संस्करण: 22सितम्बर-2008

पर्यावरण तथा स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डालते कृषि रसायन

 

स्वाति शर्मा

ढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यानों की आपूर्ति हेतु फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए आज कृषि रसायनों का अंधाधुंध उपयोग किया जा रहा है, जिनसे पर्यावरण प्रदूषित हो गया है और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो गया है। इसमें कीटनाशक, फफूंदीनाशक, कृमिनाशक, चूहामार दवायें, खरपतवार नाशक एवं रासायनिक खाद सहित अनेक रसायन शामिल हैं। जिन्हें कृषि उपज बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है। इन रसायनों की उचित मात्रा यदि ठीक प्रकार से प्रयोग की जाये तो ये लाभदायक हैं। अगर इनकी अधिक मात्रा बिना किसी तर्क संगत उपाय के प्रयोग की जाती है तो दाने, चारे, फल,  दालें एवं सब्जियों में इन कृषि रसायनों के अवशेष रह जाते है।

आज शायद ही कोई ऐसा खाद्य पदार्थ या पेंय पदार्थ होगा जो इनके दुष्प्रभाव से मुक्त हो, ये खाद्य पदार्थ मनुष्य व पशुपक्षियों में कई प्रकार के घातक प्रभाव डालते हैं। जिनकी जानकारी तत्काल नहीं हो पाती व इसके दूरगामी प्रभाव होते हैं। ये रासायनिक पदार्थ अनाज के रूप में सीधो मनुष्यों पर प्रभाव डालते ही हैं एवं परोक्ष रूप में ये रासायनिक पदार्थ फल, पत्तियों,  तनों और चारों में रह जाते हैं, जिन्हें पशु खाते हैं और पशु से दूधा मांस और अंडों के द्वारा इनके अवशेष मनुष्य में पहुंचते हैं। विभिन्न प्रकार के शोध और अनुसंधानों के अनुसार क्लोरीनयुक्त कीटनाशक अधिक घातक पाये गये हैं। किसानों को इन कीटनाशकों के हानिकारक प्रभावों की जानकारी उपलब्ध नहीं होती है। किसानों को लगता है कि अधिक मात्रा में कीटनाशक डालने से अच्छे परिणाम मिलेंगे। इसका प्रमुख कारण किसानों की अशिक्षा है। इसके अलावा कीटनाशकों के निर्माताओं व वितरकों द्वारा उचित जानकारी का प्रचार प्रसार ना करना भी इसका प्रमुख कारण है।

प्रदूषित खाद्य पदार्थ कई प्रकार के हानिकारक प्रभाव मनुष्य पर डालते हैं। जब ये प्रदूषित खाद्य पदार्थ शरीर में प्रवेश करते हैं तो शरीर की रोगरोधी क्षमता का ह्रास हो जाता है। इन खाद्यानों में मुख्य रूप से कीटनाशक व जीवनाशकों के अंश और हानिकारक भारी धातुओं के अवशेष होते हैं। उल्लेखनीय है कि कई रासायनिक पदार्थों के अल्प अंश भी मनुष्यों में रोगरोधी क्षमता का विकास रोक देते हैं। चिकित्सकीय परीक्षणों से पता चला है कि वर्तमान में प्रयोग किये जा रहे कीटनाशकों से मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता 30-40 प्रतिशत तक ह्रास हो गया है। कीटनाशक एवं इनमें उपस्थित भारी धातुओं के अवशेष शरीर की तंत्रिकाओं और मस्तिष्क को क्षतिग्र्रस्त कर रहे हैं जिससे याद्दाश्त में कमी, चिड़चिड़ापन, गर्दन व पीठ का दर्द, विकलांगता, हाथों में कंपन तथा पक्षाघात जैसी गंभीर बीमारियां मनुष्य में पैदा हो रही है। जब लंबे समय तक शरीर में इनकी मात्रा एकत्रित होती रहती है तो ये शरीर के कई प्रोटीन से जुड़कर एक जटिल संरचना बनाते हैं, जो सामान्य रूप से न तो उत्सर्जित हो पाती है और ना ही कोशिकायें इन्हें खत्म कर पाती हैं। अंतत: ये गुर्दों में एकत्रित हो जाती हैं और सूजन का कारण बनती हैं। उपरोक्त प्रकार की समस्याओं का उपचार अत्यंत ही कठिन कार्य है। हालांकि इस पर अनुसंधान जारी है। अधिकतर वैज्ञानिक कीटनाशक और भारी धातुओं के अल्पकालिक प्रभावों का ही अधययन करते है। मगर इनकी अल्प मात्रा का दीर्घकालिक प्रभाव नहीं देखते हैं। जिसके कारण प्रारंभ में प्राय: कीटनाशकों को प्रयोग की छूट मिल जाती है। पश्चिमी देशों में इस संदर्भ में पिछले दो दशकों से गहन शोध कार्य चल रहे हैं, मगर कीटनाशकों के हानिकारक प्रभावों से मुक्ति की राह अभी तक नहीं मिल पाई है।

खाद्य पदार्थो में कीटनाशकों व भारी धातुओं के प्रदूषण से छुटकारे के लिए सामाजिक जागरूकता हेतु चिंतन व उपाय करने होंगे। विकासशील देशों के वैज्ञानिकों का मत है कि कृत्रिम रूप से तैयार किये गये रासायनिक कीटनाशकों एवं खादों का उपयोग कम किया जाये। वे विकसित देशों की कड़े शब्दों में आलोचना व आग्रह करते हैं कि वे उन सभी कीटनाशकों का उत्पादन एवं निर्यात बंद करें जो हानिकारक होने के कारण स्वयं उनके देशों में बंद किये जा चुके हैं। आज यदि देखा जाय तो अनेक कीटनाशक एवं कृत्रिम रसायन औषधियां जैसे डी.डी.टी., बी.एच.सी. एवं एल्ड्रिन आदि का प्रयोग विकसित देशों में बंद हों चुका है, परंतु विकासशील देशों के लिए इनका निर्यात करने में विकसित देश कहीं से भी पीछे नहीं है। इसके अलावा विकसित देशों के नागरिक भी इस रासायनिक प्रदूषण के प्रति जागरूक हैं। और वो रासायनिक प्रदूषण मुक्त अर्थात जैविक आहार किसी भी कीमत पर खरीद कर आहार के रूप में लेने तत्पर हैं। वास्तव में विकसित देशों के नागरिक कृत्रिमता से प्रकृति की ओर अग्रसर हैं। हमें भी हमारे देश को इस प्रदूषण से बचाने के लिए उपाय करने होंगे। सबसे पहले तो किसानो को कीटनाशकों व कृत्रिम रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों के विषय में शिक्षित किया जाना चाहिए ताकि किसान आवश्यकता अनुरूप इनका प्रयोग सावधाानी पूर्वक करें। वैज्ञानिक एवं शोधकर्ता वनस्पति जन्य कीटनाशकों के अनुसंधान और विकास पर बल दें। कृषि विभाग, रासायनिक खादों की जगह गोबर, कंपोस्ट खाद हरी या जैविक खाद के उपयोग को प्राथमिकता दिलवाये। ऐसे कृत्रिम रसायन जो हानिकारक हैं तथा जिनके बारे में प्रमाणिक वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध है, उनका उत्पादन एवं प्रयोग तत्काल बंद किया जाना चाहिए। वास्तव में जीव, मनुष्य एवं पर्यावरण की सुरक्षा हेतु इस दिशा में कठोर कदम उठाना आवश्यक है।

 

स्वाति शर्मा