संस्करण: 22 अगस्त- 2011

 

 

नज़रों से ओझल

दृष्टिहीनों के सवाल

 

 

 

 

 

? सुभाष गाताड़े

               दृष्टिहीनों के लिए इम्तिहान के वक्त उपलब्ध किए जाते 'स्क्राइब' अर्थात लेखक का सवाल नए सिरेसे विचारणीय हो उठा है। यह बात पूछी जा रही है कि बीसवीं सदी के मध्य में जिस समझदारी के तहत इसके बारे में नियम तय किए गए थे,वे विज्ञान-टेकनोलोजी की प्रगति,नेत्रहीनों तथा अन्य विशिष्ट चुनौतिवाले लोगों के बारे में इन्सानियत का बदला रूख,अलग देशों द्वारा इस दिशा में उठाए गए कदमों के परिणाम आदि के सन्दर्भ में आखिर किस हद तक प्रासंगिक रह गए हैं।

               विडम्बना ही कही जाएगी कि एक राष्ट्रीकृत बैंक द्वारा आयोजित लिखित परीक्षा में पिछले दिनों कुछ दृष्टिहीन प्रत्याशियों को जिस आधार पर परीक्षा देने से वंचित किया गया,उसके चलते इस मसले पर बहस चल पड़ी है। ज्ञातव्य हो कि बैंक की इस लिखित परीक्षा में चन्द दृष्टिहीन प्रत्याशियों को इसी आधार पर परीक्षा देने से रोका गया क्योंकि अपने साथ जिस स्क्राइब को वे लाए थे, उसकी मार्कशीट उनके पास नहीं थी।

               मालूम हो कि लम्बे समय से यह नियम बनाया गया है कि नेत्रहीन प्रत्याशी को जिस स्क्राइब/लेखक को उपलब्ध किया जाएगा उसकी योग्यता एक दर्जा कम हो तथा वह साठ फीसदी से कम अंक पाया हो। इसका आधार यही समझा जाता रहा है कि इससे नेत्रहीन प्रत्याशी को अतिरिक्त फायदा नहीं मिलेगा। इसके अलावा उन्हें अन्य प्रत्याशियों की तुलना में महज बीस मिनट ज्यादा दिए जाते हैं।

               नेत्रहीनों तथा उनके लिए सक्रिय समूहों द्वारा बार बार यह मसला उठाया जाता रहा है कि अगर सुयोग्य स्क्राइब न मिले, जो दृष्टिहीनों की समस्या के प्रति सहानुभूति न रखता हो, तो किस तरह उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। यह बात भी कही जाती रही है कि जितनी तेजी से इम्तिहानों में माक्र्स मिलने का प्रतिशत बढ़ा है,उसके चलते अक्सर यह नौबत आती है कि नेत्राहीनों के लिए 'नियमों' के तहत उपलब्ध स्क्राइब उतना योग्य न हो, यहां तक कि वह प्रत्याशी की बातों को ठीक से लिख भी न सके।

               ध्यान रहे कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में ऐसे दृष्टिहीन जो ब्रेल लिपि नहीं जानते हैं उन्हें एक माह पहले बताया जाता है कि वे किस 'स्क्राइब/लेखक' की सुविधा ले सकते हैं, जिससे स्पेलिंग आदि ठीक करने में सुविधा होती है। उन्हें यहभी विकल्प दिया जाता है कि वह चाहे तो अपने जवाब रेकार्ड करें। आस्टे्रलिया और न्यूजीलेण्ड में भी दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को अपने जवाब रेकार्ड करने की सुविधा दी जाती है। अपने देश के अन्दर भी इस मसले पर कोई समरूप नियम नहीं हैं। पिछले दिनों बंगलौर विश्वविद्यालय ने अपनी कार्यकारिणी की बैठक में यह तय किया कि स्क्राइब का एक दर्जा कम होना जरूरी नहीं है, वह समकक्ष भी हो सकता है बशर्ते वह ज्ञान की उसी शाखा से सम्बध्द न हो। इसके अलावा उन्होंने ऐसे छात्रों के लिए एक घण्टा अतिरिक्त समय दिया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में स्क्राइब के एक दर्जा कम पढ़ा होने की कोई बन्दिश नहीं है। वक्त आने पर संस्थान के लेक्चरर भी नेत्रहीन छात्रों की सहायता के लिए इस भूमिका में उतर सकते हैं। आधिकारिक तौर पर देखें तो दृष्टिहीन विद्यार्थी अपने जवाब रेकार्ड कर सकें इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग सैध्दान्तिक तौर पर स्वीकृत करता है,मगर उसने इस दिशा में अमल करने को लेकर कोई कदम नहीं बढ़ाए हैं।

               दृष्टिबाधितों को झेलनी पड़ती अन्य तमाम असुविधाओं के बारे में बात की जा सकती है। मगर असली मसला यही जान पड़ता है कि चाहे दृष्टिबाधित हों या विशिष्ट चुनौतीवाले अन्य लोग हों, लोगों का या समाज का रूख उनकी विशिष्ट स्थितियों को लेकर सम्वेदनशील नहीं है। एक मोटे अनुमान के हिसाब से दुनिया की आबादी का लगभग 8 से 10 फीसदी हिस्सा, चाहे दृष्टि के मामले में, मस्तिष्क के सुगठित इस्तेमाल को लेकर या अपने अवयवों की खास स्थिति के चलते किसी न किसी विशिष्ट चुनौती का शिकार है।

               विशेष चुनौतियों वाले व्यक्तियों के प्रश्न पर 1978 में प्रकाशित अपनी चर्चित किताब 'हैण्डिकैपिंग अमेरिका' में विकलांगों के अधिकारों के लिए संघर्षरत फ्रैंक बोवे लिखते हैं कि असली मुद्दा विकलांगता के प्रति - फिर चाहे वह दृष्टिजनित हो या चलनजनित -सामाजिक प्रतिक्रिया का है। अगर कोई समुदाय भौतिक, स्थापत्यशास्त्रीय, यातायात सम्बन्धी तथा अन्य बाधाओं को बनाये रखता है तो वह समाज उन कठिनाइयों का निर्माण कर रहा है जो विकलांगता से पीड़ित व्यक्ति को उत्पीड़ित करते हैं। दूसरी तरफ, अगर कोई समुदाय इन बाधाओं को हटाता है, तो विकलांगता से पीड़ित व्यक्ति अधिक उंचे स्तर पर काम कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो 'विकलांगता' सामाजिक तौर पर निर्मित होती है।

               निश्चितही बोवे को इस बात का अनुमान नहीं रहा होगा कि हिन्दोस्तां में विकलांगों से भोंडे ढंग से भेदभाव का सिलसिला जारी रखने के लिए सरकारी स्कीमें और कार्पोरेट सेक्टर किस किस किस्म के हथकण्डे अपनाते हैं ? पिछले साल ही ख़बर आयी थी कि भारत सरकार की पोस्टल लाइफ इन्शुरेन्स योजना विकलांग कर्मचारियों से भेदभाव करती है। दृष्टिबाधित विकास गुप्ता और एडवोकेट पंकज सिन्हा द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में इसे लेकर दायर जनहितयाचिका के बाद यह सवाल मौजूं हो उठा था जहां यह पता चला था कि वह इन कर्मचारियों से अतिरिक्त प्रीमियम लेती है। (टाईम्स आफ इण्डिया, 11 मार्च 2010)

               दिल्ली उच्च अदालत के न्यायाधीश मदन लोकुर और मुक्ता गुप्ता ने इस याचिका को लेकर सरकार से यह स्पष्टीकरण मांगा था कि वह विकलांगों से अतिरिक्त चार्ज क्यों ले रही है। ध्यान देनेलायक बात यह है कि याचिकाकर्ताओं ने पीठ के सामने ब्रेल लिपी का इस्तेमाल करते हुए अपनी याचिका रखी और इस बात को रेखांकित किया कि केन्द्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों को 'कवर' करनेवाली उपरोक्त योजना में विकलांग कर्मचारियों से न केवल अतिरिक्त प्रीमियम लिया जाता है बल्कि उनके लिए गारंटीशुदा राशि/सम एशुएर्ड भी अन्य कर्मचारियों की तुलना में कम है।

               स्पष्ट है कि सरकार की उपरोक्त नीति न केवल वर्ष 1995 में बने 'पर्सन्स विथ डिसएबिलिटीज्' का उल्लंघन कर रही थी बल्कि विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय कन्वेन्शनों की भी अनदेखी करती है। ध्यान देनेलायक बात है कि विकलांगों के साथ होनेवाले खिलवाड़ में बैंक और वित्तीय संस्थाएं भी आगे रहती हैं, जिसका खुलासा प्रस्तुत घटना के कुछ माह पहले हुआ था।  सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के जी बालकृष्णन, न्यायमूर्ति पी सथासिवम और न्यायमूर्ति बी एस चौहान की पीठ के सामने प्रस्तुत जनहितयाचिका के चलते इस काण्ड से परदा उठा था। ('बैंक्स पाकेटिंग फण्डस् मेन्ट फार डिसएबल्ड', टाईम्स आफ इण्डिया, सितम्बर 5, 2009)। पता चला था कि देश के तमाम वित्तीय संस्थान एवम बैंक वर्ष 1993 से हर साल सूद पर एकत्रित करों से जमा लगभग 724 करोड़ रूपए अपने पास ही रख रही हैं जो उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के हिसाब से ऐसे फण्ड के निर्माण में लगाना है जिसके माधयम से विकलांग व्यक्तियों के लाभ के लिए बने 'विकलांग अधिानियम' को अमल में लाया जा सके।

               विकलांगों से अतिरिक्त प्रीमियम लेने या उनके लिए मुकरर राशि को अपने खातों में रखनेवाले बैंक या सरकार द्वारा विशेष प्रोत्साहन राशि दिए जाने की घोषणा के बावजूद उन्हें अपने यहां नौकरी पर न रखनेवाले कॉर्पोरेट समूह - इस परिस्थिति को कैसे समझा जा सकता है ? क्या इसे वित्तीय संस्थानों तथा कार्पोरेट जगत पर भी हावी 'सक्षमवाद/एबलिजम' (इसमे उध्द की धारणा का परिणाम कहा जा सकता है।

               ''नस्लवाद' और 'यौनवाद' की तरह भले ही यह शब्द हमारे भाषाई विमर्श में उतना प्रचलित नहीं हो, लेकिन यह उस समझदारी को बयां करता है जहां 'सामान्य जीवन' का पैमाना उन लोगों से तय होता है जो विकलांग नहीं हैं। और इसी वजह से विकलांग लोग अपनी शारीरिक या बौध्दिक क्षमताओं की भिन्नता के कारण मुख्यधारा में अपमान का शिकार होते हैं। सक्षमवाद को यूं परिभाषित किया जाता है ''ऐसे सामाजिक सम्बन्ध, व्यवहार और विचार जो इस धारणा पर आधारित होते हैं कि सभी लोग सक्षम शरीरों वाले होते हैं। एक सक्षमवादी समाज पार्थक्य/बहिष्करण पर जोर देता है जबकि एक समावेशी समाज सब लोगों को साथ ले चलने का आग्रह करता है।''

               गगनबीर सिंह, अहमदाबाद का दृष्टिगत चुनौती से पीड़ित एक छात्रा, कुछ समय पहले मुख्यधारा की मीडिया की सूर्खियों में पहुंचा था। वजह भी खास थी, उसे अहमदाबाद तथा दो अन्य स्थानों पर बनी आई आई एम ने प्रवेश का न्यौता दिया था। और यह मुक़ाम उसने किसी की कृपादृष्टि से नहीं बल्कि अपने बलबूते प्रवेश परीक्षा पारित कर हासिल किया था।

               गगनबीर के आसमान छूने की ख़बर जब सूर्खियों में आयी थी उसी दिन से अर्थात मई माह के दूसरे दिन  'विकलांगता से पीड़ित सभी व्यक्तियों के लिए तमाम मानवाधिकार और बुनियादी आज़ादी सुनिश्चित करने , उनकी रक्षा करने एवम उनको बढ़ावा देने के लिए तथा उनकी अन्तर्निहित गरिमा के प्रति सम्मान को बढ़ावा देने के लिए' संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा पारित कन्वेन्शन लागू हुआ था। दरअसल विकलांगता सम्बन्धी विमर्श में पहले 'समाजकल्याण' कदमों को उठाने पर जोर था और इसे 'मानवाधिकार का मुद्दा' बनाने से दुनिया बहुत दूर खड़ी थी और कन्वेन्शन ने इसी बात को ठीक किया था। जाननेयोग्य है कि तब तक विकलांगता को 'चिकित्सकीय मॉडल'के सन्दर्भ में ही अधिकतर देखा-समझा जाता रहा था अर्थात जो विकलांगता को शारीरिक/मानसिक हानि/क्षति के समकक्ष रख देती है। लेकिन बदलते समय में उसके 'सामाजिक मॉडल'पर जोर दिया जाना जरूरी हो गया था। संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में जिस कन्वेन्शन का आगाज़ किया गया था उसके पीछे मूल चिन्ता यही थी कि 'समाजकल्याण और चैरिटी/धर्मादाय को हम नये अधिकारों एवम आजादियों के जरिये स्थानापन्न करना चाहिए।'

               नज़रों से ओझल दृष्टिबाधितों के सवालों पर विचार करते वक्त बरबस बीसवीं सदी में व्यापक स्तर पर प्रशंसित उस शख्सियत की याद आना स्वाभाविक हैं, जो विश्वप्रसिध्द लेखिका थी जिन्होंने 14 किताबें लिखी थीं और वह पैंतीस मुल्कों की यात्रा कर चुकी थी। मेहनतकशों की मुक्ति के आन्दोलन के साथ अपने आप को जोड़नेवाली हेलेन केलर राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ती एवं व्याख्याता भी थी। सभी जानते हैं कि समूची दुनिया में नज़ीर बनी हेलेन केलर जनम से कर्णसम्बन्धी विकलांगता (बहरापन) और नेत्रसम्बन्धी विकलांगता (अंधी) थी। लेकिन इन 'विकलांगताओं' के चलते उन्होंने अपने आप को कभी भी कमतर महसूस नहीं किया।

               'सक्षमतावाद' का शिकार समाज में हेलेन केलेर ने अपनी उड़ान भरी थी, क्या 21 वीं सदी में हम नहीं चाहेंगे कि हर विकलांग उसी तरह आसमान छूने का माद्दा रखे जैसा उसने किया था। क्या हम इसके बारे में कारगर फैसला लेने के लिए तैयार हैं ?

 
? सुभाष गाताड़े