संस्करण: 22 अक्टूबर-2012

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क्या ऐसा ही सुशासन देश को देंगे गडकरी जी ?

           11 अक्टूबर को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी जी भोपाल में थे। उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा की रैली को संबोधित किया और अपने कार्यकर्ताओं व उपस्थिति जनसमूह को बताया कि यूपीए सरकार के नेताओं से अच्छे तो मध्यप्रदेश के डकैत थे। उन्होंने एक और बात कही कि केवल भाजपा ही देश को सुशासन दे सकती है। मुझे पता नहीं कि मध्यप्रदेश के डकैतों के विषय में गडकरी जी ने कोई शोध किया है या उन्हें किसी ने यह जानकारी दी है, और देश को सुशासन देने का दावा वे किस आधार पर कर रहे हैं, लेकिन उसके ठीक दूसरे दिन यानि 12 अक्टूबर को मध्यप्रदेश के लोकायुक्त पीवी नावलेकर ने सागर में जो जानकारी दी, मुझे विश्वास है कि उससे गडकरी जी को कुछ अलग ही अहसास हुआ होगा।

? विवेकानंद


सड़क पर धर्म

        क समय था जब लोग धर्म के लिए धार्मिक स्थलों और धर्म के पालकों व प्रचारकों  के पास स्वयं जाते थे, किंतु प्रत्येक धर्म में उसके जन्म के एक निश्चित समय के बाद पाखंड और जड़ता घर करती जाती है तथा धर्म के बारे में बिना प्रश्न किये विश्वास करने की परंपरा के कारण कुछ निहित स्वार्थ अपना उल्लू सीधा करने लगते हैं। यही कारण होता है कि निश्चित समय खण्ड (युग) के बाद एक प्रवर्तक नया धर्म प्रारम्भ करता है। दो धर्मों के संधि काल में धर्म प्रचारकों के हित में लगी हुयी ताकतों के भय से व्यक्ति अपनी शंकायें और असहमतियां तो प्रकट नहीं कर पाता किंतु वह उस युग के तथाकथित धार्मिक स्थलों और व्यक्तियों से बचने लगता है।    

? वीरेन्द्र जैन


स्वर्ण मंदिर में देशद्रोहियों के स्मारक का निर्माण

क्या भाजपा दमखम से विरोध करेगी?

   भी हाल में दो ऐसी घटनायें हुई हैं जिनसे यह संदेह पैदा होता है कि सिक्ख आतंकवाद पुन: अपना सिर उठाने का प्रयास तो नहीं कर रहा। इन दो घटनाओं में से पहली का संबंध ले जनरल के.एस.ब्रार पर हुआ प्राणघातक हमला है और दूसरी घटना उन लोगों के लिये स्वर्ण मंदिर में स्मारक बनाना है जिनने जनरल अरूण वैद्य की हत्या की थी। ब्रार और वैद्य उन आर्मी अधिकारियों में से हैं जिनके नेतृत्व में 1984में आपरेशन ब्लू स्टार की कार्यवाही हुई थी। आपरेशन ब्लू स्टार उस सैनिक कार्यवाही का नाम है जिसके तहत सिक्ख आतंकवादियों का सरगना भिंड़ारवाले के षड़यंत्र के विफल किया गया था। उस समय ऐसी खबर थी कि भिंड़ारवाले शायद आज़ाद खलिस्तान की घोषणा करने वाले हैं।

? एल.एस.हरदेनिया


यूपीए सरकार ने ही दिए हैं

भ्रष्टाचार से लड़ाई के अस्त्र 

            गर यूपीए सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में देश की जनता को सूचना का अधिकार नामक अस्त्र  नहीं दिया होता तो क्या भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी के व्यापारिक करारों का खुलासा कोई कर सकता था?जैसा सूचना अधिकार कार्यकर्ता अंजलि दामनिया ने सुचना के अधिकार का उपयोग करते हुए गडकरी के व्यावसायिक साम्राज्य की उन्नति में राजनीतिक पावर के दुरूपयोग की बात का खुलासा कर राजनीति में नैतिकता का पाठ पढ़ाने वालों को बेनकाब किया है। अगर आज देश भर में भ्रष्ट्राचार के खिलाफ वातावरण बन रहा है तथा आम नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता भ्रष्टाचारियों के चेहरे उजागर कर पा रहें हैं तो वो केवल सूचना के अधिकार की खातिर!  

? डॉ. सुनील शर्मा


बेटियों की पुकार, सुनो सरकार

साहब ,बच्चे गुमते नहीं,

गुमाये जाते हैं

कहता रहा गुमशुदा बेटी

का बाप बार बार

लेकिन

उसकी नहीं सुनी थानेदार ने

कहता रहा थानेदार

 ?   अमिताभ पाण्डेय


समस्या तो तब पैदा होती है

जब 'पद' सिर पर चढ़कर बोलता है !

                  कोई भी व्यक्ति न तो कोई समस्या है और न ही हर कोई व्यक्ति समस्या पैदा करता है। समस्या तो हरदम तब खड़ी होती है जब व्यक्ति नहीं उसके अंदर का 'इगो' सिर पर चढ़कर बोलने लगता है। किसी भी तरह का 'पद' चाहे वह छोटा हो या बड़ा, हर किसी के बूते की बात नहीं होती कि वह उसके अनुरूप अपने आपको एडजस्ट कर ले। कई ऐसे उदाहरण बिना ढूंढे मिल जाते हैं, जिसमें यह पाया जाता है कि व्यक्ति तो छोटा होता है, किंतु 'पद' बड़ा होता है। लेकिन जहां-जहां व्यक्ति के बड़े होने की स्थिति में उसे कितना ही बड़ा या छोटा पद मिले वह एक अच्छा व्यक्ति ही बना रहता है।

? राजेन्द्र जोशी


नीतीश का विरोध

क्या बदलाव की मांग है..?

      सुशासन की कथित राह पर अग्रसर बिहार में अधिकार यात्रा निकाल रहे नीतीश कुमार का विरोध अब और मुखर हो चला है। हालांकि उनकी अधिकार यात्रा का मकसद बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाना है मगर आम आदमी की मूलभूत आवश्यकताओं की अनदेखी और कागजों पर कथित विकास के बड़े-बड़े दावे करना उन्हें अब भारी पड़ रहा है। भागलपुर में जहाँ नीतीश को काले झंडे दिखाए गए वहीं नवादा में उनका स्वागत चप्पलों से हुआ। हद तो तब हो गयी जब एक सभा में उनके ऊपर एक युवक ने कुर्सी तक फेंक दी।

? सिध्दार्थ शंकर गौतम


संदर्भ :- निजता के बहाने सूचना के अधिकार पर अंकुश की कवायद

जानने के हक पर अंकुश की कवाय

      निजता के बहाने जानने के अधिकार, मसलन सूचना के अधिकार पर अंकुश लगाने की कवायद तेज होती दिखाई दे रही है। हालांकि अधिकार के पर कतरने की शुरुआत तो तभी हो गई थी,जब मनमोहन सिंह सरकार ने सीबीआई को सूचना के अधिकार कानून के दायरे से बाहर कर दिया था। अब प्रधानमंत्री ने केंद्रीय सूचना आयुक्तों के सातवें सम्मेलन में कहा है कि लोगों के जानने के अधिकार से अगर किसी की निजता का हनन होता है तो निश्चित रुप से इसका दायरा निर्धारित होना चाहिए,जिससे इसके निरर्थक प्रयोग पर प्रतिबंध लगे।

? प्रमोद भार्गव


संदर्भ : पाकिस्तान में स्त्री शिक्षा के विरुध्द तालिबानी आतंक

क्या मलाला की कोशिशें रंग लाएंगी ?

        जकल पाकिस्तान की चौदह वर्षीय मलाला यूसुफजई की चर्चा पूरे विश्व में हो रही है। तालिबान के विरोध और स्त्री-शिक्षा के पक्ष में अभियान छेड़ने के कारण उसे आतंकी हमले का शिकार होना पड़ा है। ज्ञातव्य है कि कट्टरपंथी विचारधारा  और रूढ़िवादी मानसिकता के कारण पाकिस्तान में महिलाओं की उन्नति का मार्ग आज भी बाधित है। तथापि वहां महिलाओं के अधिकार के लिए किये गये आंदोलन की संख्या नगण्य है। राष्ट्रपति जिया उल हक़ के समय हुदूद नियम के विरोध में एक अधिनियम पास हुआ है। इसके अंतर्गत बलात्कार पीड़िता को अपने पक्ष में चार पुरुष गवाह उपलब्ध न करा पाने पर अवैध संबंधों के मुकदमें झेलने पड़ते हैं।

? डॉ. गीता गुप्त


अब मानसिक विकृति के फैलाव पर

लगेगी रोक

       जकल मोबाइल के माध्यम से वीभत्स क्लिपिंग और एसएमएस-एमएमएस भेजना आसान हो गया है। थोडे समय की मस्ती के लिए ये भले ही मजाक हो, पर यह मजाक भारी पड़ सकता है। इसके लिए कानूनी रूप से सजा का भी प्रावधान है। पर अभी हमारे देश में जागरुकता की कमी के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। वीभत्स क्लिपिंग और एसएमएस की शिकार अधिकांश छात्राएँ या महिलाएँ ही होती हैं, जो लोकलाज के भय से सामने नहीं आतीं। इसलिए कई मामले दब जाते हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। सरकार इस दिशा में गंभीर हो गई है। इस मामले में दोषी पाए जाने पर पहली बार में 3 साल की जेल और 50 हजार से लेकर एक लाख का जुर्माना और दूसरी बार में 7 साल की जेल और एक लाख से लेकर 5 लाख का जुर्माना होगा। इसलिए अब आज के युवाओं को इस दिशा में सतर्क हो जाना चाहिए।

    

? डॉ. महेश परिमल


गरीबी रेखा में पिसता गरीब

        देश भर में गरीबी को लेकर मोंटेकनुमा बहसों के साथ जो तथ्य और आंकड़े पिछले कुछ सालों में सामने आये हैं, उसने गरीब और गरीबी की परिभाषाओं को लगातार उलझाने का काम किया है। अब तक की तमाम सरकारें गरीबों की संख्या कम होने का दावा करती रही हैं लेकिन न गरीब कम हुये और ना ही गरीबी। उलटे हमारी अर्थव्यवस्था ने पिछले दो दशकों में इनकी संख्या में भयावह तरीके से इजाफा किया है और सरकारी दस्तावेज झूठ गढ़ने में लगे हुये हैं। योजना आयोग ने 19 मार्च 2012 को प्रेस में जारी एक नोट के द्वारा घोषणा की कि हमारे देश में गरीबी घटी है। इसके अनुसार पूरे देश में सन् 2004-05 की तुलना में सन् 2009-10 में गरीबी 7.3 प्रतिशत घटी है।

? राखी रघुवंशी


  22 अक्टूबर-2012

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