संस्करण: 22सितम्बर-2008

हीमोफीलिया-अनुवांशिक बीमारी पर

सरकार को ध्यान देना आवश्यक

 

डॉ. राजश्री रावत ''राज''

क्कीसवीं सदी में यदि आम जनता का एक बड़ा हिस्सा किसी एक बीमारी में दवा और विशेषज्ञ चिकित्सक के अभाव में मरने को विवश है तो इससे बड़ी त्रासदी और सरकार की अक्षमता और नहीं हो सकती। पिछले कुछ वर्षों में इस महारोग से मरने वाले और विकलांग होकर जीवन असहाय और मौत के इंतजार में बिताने वाले मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले मरीजों में 80% रोगी वे ही हैं।

हीमोफीलिया के शिकार रोगियों का दर्द यह है कि सरकार की ओर से न तो दवा की व्यवस्था की गई है न ही विशेष प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सकों की। एक अमानवीय पक्ष यह भी है कि जहाँ एक ओर सरकार पोलियो, एड्स, मलेरिया, टी.बी. आदि की चिकित्सा व बचाव के लिए करोड़ों का बजट बनाती है, वहीं हीमोफीलिया के नाम पर एक पैसा भी बजट में नहीं है। यह हाल तब है जब राज्य में 8000 से अधिक हीमोफीलिया के रोगियों की पुष्टि हो चुकी है। पूरे देश में 20000 से भी अधिक लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। लेकिन आश्चर्य है कि सरकार का ध्यान अब तक नहीं है।

''सबको दवा सबका इलाज'' का दावा करना तो आसान हैं, परंतु अब तक न तो इस जानलेवा बीमारी के लिए दवा की न ही चिकित्सकों की व्यवस्था की गई है। इस बीमारी हेतु प्रशिक्षित चिकित्सकों की आवश्यकता है। हीमोफीलिया एक अनुवांशिक बीमारी है। इस बीमारी में शरीर के किसी भी हिस्से में चोट लगने पर रक्त बहने लगता है। इस रक्त का बहना तब बंद होता है जब उसे एंटी हीमोफीलिक फैक्टर दिये जाते हैं। इस फैक्टर के अभाव में सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तत्काल रक्त चढ़ाया जाता है। चिकित्सकों के अनुसार ऐसे रोगियों के रक्त में थ्रामेसाइट नहीं होते हैं जिसके कारण रक्त का बहना नहीं रूक पाता है। ऐसे में मुख्य आवश्यकता एंटी हीमोफीलिक फैक्टर की होती है। इसके अभाव में कई बार रोगी के आहत अंग काम करना ही बंद कर देते हैं। सरकार द्वारा एंटी होमोफीलिक फैक्टर की व्यवस्था कराये जाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए ? क्योंकि हीमोफीलिक रोगियों को बचाने का एकमात्र उपाय एंटी हीमोफीलिक फैक्टर ही है। इस फैक्टर के अभाव में पीड़ितों के परिजनों के पास रक्त चढ़ाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। रक्त अवयव या प्लाज्मा चढ़ाने के साथ ही रक्त जनित रोगों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे कई हीमोफीलिक रोगी बाद में रक्त जनित बीमारियों मसलन एड्स, हेपेटाइटिस बी के शिकार हो जाते हैं। हीमोफीलिया तो पहले ही जानलेवा बीमारी है इस पर रक्त की वैकल्पिक व्यवस्था इनकी जिंदगी को और कम कर देती है। हीमोफीलिया सोसायटी ने कई बार सरकार का ध्यान इस ओर दिलाकर चिकित्सकों के प्रशिक्षण और ऐंटी हीमोफीलिक फैक्टर उपलब्ध कराने की आवश्यकता को रेखांकित किया। परंतु आज भी अनेक रोगी विशेष चिकित्सा के अभाव में मौत के मुंह में जा रहे हैं या बच्चे विकलांग हो रहे हैं। हालांकि कई राज्य सरकारों ने हीमोफीलिक रोगियों पर प्रतिवर्ष खर्च के बजट को काफी बढ़ा दिया है। इस बीमारी की गंभीरता को पंजाब नेशनल बैंक अपने कर्मचारियों और उनके आश्रितों के हीमोफीलिया इलाज पर होने वाला पूरा खर्च उठाता है। रेल मंत्रालय ने अपने कर्मचारियों को इस बीमारी से निजात दिलाने तथा जीवन सुरक्षा के लिए हर रेलवे अस्पताल में दवा तथा विशेष प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सकों की व्यवस्था की है।

बिहार सरकार ने भी हीमोफीलिया को रेयर बीमारी में शामिल कर लिया है। बिहार सरकार में नौकरी करने वालों और उनके आश्रितों के इलाज पर जो भी खर्च होता है वह भुगतान किया जायेगा यह प्रावधान किया गया है। गरीबी रेखा से नीचे ही नहीं लगभग एक लाख तक की सालाना आमदनी वालों को भी मुख्यमंत्री सहायता कोष से इलाज की राशि मिल सकेगी। डॉक्टरों की व्यवस्था और प्रशिक्षण की भी शीघ्र व्यवस्था ही की जायेगी।

आज आवश्यकता है कि इस राजरोग हीमोफीलिया के इलाज में आने वाले व्यय और प्रशिक्षण पर सरकार पूर्णत: ध्यान दे। साथ ही अन्य वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियाँ जैसे होम्योपैथी, तथा आयुर्वेद में इस बीमारी से लड़ने की क्षमता होने के इन पैंथी के चिकित्सकों के दावों को आजमा कर उनकी सेवाएँ लेकर इस बीमारी पर पूर्णत: काबू पाया जाये।

 

डॉ. राजश्री रावत ''राज''