संस्करण: 22 अगस्त- 2011

जन्मांध फिजियोथेरेपिस्ट ने

मासूम को दी नई जिंदगी

? डॉ. महेश परिमल

              कहते हैं जहाँ चाह, वहाँ राह। मुजिलें तब आसान हो जाती हैं, जब मिल जाता है कोई अपना सा। थोड़ा-सा बल, थोड़ी-सी हिम्मत, थोड़ा-सा अपनापन और थोड़ा-सा प्यार, बस हो जाती हैं मंजिलें पार। सोचो, कोई चौथी मंजिल से गिरे, खून का एक कतरा तक न निकले, फिर भी गरदन से नीचे का पूरा भाग लकवाग्रस्त हो जाए, तो कैसी हो जाएगी जिंदगी। जिंदगी,उस मासूम की, जिसने अभी केवल चार वसंत भी नहीं देखे हैं। पर जिजीविषा के आगे सभी नतमस्तक हो जाते हैं, ठीक उसी तरह नन्हीं जेबा ने अपने जबे से वह सब कुछ पा लिया, जिसे वह पाना चाहती थी। दर्द के इस सफर में उसके साथी बने, नेत्रहीन फिजियोथेरेपिस्ट रोहित सावंत। डॉ. सावंत ने जब मासूम का मुआइना किया और उसके पालको से जब कहा कि आपकी बच्ची चल-फिर सकेगी और दौड़ेगी भी। तो पालकों को सहसा विश्वास नहीं हुआ। एक नेत्रहीन फिजियोथेरेपिस्ट ऐसे कैसे कह सकता है। जिसने दुनिया नहीं देखी, वह कैसे विश्वास से कह सकता है कि वह दुर्घटना में अपाहिज हुई इस मासूम को कैसे दुनिया दिखा सकता है? पर जब उस नेत्रहीन ने कुदरत को भी हरा दिया, तब पालकों के ऑंसू थमते नहीं थे।

               यह वाकया है गुजरात के सूरत शहर की। यहाँ के एक मोहल्ले अडालज में रहने वाली साढ़े तीन साल की जेबा छत पर खेल रही थी। अचानक चौथी मंजिल से वह गिर पड़ी। उसके शरीर से खून का एक कतरा भी नहीं निकला, पर उसके स्पाइनल कॉड सी-4 में जमे खून के एक कतरे ने उसे बिस्तर के हवाले कर दिया। अब उसका बचपन कैद हो गया उसी बिस्तर पर। माता-पिता से बच्ची की लकवाग्रस्त हालत देखी नहीं जाती थी। उन्होंने कई शहरों में जाकर बच्ची का इलाज करवाना चाहा। मुम्बई में कई डॉक्टरों को दिखाया। पर कुछ फायदा नहीं हुआ। सभी डॉक्टर यही कहते कि इस मासूम को या तो कोई फिजियोथेरेपिस्ट बचा सकता है या फिर दुआएँ। अंतत: वे भेस्तान स्थित एक फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. रोहित सावंत के पास पहुँचे। डॉ. सावंत पूरी तरह जन्मांधा हैं। जेबा की जाँच के बाद उन्होंने पाया कि बच्ची का इलाज हो सकता है, तो उन्होंने उसके पालकों से कहा- आप लोग निश्ंचित हो जाएँ, यह बची अन्य बच्चों की तरह न केवल चलने बल्कि दौड़ने भी लगेगी। डॉक्टर सावंत की यह बात हवा में नहीं उड़ गई, कुछ दिनों बाद ही चमत्कार हुआ। उसकी बात पत्थर की लकीर साबित हुई।

               एक वर्ष के इलाज के बाद अब मासूम जेबा चलने लगी है। उसके चेहरे की खुशी को देखते ही बनती है। पालकों का हाल ही न पूछो, उनकी खुशी का पारावार ही नहीं। वे डॉ. सावंत की तारीफ के पुल ही बाँधाते रहते हैं। इलाज के दौरान जेबा ने भी डॉक्टर के साथ पूरा सहयोग किया। उसे तो चलना और दौड़ना था, इसलिए डॉ. सावंत ने उसे जैसा कहा, उसने वैसा ही किया। दोनों की जीवटता के सामने प्रकृति हार गई। जेबा फिर अन्य बच्चों की तरह खेलने-कूदने लगी। अब वह अपना एक साल का बचपन फिर जीना चाहती है। उसकी बाल सुलभ मुस्कान को बनाए रखने के लिए स्कूल प्रशासन ने भी पूरा सहयोग किया। आज जेबा हँस रही है, खेल रही है, कूद रही है। अब तो उसने तय कर लिया है कि वह डांस करना सीखेगी। माता-पिता तो हतप्रभ हैं। आज उनकी बच्ची उनकी ऑंखों के सामने ही अपने पैरों पर खड़ी है। वे कभी अपनी मासूम जेबा को देखते हैं, तो कभी डॉ. सावंत को। दोनों के लिए उनके हाथ खुदा से दुआओं के लिए उठ जाते हैं। या खुदा दूसरों को जिंदगी देने वाले को कभी उनके हिस्से की खुशियों से महरुम मत करना।


? डॉ. महेश परिमल