संस्करण: 22जून-2009

 

अमेरिकी की दोगली नीति कितनी जायज
 

 नीरज नैयर

वैसे तो हर देश के अपने हित होते हैं और वो उसके अनुरूप ही नीतियो का निर्धारण करते हैं लेकिन फिर भी जब आप अपने आपको आका साबित करने लगो और दूसरों के मसलों को सुलझाने में भूमिका निभाने लगो तो आप पक्षपातपूर्ण रवैया कतई अख्तियार नहीं कर सकते. आपको सबके साथ तटस्थ भाव से पेश आना जरूरी हो जाता है क्योंकि समाजिक ढांचे में बड़ों को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वो समानता के आधार के साथ छोटों के साथ पेश आएं और महज अपने हितों की पूर्ती की खातिर किसी के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार न होने दें. मगर पश्चिमी देश न तो बड़ों की जिम्मेदारी ठीक ढंग से निभा पा रहे हैं और न ही नफे-नुकसान में स्वार्थ के मिश्रण को नियंत्रित करने की कोशिश करते दिखाई पड़ रहे हैं. उनकी नीतियां महज अपनी स्वार्थपूर्ती तक ही सिमट कर रह गई है.

पाकिस्तान को लेकर जिस तरह की उदारता अमेरिका आदि देशों की तरफ से प्रदर्शित की जा रही है यह इसका जीता-जागता सबूत है. अभी कुछ वक्त पहले तक उत्तर कोरिया ने दोबारा परमाणु परीक्षण किया था तो विश्व समुदाय में इसकी घोर निंदा हुई थी. अमेरिका ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करार देते हुए विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था, ब्रिटेन,जापानआदि ने कठोर कार्रवाई की मांग की थी और संयुक्त राष्ट्र ने कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी दे डाली थी. मगर अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट पर यह गुट इस कदर चुप्पी साधे बैठा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं है. इस रिपोर्ट में पाकिस्तान की परमाणु तैयारी के बारे में पूर्व में हो चुके कुछ गंभीर रहस्योद्धाटनों की पुष्टि की गई है. रिसर्च सर्विस की रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि पाकिस्तान के पास 60 से अधिक परमाणु बमों का भंडार जमा हो चुका है और अब उसने भारत पर जवाबी हमला करने की क्षमता भी हासिल कर ली है. इसके साथ ही एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम में पाकिस्तान की अहम भूमिका रही है. रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि मिसाइल तकनीक के बदले पाकिस्तान ने ही उत्तर कोरिया को परमाणु प्रौद्योगिकी मुहैया कराई. उसने उत्तर कोरिया को यूरेनियम का संवर्द्धन करने वाले सेंट्रीफ्यूज के डिजाइन भी उपलब्ध कराए. उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर तैयार की गई इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच इस सौदे पर 1996 में चर्चा हुई. तब उत्तर कोरिया ने पाकिस्तान की परमाणु प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के लिए अपनी लंबी दूरी की मिसाइल तकनीक देने पर सहमति जताई थी. रिपोर्ट में बताया गया कि उत्तर कोरिया व पाकिस्तान के बीच सहयोग पर अन्य सूचनाएं 1993 से पहले की हैं. उत्तर कोरिया मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के देशों को मिसाइल निर्यात करता रहा है. मिसाइलों के विकास में उसे ईरान और पाकिस्तान से भी लगातार सहयोग मिलता रहा है. इन रिपोर्टों से पाक की पर्दे की पीछे की षडयंत्रकारी योजनाओं का खुलासा साफ तौर पर हो गया है. बावजूद इसके कथित बड़े देश उसकी नकेल कसने की तरफ विचार भी नहीं कर रहे हैं. इस बात की आशंका बार-बार जताई जाती रही है कि पाक का परमाणु हथियारों का जखीरा गलत हाथों में जा सकता है. जिस तरह से आतंकवाद वहां दिन ब दिन बेकाबू होता जा रहा है, उससे इस आशंका से इंकार भी नहीं किया जा सकता. तालिबान पाक में अपनी जड़ें जमा चुका है और सेना को उसे खदेड़ने में नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं. आम आदमी से लेकर भारी-भरकम सुरक्षा बंदोबस्त में रहने वाले राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भी दहशतजदां नजर आ रहे हैं मगर अमेरिका लगातार यह कह रहा है कि पाक का परमाणु जखीरा महफूज हाथों में है. दरअसल उत्तर कोरिया और पाकिस्तान को धनी देशों का यह गुट अलग-अलग नजरीए से देखता है. उन्हें लगता है कि उत्तर कोरिया की परमाणु मिसाइलें तो उनके लिए खतरा पैदा कर सकती हैं, लेकिन पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की पहुंच उन तक नहीं हो सकती. इसलिए उन्हें उत्तर कोरिया का हर कदम अपने खिलाफ नजर आता है और पाक के हर कदम में उन्हें बेचारगी दिखाई देती है. उत्तर कोरिया का इतिहास जिन्हें पता है, वह जानते हैं कि यह देश किस वजह से विनाश के हथियारों के खेल का हिस्सा बना हुआ है. उत्तर कोरिया एक ऐसा देश है जिसके दोस्त नाम मात्र के हैं. वो मदद के लिए उस तरह की गुहार नहीं लगा सकता है जैसे अन्य देश लगाते हैं.और इसलिए यदि उसे तेल और अनाज की जरूरत पूरी करनी होती है तो वो अपने परमाणु कार्यक्रम को मोलभाव का हथियार बनाता है. उत्तर कोरिया 1953 में एक स्वतंत्र देश बना और शुरूआती दौर में देश में औद्योगीकरण और पुनर्निर्माण का काम काफी तेजी से हुआ मगर लंबे समय तक विकास की रफ्तार को वो कायम नहीं रख पाया.नतीजतन लोगों का जीवन स्तर गिरता गया और अर्थव्यवस्था बैठने लगी. वर्ष 2002 में उत्तर कोरिया ने कई आर्थिक सुधारों की घोषणा की, मूल्य नीति में बदलाव किया गया, राशन व्यवस्था खत्म की गई. पर फिर भी स्थिति नहीं सुधरी, कीमतें आसमान छूने लगीं, चावल की कीमत में पचपन हजार प्रतिशत की वृध्दि हुई, मक्का पांच हजार प्रतिशत तेज हुआ, बिजली में 143 प्रतिशत की तेजी आई मगर लोगों के वेतन में केवल 1800 प्रतिशत की वृध्दि हुई. सरकार की सोच थी कि यदि मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखा गया तो अर्थव्यव्स्था में एक नई तेजी आएगी. सरकार का मानना था कि मुल्क में बहुत से ऐसे संसाधन प्रचुर मात्रा में है जिनका ठीक तरीके से इस्तेमाल करके अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है लेकिन उसकी यह सोच गलत साबित हुई. आर्थिक सुधारों का दौर नहीं चलने से मुफलिसी और गरीबी ने देश को ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया जहां से निकलने के लिए उसने 2002 में कथित तौर पर परमाणु कार्यक्रम शुरू करने की घोषणा की. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सौदेबाजी का जो दौर शुरू हुआ वो अब तक बदस्तूर जारी है. उत्तर कोरिया के पास आर्थिक सुधारों का अभाव है, और उसे जिंदा रहने के लिए लगातार अनुदान की जरूरत है. इसलिए वो हमेशा परमाणु परीक्षण की धमकी देकर जरूरत का साजो-समान अन्य देशों से हासिल करता रहता है, मगर अमेरिका द्वारा अनावश्यक दबाव और उत्तर कोरिया के खिलाफ व्यापक माहौल करने के चलते उसने पुन: परीक्षण का कदम उठाया.हालांकि परमाणु हथियारों की दौड़ में शरीक होकर शांति की विचारधारा का उल्लंघन करने को सही नहीं कहा जा सकता मगर पाक इस मामले में उत्तर कोरिया से कहीं अधिक गुनाहगार है. क्योंकि उसके जो हालात हैं वह उसने खुद ही तैयार किए हैं. कई अमेरिकी रिपोर्टों में इस बात का खुलासा हो चुका है कि पाक पश्चिमी देशों से मिलने वाली आर्थिक सहायता का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर रहा है पर फिर भी उस पर धनवर्षा की जा रही है. तालिबान को खड़ा करने की पहल के अंजाम को भुगतने के बाद भी अमेरिका-ब्रिटेन इस गुमान में हैं कि पाक के परमाणु हथियारों से उनका बाल-बांका, पर शायद को भूल गये हैं कि पाक जिहादियों की हिट लिस्ट में उनका नाम सबसे ऊपर है. अगर अब भी उन्होंने उत्तर कोरिया को फटकार और पाक को उपहार वाली नीतियों को नहीं बदला तो उनके साथ-साथ पूरे विश्व को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.
 

 

 नीरज नैयर