संस्करण: 22 अगस्त- 2011

संदर्भ : माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में गैर कानूनी नियुक्तियां

सरकारों के साम्प्रदायिक एजंडे का विरोध हो

? जाहिद खान

                हमारे मुल्क के किसी भी हिस्से में जब भी बीजेपी या उसके गठबंधन की सरकारें सत्ता में आती हैं, तो उनका सबसे पहला कदम आरएसएस के एजंडे को आहिस्ता-आहिस्ता लागू करना होता है। और अपने इस एजंडे को अमल में लाने के लिए वे किसी भी हद तक गुजर जाती हैं। नरेन्द्र मोदी का गुजरात इसकी एक छोटी सी मिसाल है। गुजरात में मोदी सरकार ने संघ के साम्प्रदायिक एजंडे को अपने यहां हमेशा खुलकर लागू किया है। कमोबेश इसी राह पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हैं। दूसरी बार सत्ता में आने के बाद, शिवराज सिंह ने उस नेहरूवादी एजंडे को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है, जिसके केन्द्र में एक बहुलतावादी, बहु-सांस्कृतिक तथा धर्मनिरपेक्ष एजंडा था। इस बदलाव को हासिल करने का सबसे आसान तरीका है, शिक्षा को निशाना बनाना। गोया कि शिवराज हुकूमत में यदि कहीं सबसे ज्यादा हस्तक्षेप हुआ है, तो वह शिक्षा है। शिवराज सरकार, लगातार ऐसे फरमान जारी करती रहती है,जो शिक्षा में साम्प्रदायिकरण को बढ़ावा देते हैं। सभी सरकारी स्कूलों में सूर्य नमस्कार व मध्यप्रदेश गान को अनिवार्य करना, गीता का पाठ पढ़ाया जाना और संघ से जुड़ी विद्याभारती की पत्रिका 'देवपुत्र' को सारे स्कूलों के लिए अनिवार्य करते हुए उन्हें वार्षिक ग्राहक बना देना, यह कुछ बानगी भर है। वरना, सूबे में सभी महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थाओं और संगठनों का पूरी तरह से पुनर्गठन कर दिया गया है, ताकि संघ के 'हिंदुत्व' के एजंडे को आगे बढ़ाया जा सके।

               शिवराज सरकार का ताजा निशाना बना है, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता व संचार विश्वविद्यालय। इस विश्वविद्यालय में अभी हाल ही में हुई कुछ नियुक्तियां बतलाती हैं कि सरकार ने यहां भी अपना वही घिनौना खेल खेलना शुरू कर दिया है, जो कि वे दूसरी जगह खेलती रही हैं। सरकार ने विश्वविद्यालय में साल 2010-11 में जो भी नियुक्तियां की हैं,उन नियुक्तियों का पैमाना या तो संघ का सक्रिय कार्यकर्ता होना है, या फिर संघ-बीजेपी से नजदीकता। सरकार ने अपने चहेतों को बेजा फायदा पहुंचाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग व विश्वविद्यालय के नियमों और मधयप्रदेश आरक्षण नियमों यानी,सभी को ताक पर रख दिया है। इन नियुक्तियों के लिए न तो कोई विज्ञापन प्रकाशित किया गया,न कोई चयन समिति बनाई गई,न विश्वविद्यालय महापरिषद् की कोई बैठक हुई और न ही आरक्षण के किसी नियमों का पालन हुआ। जबकि, विश्वविद्यालय में तमाम नियुक्तियां महापरिषद् के अनुमोदन के बाद ही होती हैं। यही नहीं नियुक्तियां करते समय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों और दिशानिर्देशों को भी धयान में रखना होता है। ज्यादातर नियुक्तियों में इतनी खामियां और गड़बड़ियां हैं,कि शिवराज सरकार जांच के कठघरे में आ गई है। विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने इन गैर कानूनी नियुक्तियों का मुद्दा हाल ही में प्रदेश विधानसभा में भी पुरजोर तरीके से उठाया और सरकार से मांग की,इन अनियमित नियुक्तियों को रद्द कर लोकायुक्त या सदन की समिति से जांच करवाई जाए। यह मांग सही भी है। क्योंकि, नियमों के मुताबिक जहां मुख्यमंत्री इस विश्वविद्यालय की महापरिषद् का पदेन अधयक्ष होता है, वहीं विश्वविद्यालय का प्रशासनिक विभाग का जिम्मा जनसंपर्क महकमे के पास होता है। जाहिर है, वे लाख चाहें लेकिन अपनी जबावदेही से बच नहीं सकते।

               नियुक्तियों में हुई अनियमितताओं और गड़बड़ियों पर यदि नजर दौड़ाएं तो गड़बड़ियां बड़े स्तर पर हुई हैं। मसलन,विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के मुताबिक प्राधयापक पद के लिए अधिकतम आयु सीमा 70है, लेकिन संघ से जुड़े डॉ. एन. के. त्रिखा, जिनकी उम्र फिलवक्त 75 साल से ऊपर होगी, उन्हें विश्वविद्यालय में वरिष्ठ प्राधयापक के तौर पर संविदा नियुक्ति दे दी गई। जबकि,नियमों के तहत यह नियुक्ति वाजिब नहीं होने से डॉक्टर त्रिखा को 87,095रूपए का वेतन जारी नहीं किया जा सकता। यही नहीं अशोक टंडन जिन्हें वरिष्ठ प्राधयापक के ओहदे से नवाजा गया है, गर उनकी काबिलियत जाने, तो वे बीजेपी राष्ट्रीय अधयक्ष नितिन गडकरी के मीडिया सलाहकार रह चुके हैं। इसी तरह से पब्लिसिटी ऑफिसर के रूप में नियुक्त सौरभ मालवीय भी बीजेपी से अपनी नजदीकता के चलते इस ओहदे तक पहुंचे हैं। इन तीनों नियुक्तियों में सबसे बड़ी बात यह है कि तीनों नियुक्तियां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा लिखी नोटशीट के आधार पर हुईं। मुख्यमंत्री के नोटशीट लिखने के फौरन बाद उस पर जनसंपर्क विभाग के आयुक्त, उपसचिव और कुलपति की नोटिंग होकर तुरंत नियुक्ति आदेश जारी हो गए। यानी, यह नियुक्तियां सीधे-सीधे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के हस्तक्षेप के बाद ही मुमकिन हुईं।

               इन नियुक्तियों के अलावा विश्वविद्यालय में और भी कई ऐसी नियुक्तियां हुई हैं, जो सरकार की नीयत को पूरी तरह से उजागर करती हैं। नियम के मुताबिक किसी राजपत्रित अधिकारी को ही विश्वविद्यालय का वित्त अधिकारी बनाया जा सकता है। लेकिन इस पद पर नियुक्त रिंकी जैन की काबिलियत महज इतनी है कि वे संघ के एक ओहदेदार के बेटे की बहू हैं। इस मामले में सरकार को इतना ही काफी नहीं लगा और उसने रिंकी जैन के पति आदित्य जैन को भी कार्यालय अधीक्षक पद पर नियुक्त कर,पति-पत्नी दोनों को विश्वविद्यालय में एक साथ भारी भरकम तनख्वाह पर बिठा दिया। दीपक शर्मा जो ग्वालियर के पोलिटैक्निक कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर थे, उन्हें भी संघ से जुड़े होने का फायदा मिला और वे भी विश्वविद्यालय में आईटी डायरेक्टर बना दिए गए। यही नहीं और भी ऐसी कई नियुक्तियां हैं, जो पूरी तरह से नियमों को दरकिनार कर हुईं और उनमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग व विश्वविद्यालय के नियमों का जरा भी पालन नहीं किया गया। बस, 'अंधा बांटे रेबड़ी, चीन्ह-चीन्ह कर अपनों को दे' की तर्ज पर यह नियुक्तियां हुईं और इसमें संघ व बीजेपी से जुड़े लोगों को चुन-चुनकर नवाजा गया।

          कुल मिलाकर, मधयप्रदेश में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता व संचार विश्वविद्यालय की आज से 20 साल पहले जब स्थापना की गई तो इसका मकसद पत्रकारिता के क्षेत्र में शोध अधयन को बढ़ावा देना, पत्रकारों की नई पीढ़ी को तैयार करना था। लेकिन विश्वविद्यालय अब अपने घोषित उद्देश्यों से कम और शिवराज सरकार के नजरिए से ज्यादा प्रभावित है। विश्वविद्यालय में शोध अधयन, व्यावहारिक प्रशिक्षण व पठन-पाठन के स्तर में भारी गिरावट आई है। सुविधायुक्त टी.वी. स्टुडियो, छोटा रेडियो स्टेशन व प्रिंटिग प्रेस जैसी बुनियादी सहुलियतें न होने की वजह से विधार्थियों को व्यावसायिक व व्यावहारिक प्रशिक्षण दोनों ही बिल्कुल भी नहीं मिल पा रहा है। रही सही कसर विवादास्पद नियुक्तियों ने कर दी है। विश्वविद्यालय के अहम पदों पर संघ से जुड़े लोगों की नियुक्ति के बाद, पढ़ाई का स्तर क्या रह जाएगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। शिक्षा का साम्प्रदायिकरण, शिक्षा संस्थाओं के जनतांत्रिक कामकाज के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है। साम्प्रदायिकरण का एजंडा आखिरकार, संस्थाओं के जनतांत्रिक ढंग से काम करने के खिलाफ ही जाता है। शिक्षण संस्थाओं का जनतांत्रिक, बहुलतावादी, बहु-सांस्कृतिक और धार्मनिरपेक्ष स्वरूप बचा रहे, इसके लिए जरूरी है कि सरकारों के साम्प्रदायिक एजंडे का हमेशा विरोध किया जाए। क्योंकि, तभी हमारे मुल्क का लोकतांत्रिक स्वरूप भी बच पाएगा।


? जाहिद खान