संस्करण: 22सितम्बर-2008

घोषणाएँ नहीं, हिसाब चाहिए

 

महेश बाग़ी

शिव ने जिस भस्मासुर को पैदा किया था, वहीं भस्मासुर जब उन्हीं की जान के पीछे पड़ गया, तब विष्णु को कामिनी रूप धारण कर भस्मासुर का अंत करना पड़ा था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कई भस्मासुर पैदा किए हैं, जो अब उन्हीं का पटिया उलटाने को बेताब हैं। उनका दुर्भाग्य यह है कि उनके पास कोई विष्णु नहीं है, जो इन भस्मासुरों का अंत कर सके। इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना होगा। विचित्र स्थिति यह है कि शिवराज सिंह अपने भस्मासुरों को नियंत्रित तक नहीं कर पा रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री को इन दिनों अपनी सरकार के कामकाज का हिसाब देना चाहिए, जबकि वे जनता को घोषणाओं के झुनझुने थमा रहे हैं।

हाल ही में वनमंत्री विजय शाह के बेटे ने इंदौर में एक शराब व्यवसायी की बेटी से सामूहिक बदसलूकी की। अखबारों की सुर्खियों में आई इस करतूत की पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होने दी गई और मामला ठंडा कर दिया गया। कोई शर्मदार मुख्यमंत्री होता तो अब तक उस मंत्री को घर बैठा दिया गया होता, लेकिन स्वभाव से ही ढिलंगे शिवराज सिंह पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। इसके पूर्व कई मंत्री और उनके नाते-रिश्तेदारों की करतूतें सामने आ चुकी हैं, जिनमें से एक पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई। शिवराज सरकार के गृह राज्यमंत्री रामदयाल अहिरवार तो बिजली चोरी और फर्ज़ी बीपीएल कार्ड मामले में साफ़ फंसे नज़र आए पर सरकार की कृपा से उनका बाल तक बांका नहीं हुआ। शिवराज सिंह जिस नरेन्द्र मोदी के गुजरात पैटर्न पर अगला विधानसभा चुनाव जीतना चाहते हैं, उस नरेन्द्र मोदी से थोड़ी-सी भी सीख ली होती तो भ्रष्ट और अत्याचारी मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया होता। इस सरकार के एक दर्ज़न से अधिक मंत्री भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे हैं और सरकार में बने रह कर नए-नए गुल खिला रहे हैं। अब तक सिर्फ़ एक मंत्री अजय विश्नोई को हटाया गया है। वह भी तब जब पानी सिर से ऊपर निकल गया था। उस मामले में भी विश्नोई के खिलाफ़ पार्टी ने कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही न कर उन्हें अभयदान दे दिया था।

आश्चर्य की बात है कि ऐसे ही भस्मासुरों के सहारे शिवराज सिंह सत्ता में वापसी का सपना संजो रहे हैं। हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता भी मान रहे हैं कि मध्यप्रदेश में भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन शिवराज हैं कि मानने को तैयार नहीं हैं। कागज़ी योजनाएं और घोषणाओं के बल पर वे सत्ता में वापसी का दावा कर रहे हैं। अलग-अलग वर्गों की पंचायतों में वे साढ़े तीन हज़ार से अधिक घोषणाएँ कर चुके हैं। बीच-बीच में इन्वेस्टर्स मीट के ज़रिये वे प्रदेश के औद्योगिकरण के सपने भी दिखा चुके हैं और अब जन आर्शीवाद यात्रा के नाम पर शिलान्यासों के पत्थर गाड़ कर घोषणाओं के झुनझुने बांट रहे हैं। भाजपा भी शिवराज के मुगालते में आकर इन घोषणाओं को पार्टी के चुनावी घोषणापत्र में शामिल करने जा रही है। सहकारिता मंत्री गोपाल भार्गव ने तो शिलान्यास करने का इतिहास रच दिया है। अपने गृह नगर सागर में उन्होंने एक साथ ग्यारह सौ शिलान्यास के पत्थर पूज कर प्रशासन को थमा दिए और सूची दी कि फलाँ-फलाँ जगह जाकर गाड़ आओ। शिवराज सिंह और उनके इन भस्मासुरों द्वारा गाड़े गए ये पत्थर जनता को क्या संदेश देंगे ? क्या ये पत्थर उनकी उम्मीदों पर नहीं रखे गए हैं ?

सच पूछा जाए तो यह समय घोषणाएँ करने और शिलान्यास के पत्थर गाड़ने का नहीं है, बल्कि हिसाब देने का है। शिवराज सरकार को जनता को बताना चाहिए कि उनकी सरकार ने कहाँ-कहाँ क्या-क्या विकास किया सरकार के इन पांच सालों के कामकाज को ही आधार बना कर वोट मांगे जाने चाहिए। चूंकि शिवराज सरकार के पास उपलब्धि के रूप में दर्शाने को कुछ नहीं है, इसलिए वह अपने प्रदर्शन को आधार बनाने के बजाय घोषणाओं के बल पर जनता से वोट मांगने जा रही है। माना कि भाजपा की सरकार फिर से बनने के बाद इन घोषणाओं को मूर्त रूप दे दिया जाएगा, मगर उससे पहले सवाल यह है कि भाजपा ने जिस घोषणापत्र के आधार पर पिछला चुनाव जीता था, उसमें की गई घोषणाओं का क्या हुआ ? सौ दिन में बिजली संकट हल करने की घोषणा वह घोषणा 1800 दिन बीतने के बाद भी पूरी क्यों नहीं हो पाई ? सरकार को आज भी दूसरे राज्यों से महँगी बिजली क्यों खरीदना पड़ रही है ? बिजली संकट के कारण किसानों को जो आर्थिक क्षति हुई है, उसकी भरपायी कौन करेगा ? अगली बार सत्ता में  आने पर किसानों को तीन प्रतिशत ब्याज दर पर कर्ज़ उपलब्ध कराने का वादा करने वाले शिवराज सिंह यह क्यों नहीं बताते कि उनकी सरकार में हजारों किसानों पर बिजली मुद्दे पर फर्जी मुकदमें लादे गए थे ? क्या वे किसान अगली बार भाजपा पर भरोसा करेंगे ?

शिवराज सिंह अब कह रहे हैं कि अगली बार युवाओं को रोज़गार देने पर बल दिया जाएगा, पर इस बार उनकी सरकार ने युवाओं के लिए क्या किया, यह क्यों नहीं बताते ? जिन पांच-पांच इन्वेस्टर्स मीट के नाम पर सरकारी खज़ाने से भारी रकम फूंकी गई, उनमें से कितने उद्योग ज़मीन पर उतर सके ? जिस सरकार ने पूरे पाँच साल तक प्रदेश के युवाओं को सब्ज़बाग़ दिखाए, वे युवा क्या आज शिवराज की घोषणाएँ सुन कर भाजपा को वोट देने आएंगे ? दरअसल शिवराज सिंह को यह अहसास हो गया है कि भाजपा की सत्ता में वापसी असंभव है, इसलिए वे फर्ज़ी घोषणाएं कर मतदाताओं को भरमा रहे हैं। ऐसा करते समय वे यह भूल गए हैं कि जनता इतनी भोली नहीं है। जो जनता जनार्दन भाजपा को दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता सौंप सकती है, वह भाजपा को धूल भी चटा सकती है। शिवराज सावधान!

 

महेश बाग़ी