संस्करण: 22सितम्बर-2008

गूगल क्रोम बनाम क्लाउड कम्प्यूटिंग :

विंडोज जैसे ऑपरेटिंग सिस्टम की

अब किसे परवाह है

 

रविशंकर श्रीवास्तव

आज की कम्प्यूटिंग दुनिया इंटरनेट के आसपास ही सिमट रही है। नेट पर आज आपको हर तरह के ऑनलाइन औजार मिलेंगे। संपूर्ण ऑफ़िस सूट।  जिसमें वर्ड, एक्सेल, प्रजेंटेशन इत्यादि आवश्यक सॉफ्टवेयर होते हैं, से लेकर फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर तक, और व्यक्तिगत प्रयोग के लिए इनमें से बहुत कुछ बिलकुल मुफ्त। ऐसे में आपको एक क्षुद्र सा ऑपरेटिंग सिस्टम कर्नेल सहित सिर्फ एक अदद ब्राउज़र (जो महज कुछ सौ मेगाबाइट जगह में आसानी से आ सकते हैं,) और बढ़िया गति के इंटरनेट कनेक्शन की दरकार होगी बस। आपको विंडोज विस्टा जैसे 8 गीगा बाइट जगह घेरने वाले भारी भरकम ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकता नहीं होगी। आपका ब्राउज़र ही आपके समस्त प्रकार के दैनंदिनी के कम्प्यूटिंग कार्यों र्को निपटाने में सक्षम होगा। इंटरनेट पर दूरस्थ सर्वर पर स्थापित अनुप्रयोगों को विविध प्रकार से उपयोक्ताओं द्वारा चलाए जाने की इस सुविधा को एक नया नाम दिया गया है। क्लाउड कम्प्यूटिंग।

 

क्या है ये क्लाउड कम्प्यूटिंग

 

इंस्टीटयूट ऑफ इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स कम्प्यूटर सोसाइटी के मुताबिक, क्लाउड कम्यूटिंग का अर्थ है कि इंटरनेट पर सर्वरों में जानकारियाँ (अनुप्रयोग, वेब पेजेस, प्रोग्राम इत्यादि सभी) सदा सर्वदा के लिए भंडारित रहती हैं और ये उपयोक्ता के डेस्कटॉप, नोटबुक, गेमिंग कंसोल इत्यादि पर आवश्यकतानुसार अस्थाई रूप से संग्रहित रहती हैं। इसे थोड़ा विस्तारित और सरल रूप में कहें तो सीधी सी बात है कि अब तक जो सॉफ्टवेयर प्रोग्राम आप स्थानीय रूप से अपने कम्प्यूटर और लैपटॉप-नोटबुक पर संस्थापित करते रहे थे, अब इनकी कतई आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि ये सब सॉफ्टवेयर अब आपको वेब सेवाओं के जरिए मिला करेंगी। यही नहीं, गूगल गियर जैसे अनुक्रमों के जरिए आपको इस तरह की बहुत सारी सुविधाएं ऑफ़लाइन भी मिला करेंगीं।

 

क्लाउड कम्प्यूटिंग के क्या फ़ायदे हैं

 

क्लाउड कम्प्यूटिंग एक नया विचार है। इसे पूरी तरह तैयार होने व इसे पूरी तरह अपनाने में थोड़ा सा समय लगेगा। पर ये बात तो तय है कि भविष्य का कम्प्यूटिंग माहौल कुछेक विशिष्ट अवस्थाओं को छोड़कर क्लाउड कम्प्यूटिंग पर ही निर्भर होगा। क्योंकि क्लाउड कम्प्यूटिंग के अनेकानेक फ़ायदे हैं। कुछ यहां गिनाए जा सकते हैं वे हैं।

  •  उपयोक्ता को अपने लो एण्ड कम्प्यूटर पर हाई-एण्ड सर्वर की शक्ति युक्त कम्प्यूटिंग माहौल मिलेगा. उदाहरण के लिए आपके 5 गीगाबाइट मेल बक्से में से काम का ईमेल ढूंढने में आपके स्थानीय पीसी को पाँच-दस मिनट लग सकते हैं, वहीं, ये काम यदि आपके ईमेल जीमेल की तरह यदि इंटरनेट पर हैं तो वहां सर्च करने में आपको 20-25 सेकण्ड ही लगेंगे क्योंकि सारा मामला सर्वरों और ग्रिड कम्प्यूटिंग के जरिए सम्भाला जाता है जिससे इंडेक्सिंग व सार्टिंग जैसे भारी भरकम कम्प्यूटिंग कार्य भी तीव्रता से सम्पन्न होते हैं।

  •   उपयोक्ता को किसी तरह के अनुप्रयोगों व कम्पयूटर प्रोग्रामों को अपने कम्प्यूटर पर संस्थापित करने की आवश्यकता नहीं होगी। ये प्रोग्राम वेब सेवाओं के रूप में ब्राउज़रों के जरिए आसानी से उपलब्ध होंगे। बहुत सी सेवाएँ ऑन डिमांड उपलब्ध होंगी। जैसे कि आपको किसी महंगे सॉफ्टवेयर का काम महीने में एकाधा बार ही पड़ता है तो आप उस दिन उसका प्रयोग कर उसका किराया दे दें बस। आपको उसे पूरा खरीदने की आवश्यकता नहीं। साथ ही सभी अनुप्रयोग ताज़ा व नए संस्करण के हर हमेशा उपलब्ध होंगे। अपने कम्प्यूटर प्रोग्रामों को रोज-ब-रोज अद्यतन करने के झंझट से भी उपयोक्ताओं को छुटकारा मिलेगा।

  •    अपने डाटा को भंडारित रखने, उसकी सुरक्षा करने, बैकअप करने इत्यादि की झंझटों से छुटकारा मिलेगा. उपयोक्ता ऐसी सेवा का लाभ इंटरनेट पर ले सकते हैं मात्र कुछ शुल्क देकर. साथ ही आप अपने डाटा को विश्व में कहीं से भी इंटरनेट पर एक्सेस कर सकते हैं और अपने मित्रों व कार्य-सहयोगियों के साथ साझा कर सकते हैं।

  •    गूगल डॉक्स और विंडोज लाइव जैसे अनुक्रमों के जरिए इंटरनेट पर एक ही दस्तावेज में कई स्थानों से विभिन्न उपयोक्ता रीयल टाइम में एक साथ काम कर सकते हैं।

  •   चूंकि लगभग सारा महत्वपूर्ण कार्य और प्रोसेसिंग सर्वर एण्ड पर होगा, अत: उपयोक्ता को अति-आधुनिक या अति-शक्तिशाली प्रोसेसर युक्त डेस्कटॉप / लैपटॉप कम्प्यूटरों की आवश्यकता नहीं होगी। अलबत्ता सही अनुभव के लिए इंटरनेट कनेक्शन अच्छी गति का होना अनिवार्य है।

 

गूगल क्रोम और क्लाउड कम्प्यूटिंग

 

अरसे से ये अफवाहें उड़ती रही हैं कि गूगल गुप्त रूप से कम्प्यूटर ऑॅपरेटिंग सिस्टम तैयार करने में जुटा हुआ है। इन अफ़वाहों में कितना दम है ये बात तो भविष्य के गर्र्भ में ही है, परंतु हाल ही में गूगल ने एक  धमाका किया। अविश्वसनीय धमाका। गूगल वैसे तो फ़ायरफ़ॉक्स ब्राउज़र को हर किस्म की सहायता प्रदान करता आ रहा है, परंतु उसने स्वयं फ़ायरफ़ॉक्स का प्रतिद्वंद्वी ब्राउज़र क्रोम मैदान में उतार दिया और ब्राउज़र युध्द में नया आयाम जोड़ दिया। क्रोम की खासियत ये है कि इसमें टैब्ड ब्राउज़िंग की सुविधा है और इसका प्रत्येक टैब एक अलग सैंडबॉक्स में चलता है। तो यदि आपने कोई दर्जन भर टैब खोल रखे हैं और किसी में गूगल डॉक्स का एक्सेल चल रहा है, दूसरे में जीमेल चल रहा है, तीसरे टैब में कोई मल्टीमीडिया देखी जा रही है तो यदि किसी टैब में त्रुटि की वजह से कोई समस्या पैदा होती है, तो सिर्फ और सिर्फ वही टैब ही फ्रीज हो सकता है और बन्द होने जैसी समस्या पैदा हो सकती है. बाकी के अन्य टैबों में इसका असर नहीं होगा और आपके द्वारा किए जा रहे अन्य टैबों के कार्यों में  कोई नुकसान नहीं होगा। इसे एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है और साथ ही क्लाउड कम्प्यूटिंग की ओर पहला ठोस कदम भी माना जा रहा है। गूगल क्रोम में जावा प्रोग्रामिंग की नई एजेक्स का भरपूर प्रयोग किया गया है जिससे इसकी गति भी अन्य ब्राउज़रों की तुलना में बहुत अधिक है. क्लाउड कम्प्यूटिंग की पहली आवश्यकता भी यही है। दूरस्थ सर्वरों पर की गई प्रोसेसिंग को उपयोक्ता के कम्प्यूटर पर रीयल टाइम में त्वरित, तत्क्षण दिखाना क्लाउड कम्प्यूटिंग का पहला लक्ष्य होगा।

अब जब आप अपने कम्प्यूटर से चाहे जिस ऑपरेटिंग सिस्टम में हों। विंडोज एक्सपी, विंडोज विस्ता, लिनक्स या मॅक ओएस। ब्राउजर के जरिए गूगल डॉक्स जैसे वेब अनुप्रयोगों का इस्तेमाल करते हैं तो फिर आपको ऑपरेटिंग सिस्टम से क्या लेना देना। वो चाहे कोई भी हो, ऑपरेटिंग सिस्टम की अब किसे परवाह है। अब तो आपके पास एक बढ़िया, सक्षम ब्राउजर हो, तेज गति का नेट कनेक्शन हो। बस। वेब सेवाओं के जरिए ब्राउज़र आज एक औसत व्यक्तिगत कम्प्यूटर उपयोक्ता की सारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हैं। और भविष्य में इनमें और भी निखार आने वाला है। और इसी वजह से चर्चा यह भी चल रही है कि माइक्रोसॉट का नया ऑपरेटिंग सिस्टम जिसे कोड नाम मिडोरी दिया गया है।. वो भी वेब अनुप्रयोगों और क्लाउड कम्प्यूटिंग पर ही प्रमुख रूप से आधारित होगा।

 

रविशंकर श्रीवास्तव