संस्करण: 22जून-2009

 

नरेगा ने बचाया भारत को
आर्थिक मंदी से
 

जाहिद खान

दी की भयानकतम आर्थिक मंदी ने जहां दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को भारी नुक्सान पहुंचाया है। गोया कि अभी तलक कई देश इस मंदी से जूझ रहे हैं। वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति पर यदि गौर करें तो,ये दुनिया की दीगर अर्थव्यवस्थाओं की बनिस्बत ज्यादा बेहतर बनी हुई है। विकास दर में गिरावट के बावजूद वैष्विक आर्थिक संकट के इस दौर में भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेज गति से बड़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। जब बड़े-बड़े आर्थिक गढ़ ढह रहे थे, ऐसे में भारत आर्थिक मंदी की क्रूरतम मार से केंसे बचा रहा ?गर इस सवाल का जबाव खोजें तो ज्यादा मुष्किल नहीं होगा। दरअसल,नरेगा यानी राश्ट्रीय ग्रामीण गारंटी कानून वह महती वजह है,जिससे भारत आर्थिक मंदी की काली छाया से बचा रहा।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन आईएलओ की अभी हालिया आई रिपोर्ट में नरेगा की जमकर तारीफ की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि-''नरेगा की बदौलत ही भारत मंदी की क्रूरतम मार से साफ बच निकल गया। गर यह योजना नहीं होती तो वैश्विक मंदी का असर भारत पर भी दिखाई देता और देष का कामगार वर्ग बुरी तरह से प्रभावित होता।''देश के ग्रामीण क्षेत्रो में 100 दिन के रोजगार की गारंटी देने वाली इस योजना का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट आगे कहती है-''नरेगा ने विपरीत हालात में भी गरीबों को सुरक्षित रखा। 3 साल पहले भारत के 200 जिलों में लागू हुई इस योजना ने हजारों परिवारों को फायदा पहुंचाया है। योजना के तहत तकरीबन 16 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। जाहिर है कि,मंदी के असर से जब अमेरिका,चीन जैंसे देषों की अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा रही थीं,तब भारत के सरकारी खजाने से निकले हजारों करोड़ रुपए ने ग्रामीण क्षेत्रों में मांग को बनाए रख कर अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाया। ग्रामीण गरीबों के मार्फत बाजार में आए पैसे ने बाजार की खरीद क्षमता को एक हद से नीचे गिरने नहीं दिया। इस लिहाज से देंखें तो अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की तारीफ कहीं से भी नाजायज नहीं है। मौजूदा तथ्य खुद इस बात की ओर इशारा करते हैं।

बीसवीं सदी की महामंदी की यदि बात करें तो उस वक्त प्रख्यात अर्थशास्त्री कींस ने एक सूत्र वाक्य दिया था,जो आज भी प्रासंगिक है। कींस ने कहा था कि ''मंदी के समय सरकारी खर्च बड़ा देना चाहिए,ताकि लोगों की खरीदने की ताकत अचानक कम न हो जाए और मांग बिल्कुल न लुढ़क जाए।'' भारत ने कींस के सूत्र का अक्षरष: पालन किया। सर्वव्यापी मंदी के इस दौर में देश के अंदर सरकारी व्यय 10 फीसद के सामान्य स्तर से तकरीबन दोगुना होकर 20 फीसद तक पहुंच गया। यहां तक कि चौथी तिमाई में तो यह सरकारी व्यय रिकार्ड 22 फीसद तक हो गया। जबकि साल 2007-08 में यह महज 7.4 फीसद था। बहरहाल, तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद यदि विकास दर अनुमान से अच्छी दिखाई दे रही है तो उसमें बिला शक सरकार के रोजगार गारंटी योजना जैसे कदमों का उल्लेखनीय योगदान है। हालिया लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जैसे जनोन्मुखी कार्यक्रमों की ही देन है न कि कथित 'आर्थिक सुधारो'  की।

नरेगा की कामयाबी के लिए आज कांग्रेस भले ही अपने सिर पर सेहरा बांधा रही हो लेकिन सच्चाई यह है कि जब नरेगा को बनाने की पेशकश की गई तो प्रधाानमंत्री,योजना आयोग के उपाधयक्ष सहित सरकार के आर्थिक महकमों ने इसे रोकने की कोशिश की थी। यही नहीं भारतीय उद्योग जगत और नव उदारवादी अर्थशास्त्रियों ने भी सरकार के ऐसें कदमों को फिजूलखर्ची माना था। लेकिन सहयोगी वामपंथी पार्टियों के दबाव के चलते यूपीए सरकार को आखिरकार, इस योजना के लिए रजामंद होना पड़ा। ओर नतीजा सबके सामने है। उधोग धांधों के आड़े वक्त में नरेगा ने ही ग्रामीण मांग को बरकरार रखा और भारतीय अर्थव्यवस्था को डूबने से बचा लिया। किसानों के 70 हजार करोड़ के कर्ज माफी ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नरेगा की कामयाबी से उत्साहित यूपीए सरकार अब जबकि षहरी गरीबों के लिए भी ऐसी ही किसी योजना पर गंभीरता से विचार कर रही है तो, इस योजना को सभी को जानना लाजिमी होगा। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून-2005, अकुशल मजदूरों को अपने ही गांव में 100 दिन काम देने की गारंटी प्रदान करता है। ये कानून गारंटी इस बात की भी देता है कि यदि मांगने के बाद भी किसी को काम नहीं दिया जा सका तो वह बेरोजगारी भत्ता पाने का हकदार होगा। ये बेरोजगारी भत्ता आवेदन के 15 दिनों के अंदर काम नहीं दे पाने की स्थिति में मिलेगा। यही नहीं कानून,काम के बंटबारे में महिलाओं को भी प्राथमिकता देता है। कानून यह सुनिश्चित करता है कि लाभार्थियों में एक तिहाई महिलाएं होना चाहिए। कुल मिला कर ये अधिनियम रोजगार की कानूनी गारंटी देता है। यह राष्ट्र को कानूनी दायित्व बताता है और मजदूरों को अपने मूल्यांकन का अधिकार प्रदान करता है। जाहिर है इससे सरकार की मजदूरों की जानिब जिम्मेदारी तय होती है। जबकि इससे पहले आई कई सरकारी योजनाएं मसलन-रोजगार योजना,राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम,जवाहर रोजगार योजना और सम्पूर्ण रोजगार योजना किसी भी तरह लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकीं थी। इनमें से कई योजनाओं के बारे में तो लोगों को मालूम तक नहीं चला। बहलहाल,देश में योजनाएं आती-जाती रहीं लेकिन विकास कहीं नजर नहीं आया। रोजगार गारंटी अधिनियम लागू हो जाने के बाद ही मजदूरों को स्थाई कानूनी अधिकार मिला।

देश के समावेश विकास और सामाजिक सुरक्षा के उपाय के रुप में शुरु हुए नरेगा ने ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल कर रख दी। न्यूनतम मजदूरी पर 100 दिनों के रोजगार की गारंटी हांलाकि,कोई ऐतिहासिक कदम नहीं है लेकिन किसी तरह अपना जीवन यापन कर रहे लोगों के लिए ये मानीखेज जरुर है। 20 रुपए रोज पर गुजर-बसर करने वाले अधिकांश भारतीयों की गरीबी और भूख मिटाने में ये अधिनियम सहायक साबित हुआ है। अधिनियम के अमल में आने के बाद गांवो से शहरों में पलायन कम हुआ है। क्यों कि जब गांव में ही काम मिलेगा तो शहरों की तरफ लोग क्यों दोड़ेगें। रोजगार गारंटी योजना ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण का भी महत्वपूण  स्त्रोत साबित हुई है। लाभ पाने वाले मजदूरों में महिलाओं का अनुपात अधिक होने से उन्हें आर्थिक आजादी हासिल हुई है। योजना के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में सार्थक संपदा का सृजन हुआ है। परिसंपत्तियों का निर्माणा बड़े पैमाने पर हुआ, उत्पादक क्षमता बड़ी और अतिरिक्त क्रय शक्ति का सृजन हुआ।

कुल मिलाकर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की वजह से ही भारतीय अर्थव्यवस्था को आर्थिक मंदी छू नहीं पाई। नरेगा जिस मकसद के लिए बनाई गई थी, वह मकसद हासिल हुआ है। ग्रामीण पुनर्संरचना के लिए नरेगा दुनिया के सबसे बड़े कार्यक्रम के तौर पर साबित हुई है। अब जरुरत इस बात की है कि यूपीए सरकार अपने आगामी कार्यकाल में इस योजना की खामियों की तरफ खास तवज्जो दे। योजना में पारदर्शिता और अवाम की जानिब जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र निगरानी और शिकायत निवारण तंत्र कायम किए जाएं । क्योंकि दुनिया अभी पूरी तरह से आर्थिक मंदी से उबर नहीं पाई है। बल्कि भविष्य में भारत को ओर भी ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

जाहिद खान