संस्करण: 22सितम्बर-2008

कहीं अतिवर्षा, कहीं अल्पवर्षा-

दोनों स्थिति बनी अभिशाप

 

राजेन्द्र जोशी

प्रकृति का संतुलन बिगड़ते ही मौसम बुरी तरह प्रभावित हो जाते हैं। सभी मौसमों के कैलेंडर गड़बड़ा जाते हैं। संसार की भौगोलिक स्थिति एक समान नहीं है। इसी स्थिति पर मौसमों के कैलेंडरों का भी निर्धारण है। भारत वर्ष नदी, पहाड़ी, जंगल जैसी प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर है। इन संपदाओं के साथ मानव द्वारा छेड़छाड़ों की वज़ह से ऋतुओं के चक्रों पर अब विपरीत असर देखा जाने लगा है। हिन्दी मासों के मुताबिक हमारे यहाँ अमूमन फाल्गुन, चैत्र, वैशाख और ज्येष्ठ में ग्रीष्म ऋतु, आषाढ़, सावन, भादों और कुआर में वर्षा ऋतु तथा कार्तिक, अगहन, पौष और माघ माह में शीत ऋतु मानी जाती है। किंतु भौतिकवादी विकासशील और निरंतर बढ़ती आबादी के इस देश में बढ़ रहे दबाव और मनुष्य की बढ़ती आवश्यकताओं ने प्रकृति के भंडारों को छिन्न-भिन्न कर दिया है। इसका यह परिणाम अब सामने आने लगा है कि सभी मौसमों के चक्रों पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है तथा ठंड, गर्मी और बरसात के मापदंड बदल गये हैं। कभी गर्मी के मौसम में सूरज खूब तपने लगेगा, ठंड भी कहीं ज्यादा, कहीं कम अनुभव की जायगी और बरसात भी कहीं खूब होगी या कहीं मौसम सूखा ही निकल जायगा।

चालू वर्ष में इस समय वर्षा ऋतु का जो नज़ारा देखा जा रहा है, उसमें कई क्षेत्रों में तो वर्षा ने इतना अधिक कहर ढाया कि जनजीवन को अति हानि का सामना करना पड़ा। गाँव के गाँव जल मग्न हो गये और प्रशासन और जनता की शक्ति प्रकृति के रौद्र रूप के आगे निस्सहाय हो गई। देश के कुछ भागों में तो अनेक लोगों की उफनती नदियों में जलसमाधि हो गई और लाखों लोग जलसमाधि हो गई और लाखों लोग बेघरबार हो गये। एक तरफ अतिवर्षा के ताण्डव से परिवार के परिवार उजड़ गये, उद्योग, व्यवसाय और खेती किसानी के वर्तमान और भविष्य संकट में पड़ गये जिससे देश की आर्थिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ा, तो दूसरी ओर कहीं कहीं अवर्षा या अल्पवर्षा की स्थिति बन गई है। वर्षा ऋतु के दौरान की ये दोनों स्थितियाँ जनजीवन की खुशहाली और देश के आर्थिक विकास के लिए अभिशाप हैं। विशेषकर सावन और भादों मास की वर्षा लोगों के सुख और समृध्दि का भविष्य निर्धारण करती आई है। किंतु इस बार के इन दोनों महीनों में मौसम ने अपने जो करतब दिखाये हैं उससे हमारे आगामी समय बड़ा डरावना सा नज़र आने लगा है। इन दो महीनों में होने वाली वर्षा के दौरान प्रकृति जिस तरह से अपना श्रृंगार करती आई है, ऐसा श्रृंगार इस बार कुछ क्षेत्रों में देखने को नहीं मिल रहा है। न तो खेत तर हो पाये हैं और न ही नदी, तालाब, कुआं, बावड़ी और अन्य भूमिगत जल स्त्रोतों के भंडार भर पाये हैं। सूखे चरोखरों में अनमने खड़े पशुओं के झुंड ललचाई नज़रों से, सुख रहे पोखरों, नदियों और नालों की ओर ताकते हुए देखे जा रहे हैं पंछियों के कलरव में न वो आनंद है और न वह उमंग है जैसा वे बादलों के झरने के बाद देखकर प्रमुदित होते हैं।

वर्तमान में अवर्षा और कहीं कहीं अल्पवर्षा ने कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं। इन सवालों और इनसे उत्पन्न हुई समस्याओं के हल की एक बड़ी चुनौती आ गई है, आम जनता और प्रशासन के सामने। खरीफ की फसल तो इस स्थिति में चौपट हो ही जाती है किंतु रबी मौसम की फसलों की बुआई के लिए सूखे खेत कोई उत्साहवर्धक दिलासा नहीं दिला पाते। फसलों की सिंचाई के लिए पानी के अभाव के अभी से ही संकेत मिल रहे हैं। पेयजल आपूर्ति का भविष्य भी उज्जवल नज़र नहीं आता है। बस्तियों में विशेषकर नगरीय क्षेत्रों में जलसंकट की स्थिति इसलिए भी गंभीर होगी क्योंकि जमीन के ऊपरी और बाह्य जलस्त्रोत इस ऋतु में भर नहीं पाये हैं।

ऋतुओं के संतुलन बिगड़ने के जब हालात निर्मित हो जाते हैं, तब प्रशासन की ऑंख खुल तो जाती है, किंतु वह मौसम की अप्रत्याशित मार के आगे टिक नहीं पाता है। हालाँकि सरकार की मैनेजमेंट-एजेंसिया प्रत्येक मौसम के पूर्व हर प्रकार की स्थितियों से मुकाबला करने की अपनी तैयारियों पर दम्भ ज़रूर करती रहती हैं, किंतु जब प्राकृतिक आपदाओं से हालात बिगड़ने लगते हैं तब इनकी तैयारियां एक तरफ धरी रह जाती हैं। वर्षा ऋतु के आगमन के पूर्व शासन स्तर पर संभावित विपदाओं से मुकाबला करने की व्यूह रचना कर ली जाती है। बाढ़ की स्थिति में नदियों के किनारे के गांवों और वहाँ के जनजीवन की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त भी किया जाता रहता है किंतु अतिवृष्टि के कारण जब बाढ़ आने लगती हैं तब बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में बचाव कार्यों में जो तत्परता दिखाई देना चाहिए वह नहीं दिखती है। परिणाम स्वरूप जानमाल की बड़े पैमाने पर होने वाली क्षति रूक नहीं पाती है। अवर्षा से उत्पन्न स्थिति में प्रशासन को पूर्वानुमान लगाकर संभावित संकट का सामना करने के लिए जिस गंभीरता से व्यूह रचना करना चाहिए, उसमें कहीं गंभीरता न होने से त्राहि-त्राहि मचना, स्वाभाविक है। क्योंकि अपर्याप्त वर्षा से सबसे ज्यादा संकट उत्पन्न होता है पेयजल का। स्थानीय निकायों के स्त्रोत पर्याप्त पेयजल की आपूर्ति नहीं कर पाते। इस संबंधा में जल संरक्षण के कार्यों के प्रति एजेंसियां सतर्क नहीं रहती हैं और न ही जल संरक्षण के प्रति आम जनता जागरूक रहती है। जहाँ जहाँ जिन क्षेत्रों में वर्षा पूर्व जल संरक्षण के कार्यो के महत्व को समझा गया और पानी को बचाने के उपाय किए जाते हैं, वहाँ अपर्याप्त वर्षा के दुष्प्रभाव को कम करने में जरूर कामयाबियां मिलती हैं।

वर्षा की दोनों स्थितियां-अति वर्षा और अपर्याप्त वर्षा, जनजीवन को अस्त व्यस्त कर देती है और जलचर, थलचर और नभचर सभी तरह के प्राणियों में त्राहि-त्राहि मचा देती हैं। नदी तटों पर अवैध रूप से बसने और बस्तियों में हो रहे बेतरतीब निर्माणों की वजह से अतिवृष्टि के दौरान जान-माल की हानि के पिछले अनुभवों को मद्देनज़र रखते हुए अवैध बसाहटों और निर्माणों की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना होगा तथा वर्षा कम होने के परिणाम स्वरूप होने वाले जलाभाव का आकलन कर जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना होगा। अब संतुलित वर्षा की संभावनाओं पर प्रश्नचिन्ह लग गये हैं। वर्षा जहाँ वरदान होना चाहिए वहाँ अब यह ऋतु अभिशाप बनती जा रही है।

 

राजेन्द्र जोशी