संस्करण: 22जून-2009

 

कानपुर कालेज में ड्रेस कोड :
यह रवैया शोहदों के व्यवहार को वैधता प्रदान करता है
 

अंजलि सिन्हा

कानपुर के कई कालेजों ने नए सत्रा में कालेज खुलने से पहले ही छात्राओं को उनके ड्रेस के बारे में चेताया है तथा फरमान जारी किया है कि वे अब जीन्स और टॉप में कॉलेज न आएं। न सिर्फ कॉलेज प्रशासन बल्कि जिला प्रशासन ने भी इस पाबन्दी पर सहमति जताई है। दयानन्द गर्ल्स डिग्री कालेज, आचार्य नरेन्द्र देव कालेज, सेन बालिका कालेज तथा जोहारी देवी डिग्री कालेज ने ऐसा निर्देश जारी किया है। दयानन्द डिग्री कालेज की प्रिन्सिपल मीता जमाल ने कहा कि अक्सर लड़कियां तंग कपड़ों में कालेज आ जाती हैं। छेड़खानी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए हमारी जिम्मेदारी बन जाती है कि हम बचाव के लिए कदम उठाएं। अन्य कालेजों के प्रशासन की तरफ से भी ऐसा ही कारण बताया गया। शहर की एसडीएम शकुन्तला देवी ने कहा कि कपड़े हर सीज़न में शालीन होने चाहिए। पढ़ने वाली छात्राओं की प्रतिक्रिया मिलीजुली आयी है।

ज्ञात हो कि कानपुर में पिछले दिनों दो विदेशी महिलाओं के साथ बदसलूकी तथा यौनहिंसा की घटना सामने आयी थी तथा दूसरी घटना में दो लड़कियों के साथ सड़क पर छेड़खानी करते कपड़े फाड़ दिए गए थे। कहां तो इस घटना पर शहर उद्वेलित होता, शोहदों को काबू में करने के लिए तथा दूसरे शोहदे भी ऐसा हिम्मत न जुटा पाए इसके लिए पुलिस पर दबाव बनाता तो उल्टे एसडीएम महोदया ने लड़कियों को ही नसीहत देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया है। यहां तक कि लड़कियों को साथ में मोबाइल फोन रखने पर भी मनाही की गयी है। दयानन्द कालेज के प्रिन्सिपल ने अपने स्टाफ को भी कालेज परिसर में मोबाइल का इस्तेमाल न्यूनतम तथा इमर्जन्सी में ही करने को कहा है क्योंकि वह पढ़ाई तथा अन्य प्रशासनिक कामों में बाधा उत्पन्न करता होगा। लेकिन संकट के समय में मोबाइल द्वारा लड़कियां पुलिस या अन्य को कैसे मदद के लिए फोन करें, इस सन्दर्भ में पुलिस प्रशासन पर कालेज को दबाव डालना चाहिए था। कोई हेल्पलाइन नम्बर उपलब्धा हो और जब भी लड़कियां फोन करें तो उनकी मदद को सुनिश्चित किया जा सकता था। यदि उन्हें लड़कियों की सुरक्षा की ही चिन्ता थी तो लड़कियों को ऐसे प्रशिक्षण की व्यवस्था का इन्तजाम कर सकती जिससे वे आत्मविश्वास तथा मुकाबला के लिए तैयार होती।

ऐसे निर्देश जारी करके प्रशासन ने अपनी अज्ञानता तथा पितृसत्तात्मक सोच का परिचय दिया है कि यौन उत्पीड़न का कारण पहनावा है। उन्होंने उन असामाजिक तत्वों को भी इस फरमान से सन्देश दिया है कि गलती तो हमारी लड़कियों की है तुम लोग तो ऐसा कर ही सकते हो। क्या इन पढ़े लिखे लोगों को यह नहीं पता कि तंग और छोटे कपड़े तो क्या यदि कोई अपने पागलपन या बददिमागी में ही सही निर्वस्त्रा हो तब भी उससे यौन दरुव्यवहार नहीं किया जा सकता है। क्या पारम्पारिक पोशाक में छेड़खानी नहीं होने की गारंटी है। उन्हें नहीं पता कि दिल्ली की एक संस्था साक्षी ने बलात्कार के दर्ज मुकदमो के चालीस साल के रेकार्ड को देख कर पाया कि इनमें सत्तार प्रतिशत पीड़ित महिलाएं पारम्पारिक पोशाक पहनी थीं। इन्हें यह भी जानकारी नहीं है कि हमारे देश के विभिन्न आदिवासी संस्कृति में कई जगहों पर बहुत कम कपड़ों का इस्तेमाल होता रहा है, फिर भी इस कारण आदिवासी महिलाएं यौन हिंसा का शिकार नहीं होती थीं। कपड़ें ऐसे हों कि वैसे हों इसमें राय तथा पसन्द जरूर हो सकती है। हो सकता है कि हममें से किसी को आजकल के कपड़े नापसन्द हो लेकिन इस कारण से कोई किसी के साथ छेड़छाड़ कर ले यह निहायत ही पिछड़ी सोच तथा पुरूषवादी नज़रिया है।

भारतीय संस्कृति में नैतिकता का सारा ठेका मानों महिलाओं के लिए है। उन्हें अपने कथित इज्जत का बचाव स्वयं करना पड़ता है। हमारे समाज में कोठे भी मौजूद हैं जहां 'पतितायें' रहती हैं और वहां जाने वाले पुरूषों का कुछ भी नहीं बिगड़ता है। इसी तरह गुण्डे और शोहदे तथा साथ में कुछ ''शरीफ'' लड़के भी लड़की को अपनी आक्रामकता तथा हवस के शिकार बना सकते हैं, उन्हें कभी कभार पुलिस पकड़ कर कार्रवाई भी करेगी लेकिन समाज के लोग तथा प्रबुध्दवर्ग अपने घर और कालेज तथा युनिवर्सिटी से लड़कियों के लिए फरमान नहीं जारी करेगा। कई दूसरे मामलों में आधुनिक विचार रखने वाले भी कहते मिल जाएंगे कि साहब लड़कियां भी तो छेड़खानी आफर करती हैं अपनी पोशाकों से।

यह सच है कि लड़कियां भी कई बार खुद को सेक्स आब्जेक्ट के रूप में पेश करती हैं और यह बिल्कुल अलग मुद्दा और समस्या है कि पूंजीवादी समाज कैसे ऐसी मानसिकता तैयार करता है, लेकिन यह वजह कत्ताई नहीं हो सकती है जोर-जबरदस्ती करने के लिए। आखिर यह कैसे किसी पुरूष का हक हो सकता है कि वह उसका उपभोक्ता है वह भी बिना आज्ञा के। यह ठीक से समझना जरूरी है कि किसी के रहन-सहन, पहनावा नापसन्द हो सकता है, कोईभी अलग परिधान को बढ़ावा दे सकता है या खराब मान सकता है किन्तु इनमें से कोई भी व्यवहार किसी और को यानि असामाजिक तत्वों को अधिकार सम्पन्न नहीं बनाता है। इसी अर्थ में कानपुर कालेजों के प्रबन्धानों ने समाज विरोधी काम किया है कि शोहदों के व्यवहार को वैधाता का सन्देश दिया है।

अंजलि सिन्हा