संस्करण: 22 अगस्त- 2011

 

किसी का कटा हुआ है हाथ, किसी का पांव

क्या मंझधार में ही डूब जायेगी नाव !  

 

? राजेन्द्र जोशी

               समुद्र में तूफान आया हुआ हो और लहरें उठ रही हो, ऐसे में नैया खेने वाले नाविकों के हाथ कटे हों, किसी के पांव कट गये हों, किसी की मुंडी कटी हो और जुबानें कट गई हों तो क्या ऐसी नाव बीच मझधार में डावांडोल होकर लड़खड़ाकर डूब नहीं जायेगी ?क्या कुछ इस तरह के सवालों से वर्तमान में डगमगा गया है प्रदेश की सत्ता का राजनैतिम माहौल। कोई खिवैया कहता है कप्तान ने हाथ काट दिए हैं,कोई कहता है मैं विकलांग हो गया हूं, कोई कहता है मेरी कलम बोथरी कर दी गई है, कोई कहता है, मेरी धड़ अलग कर दी गई हैं ऐसे में डगमगा रही नावों के खिवैयों को अपने अतीत का स्मरण हो आना स्वाभाविक है। सचमुच राजनैतिक माहौल कुछ ऐसा ही हो गया है जहां,नैया खेने वालों की आंतरिक पीड़ाऐं सार्वजनिक तौर पर उभरकर आने लगी है। जब हाथ,पांव और जुबानें ही कट गई हों वहां कैसे तो नाविक पतवार ही पकड़ेगा, जुबान नहीं है तो कैसे हैया हो हैया.... का समूह गान गायेगा और मुंडी कटी हो तो कैसा कोई सकारात्मक सोच विचार करेगा। विकलांग हो जाने की स्थिति में दबंग से भी दबंग व्यक्ति की दबंगाई भाड़ में चली जाती है। जब कलब बोथरी कर दी गई हो तो कैसे कोई फाइलों पर दस्तखत कर पायेगा। बड़ी विडम्बना पूर्ण स्थिति का निर्माण हो गया है।

               यह सारी स्थिति तब और साफ तौर पर सार्वजनिक हुई जब हाल ही में इंदौर के सार्वजनिक मंच पर प्रदेश के मुखिया माननीय मुख्यमंत्री जी से हुए वाकयुध्द में उनके मंत्रिमंडल के उनके एक दबंग सहयोगी उद्योग मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय के दर्द की कराह माइक पर उनके मुखारबिन्द से फूटकर सामने आई। लगता है उद्योग मंत्रीजी इंदौर शहर के विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की शैली से जरा भी संतुष्ट नहीं हैं। सही भी है शहर के एक विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित श्री विजयवर्गीय अपने शहर के प्रति दिली लगाव रखते हैं और वे वर्तमान में अपनी भूमिका के गौण हो जाने पर दुखित और कुपित है। उन्होंने माननीय मुख्यमंत्री जी की उपस्थिति में ही अपनी पीड़ा को व्यक्त करते हुए कहा कि मुझे तो फिल्म शोले का ठाकुर बना दिया गया है जिसके हाथ काट दिए गये हैं। उन्होंने याचना के रूप में आग्रह किया कि 'मुख्यमंत्रीजी मेरे हाथ लौटा दो।' यह कहते हुए वे यह कटु सत्य भी बोल गये कि 'पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी ने तो मुझे महापौर की हैसियत से शहर के विकास के लिए 'फ्री हैंड' दे रखा था। यहां तक कि श्री दिग्विजय सिंह के तमाम अधिकारियों को ये निर्देश भी थे कि -'जो कैलाश विजयवर्गीय कहे वहीं करो। अभी ऐसा नहीं है।'श्री विजयवर्गीय के इस तेवर के प्रदर्शन से भारतीय जनता पार्टी के अंदरखाने में चल रही बातें सतह पर आ गई हैं।

               अंदर की बात को यदि गहराई से देखा जाय तो लगता है कि यह स्थिति प्राय: सभी सहयोगियों की भी है जो सत्ता से जुड़े हुए हैं। लेकिन सबकी जुबानों पर ताले जड़े होने से उनकी आवाजें भीतर से बंद है। प्रदेश के प्राय: सभी बड़े शहरों और यहां तक कि छोटी-छोटी जगहों पर भी भाजपा के भीतर कई नेताओं के दिलों में यही दर्द पल रहा है। शायद इस दर्द को झेलने की लाचारी से सब दबे हुए हैं। इन्दौर जैसे राजनैतिक रूप से जागरूक बड़े शहर से मुख्यमंत्री की उपस्थिति में श्री विजयवर्गीय का जो रूप देखने को मिला उसका अन्य स्थानों पर भी असर देखने को मिल सकता है। सार्वजनिक तौर पर मुखर होने वालों में श्री विजयवर्गीय ही एक ऐसे मंत्री हैं जो अपनी तर्क के साथ मंच पर अभिव्यक्त हुए है। कुछ सदस्य भी अपनी पीड़ाओं को संकेत ही संकेत में अभिव्यक्त कर चुके हैं। कुछ समय पूर्व मंत्रिमंडल के उम्रदराज सदस्य श्री राघवजी भाई भी बड़ी शालीनता से अपने इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं। मीडिया के यदा कदा यह भी पढ़ने को मिल जाता है कि अनेक ऐसे मंत्री हैं जो अपने क्षेत्रों की यात्रा करने से कतरा रहे हैं। कुछ सदस्यों के बारे में मीडिया के माध्यम से यह भी उजागर हो रहा है कि उन्हें टीम के कप्तान भी पसंद नहीं करते हैं किंतु भाजपा हाई कमान की मंशा के आगे कप्तान को चुप ही रह जाना पड़ता है। यह टीम कप्तान की मजबूरी का संकेत है। टीम कप्तान के सामने अपनी टीम को लेकर चलना अब उतना आसान नहीं रह गया है जितना कि दावा किया जाता रहा है। जिस तरह संकटकाल से गुजर रहे कतिपय सदस्यों के समक्ष अपने अस्तित्व को बचाये रखने की चुनौतियां हैं वे एक न एक दिन उन्हीं की जुबानी अभिव्यक्त होकर ही रहेगी, ऐसे माहौल का निर्माण शनै: शनै: होता जा रहा है। टीम कप्तान की राहों में अनेक कांटे और दचके आ रहे हैं। भाजपा की बुलंद नेत्री और प्रदेश की पूर्व मुख्य साध्वी उमाजी के भाजपा पुन: प्रवेश ने भी भाजपा के कई प्रादेशिक दिग्गजों में खलबली मचा दी है। अब भाजशा पार्टी का विलय भी भाजपा में हो गया है। जो भाजपा से जाकर पुन: भजपा में आ गये हैं उनके कारण भी कप्तान की जड़ में मठा तो पड़ ही गया है। कप्तान की जुबान भी अब तो लड़खड़ाने लगी है। उन्होंने श्री विजयवर्गीय के तेवर में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए यह भी कह डाला कि ''मैं सब कुछ हूं यह सोच नहीं होना चाहिए।'' जबकि हकीकत को यही है कि मुखिया के मुख से ही यह शब्दावली अक्सर निकली रहती है कि ''मैं हूं ना''। यह मैं हूं का राग यदि जारी रहता है तो आगे चलकर यह साबित होने में कोई कसर नहीं बचेगी कि 'सचमुच' वे ही अकेले होंगे।

               कप्तान की सफलता इसी से मानी जायगी कि वह अपनी टीम के सदस्यों के कटे हाथ-पांव को जुड़वा दें ताकि जो लोग कैलाश विजयवर्गीय नहीं है, ऐसे लाचार लोगों की जुबान पर ताले न पड़े रहें।

 

? राजेन्द्र जोशी