संस्करण: 22सितम्बर-2008

मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की खस्ता हालत

एल.एस.हरदेनिया

''चारों तरफ विकास की गंगा बह रही है। प्रदेश के सभी नागरिक संतुष्ट हैं।'' यह दावा बार-बार भारतीय जनता पार्टी की ओर से किया जा रहा है। अभी हाल में बंगलोर में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक को अपनी जीत के प्रति आश्वस्त करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह कहा कि चौतरफा विकास को हम अगले चुनाव में मुख्य मुद्दा बनाएंगे।

जिस दिन (14 सितंबर) को चौहान पार्टी नेतृत्व को यह आश्वासन दे रहे थे उसी दिन भोपाल में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री बालकृष्णन एवं मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री ए. के. पटनायक मध्यप्रदेश में कुपोषण से हो रही बच्चों की मृत्यु पर गंभीर चिंता व्यक्त कर रहे थे।

दोनों न्यायाधीश भोपाल में प्रदेश मानवाधिकार आयोग द्वारा आयोजित एक सेमीनार को संबोधित कर रहे थे। ''स्वास्थ्य एक मूलभूत अधिकार है'' इस विषय पर आयोग ने सेमीनार का आयोजन किया था। सेमीनार के दौरान मध्यप्रदेश में स्वास्थ्य की स्थिति पर जो पेपर पढ़े गए थे उन सब में बार-बार यह बात कही गई कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति खस्ता है।

विकास का क्षेत्र विशाल होता है। विकास का अर्थ उद्योगों की स्थापना के लिए मिलने वाले आश्वासन नहीं है। न ही उसका अर्थ कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी है। यद्यपि ये दोनों क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं परंतु वे अकेले विकास की गंगा नहीं बहा सकते। सर्वांगीण विकास उसी समय संभव है जब सभी को आवश्यक और उचित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध  हों, सभी न सिर्फ साक्षर हों वरन उनमें ज्ञान अर्जित करने की आकांक्षा उत्पन्न  की जा सके। सभी का छोटा-मोटा घर हो, पीने का शुध्दा पानी सभी को उपलब्ध हो। ये सब विकास की परिधि में आते हैं। इन सभी मापदंडों को देखें तो यह स्वीकार करना होगा कि मध्यप्रदेश में विकास की गंगा नहीं बह रही है।

शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह की शिकायतें आये दिन मिलती हैं कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है, शिक्षक प्राय: अनुपस्थित रहते हैं, यदि कहीं शिक्षक हैं तो स्कूल का भवन नहीं है, यदि भवन है तो शिक्षक नहीं हैं। इस तरह प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में स्थिति निराशाजनक ही है।

भोपाल में मानव अधिकार आयोग द्वारा आयोजित सेमीनार में सभी शासकीय व गैर शासकीय वक्ताओं ने यह शिकायत की कि प्रदेश में सरकारी अस्पतालों की हालत खस्ता है। सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। इन संस्थाओं में डाक्टर, तथा विशेषकर बालरोग विशेषज्ञ नदारत ही रहते हैं। इन अस्पतालों में पदस्थापना के बावजूद डाक्टर नहीं आते हैं।

सेमीनार का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में शासकीय स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का मूल्यांकन करना था।

सेमीनार में पढे गए एक पेपर के अनुसार प्रदेश में 1600 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र होने चाहिए परंतु 1153 हैं। 447 केन्द्रों की कमी है। स्त्री रोग विशेषज्ञ 99 हैं जबकि 137 होने चाहिए। अर्थात 38 की कमी है। इन केन्द्रों में से मात्र 16 प्रतिशत केन्द्रों में कुत्ते काटने की दवाई उपलब्ध रहती है। सांप काटने की दवाई मात्र 25 प्रतिशत केन्द्रों में उपलब्ध रहती है। ये आंकड़े स्वयं ऐसी कहानी कह रहे हैं जिससे प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति का अंदाजा होता है।

सेमीनार में जेल में बंद कैदियों के स्वास्थ्य की स्थिति पर विस्तृत रुप से विचार किया गया। वर्तमान में मध्यप्रदेश में आठ केन्द्रीय जेल एवं होशंगाबाद में निर्मित की गई नवीन जिला जेल सहित 21 जिला जेल, एक किशोर बंदी संस्था जो कि नरसिंहगढ में स्थित है तथा 90 उप जेल हैं। केन्द्रीय जेल जबलपुर, रीवा, सतना, उज्जैन, जबलपुर, भोपाल, सागर तथा ग्वालियर में एक्सरे एवं पैथेलाजी की सुविधा है। किंतु किसी भी श्रेणी के जेल में मेडिकल स्पेशलिस्ट अथवा क्षय रोग विशेषज्ञों से बंदियों के स्वास्थ्य परीक्षण की व्यवस्था नहीं है। जेलों में बंदियों की स्थिति के बारे में जो भी पेपर पढ़े गए उन सब में यह तथ्य विशेष रुप से उभर कर आया कि उनके स्वास्थ्य की देखभाल की भारी उपेक्षा की जाती है। नतीजे में बंदियों को होने वाली छोटी सी बीमारी भी काफी गंभीर रुप ले लेती है और इससे उनमें से कई की मौत हो जाती है। इस मुद्दे पर बोलते हुए मानव अधिकार आयोग के अधयक्ष न्यायमूर्ति डी. एम. धर्माधिकारी ने कहा कि एक ओर जेल में डालकर हम बंदियों की आजादी छीन लेते हैं वहीं दूसरी ओर हम उनके स्वास्थ्य की रक्षा भी नहीं कर पाते। यह सरासर अन्यायपूर्ण स्थिति है। सेमीनार के दौरान यह सुझाव आया कि जब भी कैदी जेल में आए उसका पूरा स्वास्थ्य परीक्षण किया जाए। बीमारी होने पर उसका तुरंत इलाज कराया जाए। यदि उसे विशेषज्ञ इलाज की आवश्यकता है तो उसे वह तुरंत मुहैया कराया जाए। यदि अधिकारियों की लापरवाही के कारण किसी कैदी की मृत्यु हो जाती है तो जांच कराकर दोषी अधिकारी को सजा दी जाए।

सेमीनार में यह तथ्य उजागर हुआ कि शारीरिक रोगों के साथ-साथ बड़ी संख्या में बंदी मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं। दु:ख की बात यह है कि जेलों में मानसिक रोगों की चिकित्सा की कोई व्यवस्था नहीं है। यह बात भी कही गई कि कैदियों के अलावा आम जनता के लिए भी मनोचिकित्सकों की भारी कमी है। यह कमी दूर करना अत्यावश्यक है।

 

एल.एस.हरदेनिया