संस्करण: 22 अगस्त- 2011

कुपोषण से लड़ाई के लिए

दूध उत्पादन में वृध्दि जरूरी है

? डॉ. सुनील शर्मा

               बेलगाम मॅहगाई ने देश करोड़ो मध्यमवर्गीय परिवारों  का बजट बिगाड़ दिया  है और गरीबों को रोटी का जुगाड़ कर पाना भी दूभर हो रहा है। ऐसी स्थिति में भूख के साथ साथ कुपोषण तेजी से पांव पसार है। क्योंकि भीषण मॅहगाई के इस दौर में 2400 कैलोरी का आहार जूटा पाना सहज नहीं रह गया है। जो भर पेट रोटी का जुगाड़ कर पा रहे है वो भी कुपोषितों की कतार में आने वाले वाले हैं। क्योंकि उनके आहार में आवश्यक मात्रा में पोषक तत्व शामिल हैं ही नहीं और शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्व प्रोटीन,कार्बोहाइडेट,विटामिन और मिनरल्स का सर्वथा अभाव है। इन पोषक तत्वों के स्त्रोत फल,सब्जी,दालें और दूध आम आदमी की पहॅूच से बाहर है,अण्डे का अधिकांश शाकाहारी उपयोग नहीं करते हैं हालॉकि इसकी कीमतें भी आसमान पर है। पोषक तत्वों के स्त्रोत में दूध एक आवश्यक तत्व है जिसमें प्रोटीन,विटामिन और मिनरल्स की पर्याप्त मात्रा होती है तथा यह सर्व स्वीकार्य भी है। वास्तव में देश के शाकाहारी समाज को दूध की पर्याप्त आपूर्ति उनमें कुपोषण की स्थिति से बचा सकती है।लेकिन दूध आम आदमी की पहॅुच से बाहर होता जा रहा है।

               ऑकड़ों के हिसाब से भारतीय चिकित्सा अनसंधान परिषद् के अनुसार एक मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन कम से कम 280 ग्राम दूध एवं दूध से बने पदार्थों का सेवन आवश्यक है। जबकि देश में दूध की प्रति व्यक्ति खपत 246 ग्राम ही है। जो कि विश्व की औसत खपत 265 ग्राम प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन से कम है। हालॉकि 2010-11 में दूध का उत्पादन 116.20 करोड़ टन के साथ हमारा देश दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है,लेकिन सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है। वास्तिविकता में देश की बड़ी जनसंख्या दूध खपत के औसत का ऑकडे से काफी पीछे है और देश में गरीबी की रेखा के नीचें जीवन व्यतीत कर रहे 30 करोड़ लोगों को 30ग्राम दूध प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन की उपलब्धता भी नहीं हो पा रही है। तथा करोड़ों लोग महीनों तक दूध की एक बूॅद तक नहीं ले पाते है। दूध की खपत शहरी और धनी लोगों में बढ़ी है मगर गरीब और मधयमवर्गीय तबके से दूध दूर हूआ है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में जो कि दुग्ध उत्पादक क्षेत्र हैं काफी कम है। आर्थिक सर्वे से स्पष्ट हुआ है कि देश में दुग्ध उत्पादन में वार्षिक वृद्वि की दर 3 फीसदी है जो कि 5.5 फीसदी प्रतिवर्ष होना जरूरी है,नहीं तो प्रति व्यक्ति दुग्ध उपलब्धता लगातार घटती जाएगी और दूध महॅगा होता जाएगा। देश के प्रत्येक व्यक्ति को समुचित मात्रा में दूधा उपलब्ध हो सके। इसके लिए काफी प्रयासों की आवश्यकता है, क्योंकि दुग्ध उत्पादन में वृध्दि न केवल देश की जनता को पोषण देगी वरन् उसकी आय में वृध्दि और रोजगार के अवसरों को भी बढ़ायेगी। चूॅकि हमारे देश में दुग्ध उत्पादन का अधिकांश कार्य लघु व सीमांत किसान तथा भूमिहीन श्रमिक करते हैं तथा इन वर्गों में ज्यादातर समाज के कमजोर वर्ग ही शामिल हैं। एक आंकलन के अनुसार देश की 75 प्रतिशत गाय बैल तथा 85 प्रतिशत भैंसे लघु व सीमांत किसानों एवं भूमिहीन श्रमिकों के पास हैं। इन पशुओं की उत्पादकता में वृध्दि प्रत्यक्ष रूप से इन वर्गों की आर्थिक समृध्दि तो बढ़ायेगी ही साथ ही गरीबी उन्मूलन में सहायक होगी। लेकिन यह क्षेत्र अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। इनमें सबसे प्रमुख समस्या पशु आहार उपलब्धता की है। चूॅकि पशुओं की उत्पादकता आहार और चारे की पौष्टिकता पर निर्भर करती है,परंतु सारे देश में पशु पालन एवं डेयरी विभाग के अनुसार देश में उपलब्ध पशुचारा केवल 46.7प्रतिशत पशुओं की आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है।वर्तमान में हरे चारे की उपलब्धता 396.5 मि.टन है जबकि आवश्यकता 1061मि.टन की है। सूखे चारे की उपलब्धता 451 मि.टन है जबकि आवश्यकता 585 मि.टन की है। वर्ष 2015में हरे चारे की उपलब्धता 400 मि.टन होगी जबकि आवश्यकता 1097 मि.टन की होगी वहीं सूखे चारे की उपलब्धता 466 मि.टन एवं आवश्यकता 585 मि.टन की होगी। है। भूसा और चारे के कमी के कारण इनके दाम काफी अधिक हैं तथा ठोस आहार के रूप मे उपयोगी खली भी निर्यात के कारण अत्यंत महॅगी होती जा रही है,इस पर अविलम्ब रोक आवश्यक है क्योंकि इसके कारण दूध उत्पादन लगातार महॅगा होता जा रहा है जिससे बाजार में दूध के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और आम आदमी के आहार से दूध बाहर होता जा रहा है।

               देश में जनसंख्या के हिसाब से पशुधन में कमी आई है। 1951 में जहां 40 करोड़ जनसंख्या पर 15.50 करोड़ पशु थे, वहीं 2001 में 110 करोंड़ जनसंख्या पर मात्र 16 करोड़ पशु रह गये हैं। वर्तमान आंकड़े और भी ज्यादा चिंताजनक हैं। देश में पशुओं की संख्या तो लगभग स्थिर है ही साथ ही देश की अनेक दुग्ध उत्पादक स्थानीय नस्लों पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। 1950 में जहां 57 देशी नस्लें अस्तित्व में थी वहीं वर्तमान में लगभग 29 नस्लें ही इनमें शेष हैं। हमारे देश में दुधारू पशुओं की औसत क्षमता भी वैश्विक स्तर से काफी कम है जहॉ हमारे देश में औसतन दुग्ध उत्पादन क्षमता 1200 लीटर वार्षिक है जबकि विश्व का औसत 2200 लीटर है।

               वास्तव में हमारे देश में दुग्धा उत्पादन में वृद्वि की अच्छी संभावनाएॅ हैं।अगर सरकार पशुपालकों सस्ते पशुआहार और दुधारू नस्ल के पशुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करती है तो दुग्ध उत्पादन में वृद्वि के साथ बेलगाम होती कीमतों पर रोक संभव है। दूध की उपलब्धता में वृद्वि और कीमतों में नियंत्रण देश में बढ़ती कुपषितों की संख्या पर विराम देगी।


? डॉ. सुनील शर्मा