संस्करण: 23फरवरी-2009

 

''बिजली संकट-बचत ही एकमात्र हल''

 

 

स्वाति शर्मा

राबिजली हमारे जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। जैसे-जैसे हमारे देश ने औद्योगिक व तकनीकी दृष्टि से विकास किया है, वैसे-वैसे हमारी बिजली पर निर्भरता भी बढ़ती गई है। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र जैसे कृषि, उद्योग, परिवहन, चिकित्सा, शिक्षा, संचार यहाँ तक कि रसोई में भी बिजली के बिना काम करना असंभव सा लगता है। जनसंख्या निरंतर बढ़ती जा रही है, जो बिजली की खपत को बढ़ाती है। सन् 1947 में जनसंख्या 34 करोड़ थी, तब देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता 1362 मेगावॉट थी। आज जनसंख्या 1 अरब से ज्यादा हो गई है, तब देश की कुल स्थापित विद्युत क्षमता 1 लाख मेगावॉट है। बात म.प्र. की करें तो यहाँ मांग व पूर्ति के बीच 1500 मेगावॉट का अंतर बना हुआ है। प्रदेश में बिजली का उत्पादन हर साल 8.64 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ना चाहिए लेकिन मांग और पूर्ति के बीच का अंतर घटने का नाम ही नहीं ले रहा हैं। प्रदेश में साढ़े पांच से छह हजार मेगावॉट की उच्चतम मांग के विरूध्द 4500 से लेकर 5000 मेगावॉट बिजली ही उपलब्धा हो पा रही है, इसमें 800 से 1000 मेगावॉट बिजली जल विद्युत परियोजनाओं से मिल रही है, जबकि हाइडल प्रोजेक्ट की स्थापित क्षमता 3318 मेगॉवाट है। बारिश कम होने से बांधा नहीं भर पाए हैं। इस वजह से जल विद्युत परियोजनाओं से विद्युत उत्पादन घट गया है, जो बारिश के बाद ही सुधारेगा। बिजली की मांग प्रतिवर्ष 10 से 12 प्रतिशत बढ़ रही थी, जो आज 40 प्रतिशत हो गई है। अर्थात जिस अनुपात में मांग बढ़ी है, उस अनुपात में विद्युत की स्थापित क्षमता व वैकल्पिक संसाधान नहीं बढ़े हैं। अत: अब मांग व पूर्ति के बीच संतुलन बनाना असंभव सा होता जा रहा है। इन सबका परिणाम बिजली की कटौती के रूप में सामने आता है।

आज प्रदेश में हर स्तर पर विद्युत कटौती हो रही है। तहसील मुख्यालयों में तक 10-12 घंटे की कटौती होती है, तो गांवों की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि सरकार का दावा है कि पिछले साढ़े तीन वर्षों में प्रदेश के विद्युत उत्पादन क्षमता में 2741 मेगावॉट की वृध्दि की है। लेकिन गांव व तहसीलों का घंटों अंधोरों में डूबे रहना इस दावे की वास्तविकता उजागर करता है। आज कृषक तथा विद्यार्थी इस कटौती से सर्वाधिाक प्रभावित हो रहे हैं। उचित सिंचाई तथा पढ़ाई के लिए बिजली की भरपूर उपलब्धाता ज़रूरी है। बिजली के इस संकट को तत्काल दूर करने का सरकार के पास कोई उपाय नहीं है, अत: मई-जून में जब बिजली की मांग और बढ़ेगी, तब स्थिति कितनी भयानक होगी, इसका अनुमान लगाना कोई कठिन कार्य नहीं है। बिजली संकट को बढ़ाने में बिजली की चोरी का बहुत योगदान रहा है। सिर्फ़ गरीब बस्तियों में ही नहीं उच्च वर्ग के लोगों द्वारा भी बिजली की चोरी की जा रही है। कुल बिजली का लगभग आधाा हिस्सा 50 प्रतिशत चोरी में चला जाता है। हालांकि चोरी को रोकने हेतु मुहीम चलाई जा रही है लेकिन जब तक उपभोक्ता तथा अधिाकारी अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वहन ईमानदारी से नहीं करेंगे, इस चोरी को रोकना बड़ा ही कठिन कार्य है।

अब हमारे हाथ में इस बिजली संकट से निबटने का एकमात्र रास्ता यह रह जाता है, कि इसका दुरूपयोग न करें। व बिजली की बचत हेतु सभी को प्रोत्साहित करें। आज घर-घर में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का बोलबाला है। यदि परिवार का प्रत्येक सदस्य सावधाानी रखे तो बिजली की बहुत बचत की जा सकती है। घरों में बल्ब की जगह सीएफएल का प्रयोग करें, ये कम बिजली खपत में पर्याप्त रोशनी देते हैं। पंखों में इलेक्ट्रॉनिक रेगुलेटर लगवाएँ। पंखों आदि में ग्रीसिंग करते रहें। टीवी का मेन स्विच हमेशा बंद रखे। फ्रिज को बार-बार न खोलें तथा गर्म सामान भी फ्रिज में न रखें। घर, दुकान, चक्की आदि सभी जगह सही गेज के तारों का प्रयोग करें। सोते समय उन्हीं कमरों में रोशनी रखें, जिनमेें ज़रूरी हो। वाशिंग मशीन, आयरन का प्रयोग तभी करें जब कपड़े ज्यादा हों। गीजर तथा हीटर का प्रयोग भी संतुलित करें। एयर कंडीशनर का लगातार उपयोग न करके बीच-बीच में बंद रखें। ठंड में रूम हीटर प्रत्येक कमरे में न लगाकर ऐसे स्थान पर लगाएँ, जिससे अधिकतर कमरे गर्म हो सकें। अस्पताल, बैंक, सिनेमा, रेस्टारेंट आदि में बहुत अधिक बिजली की खपत होती है, अत: यहाँ बचत की संभावनाएँ भी अधिक हैं। उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए इन स्थानों पर कई तरह के लाइटस, हैलोजन, मर्करी, निऑन लाइट तथा एयर कंडीशनर का प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाता है। इन चीजों को पूरे समय चालू न रख कर, त्योहारों व ग्राहकों की अधिक उपस्थिति के समय ही प्रयोग में लाया जाए, तो काफ़ी मात्रा में बिजली की बचत की जा सकती है। सार्वजनिक क्षेत्रों, कार्यालयों एवं संस्थाओं में बिजली का बहुत दुरूपयोग होता है, चूंकि वहांँ बिल का भुगतान हमें नहीं करना होता, अत: हम अनावश्यक विद्युत यंत्रों को चालू रहने देते हैं। जबकि इन संस्थानों में उपयोग के बाद पंखा, लाइट, कंप्यूटर, ए.सी. आदि बंद कर देने से 25 से 30 प्रतिशत बिजली की बचत की जा सकती है। आज कृषि क्षेत्र में भी विद्युत की खपत लगातार बढ़ रही है, लगभग 50 प्रतिशत विद्युत की खपत कृषि कार्यों में होती हैं। यदि कृषि यंत्रों, मोटर तथा अन्य कनेक्शनों की उचित देखभाल की जाए व घर्षण रहित रखा तो बिजली की काफ़ी बचत की जा सकती है। इसी तरह औद्योगिक क्षेत्र में भी विद्युत यंत्रों की उचित देखभाल द्वारा बचत में योगदान दिया जा सकता है।

हालांकि केंद्र सरकार का मानना है कि अगले पांच वर्षों में प्रति व्यक्ति एक हज़ार यूनिट का इंतजाम हो जाएगा। देश में अभी लगभग 14 फीसदी बिजली की कमी है, इसे पूरा करने के लिए अगले पांच सालों में 78 हजार मेगावाट की नई परियोजनाओं की पहचान की गई है। लेकिन आम जनता को भी अपनी ओर से प्रयास करने होंगे।कटौती के विरोधा में बिजली दफ्तरों में पथराव, तोड़-फोड़ आदि से कोई हल नहीं निकल सकता। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर बिजली का दुरूपयोग रोक कर बचत में अपना योगदान दे ताकि देश व प्रदेश को बिजली संकट से कुछ राहत मिल सके।

स्वाति शर्मा