संस्करण: 22सितम्बर-2008

ब्रेन मैपिंग और नार्को टेस्ट :

छदम् वैज्ञानिकता का आडम्बर या सार्थक कवायद ?

सुभाष गाताड़े

देश के अग्रणी मानसिक स्वास्थ्य संस्थान नेशनल इन्स्टिटयूट आफ मेण्टल हेल्थ एण्ड न्यूरो साईंसेस (NIMHANS) के निदेशक की अगुआई में बनी विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की छह सदस्यीय कमेटी ने ब्रेन मैपिंग के सन्दर्भ में अपने जिन निष्कर्षों का इजहार किया है, वह काफी अहमियत रखते हैं। यह जुदा बात है कि मुख्यधारा की मीडिया में इन निष्कर्षों को लेकर जबरदस्त मौन व्याप्त है। दरअसल प्रस्तुत अध्ययन के बाद कमेटी ने साफ बता दिया है कि न केवल ये परीक्षण अवैज्ञानिक हैं बल्कि उन्हें जांच के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल करने तथा अदालत में सबूतों के तौर पर पेश करने पर तत्काल रोक भी लगनी चाहिए। मालूम हो कि उपरोक्त कमेटी में देश के अन्य अग्रणी संस्थानों के - बिहेवरियल एण्ड कोगनिटिव साईंस, साइकोफार्माकोलोजी, साइकिआट्री, फोरेन्सिक साईंस जैसे अहम विषयों के जानकार शामिल थे, जिन्होंने ब्रेन मैपिंग के बारे में अपने अध्ययन को अंजाम दिया। 

सभी जानते हैं कि आपराधिक घटनाओं में या आतंकी कार्रवाइयों में संलिप्तता की पड़ताल करने के लिए इन दिनो नार्को परीक्षण के साथ-साथ ब्रेन मैपिंग परीक्षण का बोलबाला भी बढ़ा है। पुलिस महकमे से लेकर आम जनमानस में भी जो सहजबोध व्याप्त है, उसके अन्तर्गत वैज्ञानिकता के आवरण में लिपटे ऐसे परीक्षणों - फिर चाहे ब्रेन मैपिंग टेस्ट हो या नार्को टेस्ट हो, - को काफी वैधता भी प्राप्त है। ऐसे में इन परीक्षणों के हिमायतियों को भी जबरदस्त झटका लग सकता है।

मालूम हो कि ब्रेन मैंपिंग में अभियुक्त को कम्प्युटर से जुड़ा एक हेलमैट पहनाया जाता है जिसमें कई सेन्सर और इलैक्ट्रानिक उपकरण लगे होते हैं। फिर जांच अधिकारी एवम फोरेन्सिक विशेषज्ञ की मौजूदगी में उसे अपराध से जुड़ी तस्वीरें दिखायी जाती है। इसे देख कर अभियुक्त के दिमाग में उठी हलचलों की इलैक्ट्रिकल फिजियोलॉजिकल गतिविधियों का विश्लेषण किया जाता है।

कमेटी के मुताबिक अपराधविज्ञान में उपकरण के तौर पर काम करने के लिए एक ऐसी प्रक्रिया की जरूरत होती है जिसमें गलत होने की सम्भावना समाहित हो। बंगलौर और गांधीनगर जैसे स्थानों पर जहां यह परीक्षण किया जाता है, वहां इस कारक को मद्देनज़र नहीं रखा गया है।

वैसे सिर्फ ब्रेन मैपिंग ही नहीं, नार्को टेस्ट की वैज्ञानिकता पर भी बहुत पहले सवाल खड़े किए जा चुके हैं। यह जानना भी दिलचस्प है कि अपने यहां भले ही नार्को परीक्षण लोगों को नया नज़र आता हो, विकसित देशों में तो वह वर्ष 1922 में नार्को परीक्षण मुख्यधारा का हिस्सा बना था जब राबर्ट हाउस नामक टेक्सास के डॉक्टर ने स्कोपोलामिन नामक ड्रग का दो कैदियों पर प्रयोग किया था।

दरअसल नारको एनैलिसिस टेस्ट एक फोरेन्सिक टेस्ट है जिसे टेस्ट जांच अधिाकारी, मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर और फोरेन्सिक एक्स्पर्ट की मौजूदगी में अंजाम दिया जाता है। इसमें संदिग्धा व्यक्ति को सोडियम पैंटोथेल नामक कैमिकल का इंजेक्शन दिया जाता है, जिससे न केवल वह अर्ध्दबेहोशी की हालत में चला जाता है बल्कि उसकी तर्कबुध्दि/रीजनिंग भी खत्म हो जाती है और फिर उससे सवाल पूछ कर जानकारी उगलवायी जाती है। वह व्यक्ति जो एक तरह से सम्मोहनावस्था में चला जाता है वह अपनी तरफ से ज्यादा कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होता बल्कि पूछे गए कुछ सवालों के बारे में कुछ बता सकता है। जो लोग यह मानते हैं कि नार्को परीक्षणों में व्यक्ति हमेशा सच ही उगलता है। दरअसल उस अवस्था में भी वह झूठ बोल सकता है, विशेषज्ञों को भरमा सकता है। जहां विकसित दुनिया के बाकी हिस्सों ने ऐसे परीक्षणों से भले ही तौबा की हो, - ज्यादातर जनतांत्रिक दुनिया जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन भी शामिल हैं, वहां ऐसे परीक्षण बदनाम हुए हों - पिछले कुछ समय से अपने यहां ऐसे परीक्षणों की 'लोकप्रियता' बढ़ती ही जा रही है। किसी अपराधा के संदिग्धा पकड़े जाने के बाद लोग ही मांग करने लगते हैं कि इनका अगर नार्को टेस्ट हो जाए तो सच्चाई उगल देंगे।  एक ऐसी हालत बन रही है कि इसकी छदम् वैज्ञानिकता से अभिभूत प्रबुध्द समुदाय के लोग भी यह नहीं सोचने को तैयार होते कि ऐसे परीक्षणों के मध्यम से हम अभियुक्त के मानवाधिकारों के हनन को, उसे यातना देने के काम को नयी वैधता प्रदान कर रहे हैं। संविधान का एक अहम तत्व है धारा 20 (3) जो कहता है कि किसी व्यक्ति को ''जिस पर कोई आरोप लगे हैं उसे अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा "no person accused of any offence shall be compelled to be a witness against himself" अगर हम नार्को टेस्ट की बुनियादी अन्तर्वस्तु को समझने की कोशिश करेंगे तो यही कह सकते हैं कि इसके जरिए व्यक्ति को एक तरह से 'अपने खिलाफ गवाह के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की सम्भावना रहती है। इसमें कोई दोराय नहीं कि नार्को टेस्ट में कोई व्यक्ति कुछ भी प्रलाप करे या पुलिस उससे जबरन कबूलवाये, अपराध को साबित करने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता होती ही है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि अभियुक्त की मर्जी के खिलाफ दवा पिला कर उससे जानकारी लेने की इस कोशिश को मद्रास हाईकोर्ट तथा बम्बई हाई कोर्ट ने यातना के श्रेणी में रखने से मना किया और ऐसा तर्क दिया कि 'अभियुक्त को भले ही उसकी इच्छा के विरूध्द प्रयोगशाला में ले जाया जाए, लेकिन परीक्षणों के दौरान वह जो बात प्रगट करे वे स्वैच्छिक हो सकती है।' सुप्रीम कोर्ट में वकील के तौर पर कार्यरत श्री राकेश शुक्ला, जो मानवाधिकार आन्दोलन से भी जुड़े हैं, अपने आलेख 'द ट्रूथ मशीन' ( इण्डियन एक्स्प्रेस 16 जुलाई 2008) में कहते हैं कि 'यह उसी तरह से हुआ कि किसी व्यक्ति को इतना पीटा जाए कि वह टूट जाए और बाद में जब वह कुछ बात उगलने लगे तो इस प्रगटीकरण को 'स्वैच्छिक स्वीकृति' कहा जाए। दरअसल यातना की श्रेणी में शुमार किए जा सकने वाले नार्को टेस्ट जैसे परीक्षणों की बढ़ती वैधता हमारे अपने वक्त की एक अलग परिघटना को भी उजागर करती है जिसमें असाधाारण कानूनों को - जिसमें विशेष परिस्थितियों का हवाला देते हुए नागरिकों के संविधानप्रदत्ता अधिकारों पर अंकुश लगाया जाता हो - इनकी 'कार्यक्षमता' को देखते हुए साधारण कानूनों में भी इनके प्रावधानों को शामिल करने की बात चलती रहती है। वर्ष 2000 में तत्कालीन एनडीए सरकार की सदारत में 'आपराधिक न्याय प्रणाली' को सुधारने के लिए जो मालीमाथ कमेटी बनी थी उसके जरिए हम यही कोशिश देख सकते हैं। नार्को टेस्ट को लेकर अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सी आई ए का अपना अनुभव रेखांकित करनेलायक है। शीतयुध्द के दिनों में जबकि उसे हर जगह कम्युनिस्ट क्रान्ति का खतरा दिखता रहता था, उसने नार्को टेस्ट को आजमाकर लोगों से सच उगालने की काफी कोशिश की, और यही निष्कर्ष निकाला कि ऐसे परीक्षण कत्ताई फलदायी नहीं होते। न सूचनाएं मिलती हैं, न सच उगला जाता है अधिक से अधिक यही होता है कि बन्दी विभ्रम का शिकार हो और मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगे, जो किसी भी तरह मामले की जांच में सहयोगी नहीं बन सकता । यह अकारण नहीं कि अमेरिकी सीनेट के सामने हुई सुनवाई में उसने उसी वक्त (1977) यह बता दिया था कि 'सच उगलनेवाली कोई जादूई दवाई की बात अधिक से अधिक जनमानस के कल्पनाजगत का हिस्सा' हो सकती है, लेकिन उसका कोई भौतिक आधार नहीं है।'

 

सुभाष गाताड़े