति में सुधार देश की एकता के बीच सीधा संबंधा है।

जिस देश में 42 प्रतिशत जनता गरीब हो उस देश की एकता कैसे मजबूत रह सकती है। गरीबी का उन्मूलन करने के लिए अनेक सुझाव दिए गए जिनमें सबसे महत्वपूर्ण सुझाव था कि हमारे देश में भारी तादाद में उत्पादन की आवश्यकता है। परन्तु यह उत्पादन मशीनों के स्थान पर हाथों से हो तो गरीबी दूर करने में मदद मिलेगी। एक सुझाव अंग्रेजी में भी दिया गया। सुझाव देने वाले वक्ता ने कहा था "India needs mass production but it should be by masses and not by machinery".   



एल.एस.हरदेनिया