संस्करण: 22जून-2009

 

संसद में महिला आरक्षण से
दूर होगी विषमता
 

अंजनी कुमार झा

स्वातंत्र्योत्तर भारत मे छह दशक बाद भी महिलाओं को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है, जबकि रवांडा जैसे अविकसित देश में संसद में महिलाओं के लिए तीस प्रतिशत सीटों का आरक्षण 1994 के बाद हो गया था। विश्व के अनेक देशों में महिलाओं की स्थिति को समय और उच्च करने हेतु आरक्षण की व्यवस्था की गई है।

भारत में महिलाओं को संसद में एक तिहाई आरक्षण देने संबंधी विधोयक के पारित होने से आधी दुनिया को समुचित प्रतिनिधित्व मिलने की पूरी संभावना है। विगत छह दशकों में राजनीति समेत हर क्षेत्र में महिलाओं ने प्रगति तो की है, किंतु विधायिका में पंचायतीराज की भांति संसद, विधानसभा में महिलाओं को निश्चित आरक्षण मिले तो विभेद काफी हद तक मिटेगा। साथ ही नारी जगत में जागृति बढ़ने से कई प्रकार की सामाजिक,शैक्षणक व सांस्कृतिक समस्यायें खत्म हो जायेंगी। मधयप्रदेश, राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण अब पचास प्रतिशत हो गया है। आरंभिक चरण में पति ही महिला सरपंच को मार्गदर्शन देते थे, किंतु दो-तीन चरण के बाद साक्षरता दर में अभिवृध्दि के कारण महिला सरपंच स्वयं निर्णय लेने लगीं। इसी प्रकार संसद फिर विधानसभा  में भी महिला आरक्षण के लागू होने से राजनीतिक पटल पर भी आमूल-चूल परिवर्तन आयेगा। महिलाओं का वोट पाने और उन्हें उचित प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए सभी राजनीतिक दलों में महिला प्रकोष्ठ संचालित होता है और योग्य महिला प्रत्याशी की तलाश भी की जाती है। विधोयक पारित होने से इस असमानता को दूर करने के साथ लिंगानुपात में व्यापक अंतर, भेदभाव, नज़रिये में अंतर आदि से निजात मिलने की पूरी संभावना है। स्वतंत्रता के बाद हमारे यहाँ जो लोकतांत्रिक प्रणाली लाई गई वह वैश्विक वयस्क मताधिकार पर आधारित है। नागरिकों को मिले समान अधिकारों के साथ ही भारतीय महिलाओं को समान शैक्षिक अवसर, संपत्ति और विरासत में बराबर का अधिाकार प्राप्त हुआ, जिससे सामाजिक स्तर पर स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार आया, लेकिन राजनीतिक मानचित्र के न बदलने से प्रभाव न्यूनतर रहा। भारत सहित अनेक देशों में विगत कुछ वर्षों से 'महिला सशक्तिकरण' की अवधारणा का प्रयोग हो रहा है। इस संबंधा में ऑफिस ऑफ द यूनाइटेडनेंशस हाईकमिश्नर फॉर ह्यूमन राइट्स ने लिखा है, ''यह औरतों को शक्ति, क्षमता तथा योग्यता देता है, ताकि वह अपने जीवन स्तर को सुधार कर अपने जीवन की दिशा को स्वयं निधर्रित कर सकें।'' इस प्रक्रिया के माध्यम  से महिलाओं को सत्ता की कार्यशैली समझ में आ रही है। इसके अतिरिक्त, उन्हें सत्ता के स्त्रोतों पर नियंत्रण कर सकने की क्षमता भी बढ़ रही है।

इस संबंधा में महिलाओं की स्थिति की विवेचना करने के लिये 1974 में समिति गठित की गई थी। 'टुवर्ड्स इक्वलिटी' शीर्षक से 1974 में प्रकाशित इस समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि संस्थागत तौर पर सबसे बड़ी अल्पसंख्यक होने के बावजूद राजनीति पर महिलाओं का असर नाममात्र है। समिति का सुझाव था कि हर राजनैतिक दल महिला उम्मीदवारों का कोटा निधर्रित करें और जब तक ऐसा हो, तब तक उपाय के तौर पर समिति ने नगर परिषदों और पंचायतों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए संविधान में संशोधान करने की सिफारिश की। 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम  से ऐसा किया गया। अब 16 साल बीत गये। कई अनुभवी महिला सरपंच, महिला जिला पंचायत अधयक्ष विधानसभा  व लोकसभा का चुनाव लड़ने का अनुभव रखती है। चुनाव की इस पाठशाला से महिलाओं को निम्न व उच्च सदन में प्रतिनिधित्व मिलेगा तो सामाजिक संतुलन कायम रहेगा। निकाय व पंचायत स्तर पर मिली सफलता के बाद पश्चिमी देशों की भांति भारत में भी यह प्रावधान करना चाहिये। दसवीं, बाहरवीं की परीक्षा में सर्वोच्च अंक लड़कियां ही पाती हैं। उच्च शिक्षा में भी प्रावीण्य सूची में उनका प्रतिशत कहीं ज्यादा है। सेवा के क्षेत्रों के अतिरिक्त, जोखिम भरे कामों में भी उन्हें अपार सफलता मिल रही है। पंचायती राज संस्था, जो जमीनी लोकतांत्रिक ढांचे निर्मित करती है, में महिलाओं की भागीदारी ने ग्रामीण संरचना को सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में बढ़ाया। अगर महिलाओं को संसद तथा विधानमंडलों में आरक्षण प्राप्त होगा तो एक तरफ महिलाएं चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बनेंगी और दूसरी तरफ राजनीतिक दलों में सक्रिय सहभागिता का अवसर प्राप्त होगा जिससे महिला सशक्तिकरणा की अवधारणा मूर्त रूप ग्रहण कर सकेगी। यह आरक्षण उन्हें संकीर्ण व सीमित दायरे से बाहर लाने में मद्दगार सिध्द होगा और साथ ही यह भी साबित होगा कि पारिवारिक परिवेश से बाहर की समस्याएं भी उनकी समस्याएं हैं। इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन के अनुसार 2005 में विभिन्न देशों में महिलाओं का वहाँ की संसद में प्रतिनिधित्व भारत की अपेक्षा बहुत अधिक रहा है। यह स्वीडन में 45.3, नार्वे में 37.9, डेनमार्क में 36.9, मोजाम्बिक में 34.8 प्रतिशत था। यहाँ तक कि पाकिस्तान में भी संसद में महिला प्रतिनिधात्व 21.2 प्रतिशत है। विधायिका में महिला सदस्यों की दृष्टि से भारत का स्थान 183 देशों में 134वां है और वह उन 67 देशों में सम्मिलित है, जिनमें महिलाओं का प्रतिनिधित्व दस प्रतिशत से भी कम है। 1991 में चुनाव लड़ने वाली महिलाओं में से 11.38 प्रतिशत चुनाव जीती जबकि पुरुषों में सिर्फ 5.77 प्रतिशत चुनाव जीत सके। 1996 में महिलाओं का प्रतिशत 6.5 था जबकि पुरुषों का 3.75 प्रतिशत था। इस तथ्य से यह भी स्पष्ट हो गया कि महिलाओं की चुनाव जीतने की संभावना पुरुषों से कहीं अधिक है।

स्वतंत्रता, विकास, खुलेपन एवं उदार दृष्टि का समुच्चय व्यक्ति की क्षमता और सामर्थ्य को अपरिमित बना देता है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय आंदोलन के गांधीवादी दौर में महिलाएं बड़ी संख्या में घर की चारदीवारी से बाहर निकलती थीं और आजादी की लड़ाई में उन्होंने अहम एवं सक्रिय भागीदारी निभाई थी। बापू ने स्पष्ट तौर पर कहा था, ''समाज महिलाओं की समानता, उनके सम्मान और अधिकारों को स्वीकारें तथा उन्हें पतियों व परिवार के साथ बराबर की भागीदार माने।''

परिवर्तन के वाहक के तौर पर राजनीतिक दलों को लैंगिक विषयों के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। विश्व के लगभग सभी हिस्सों में महिलाओं का बढ़ा हुआ प्रतिनिधित्व सिर्फ उन्हें समान नागरिक के तौर पर स्वीकार करने के लिए नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्त्रीपरक दृष्टिकोण को सम्मिलित करने हेतु किया गया। राजनीतिक नेतृत्व महिलाओं के विकास से सीधो तौर पर जुड़ा हुआ है, इसलिये आवश्यकता है कि राजनीतिक दल और उनसे संबध्द संगठन अपनी पुनर्रचना करें जहां महिलाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता और जवाबदेही हो। विधायिका में महिलाओं की संख्या केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को तीव्रता प्रदान करेगा बल्कि लैंगिक समानता और न्याय के प्रति प्रतिबध्द समाज का निर्माण भी करेगी।

मौजूदा लोकसभा में महिलाओं का प्रतिशत 8.16 है जो 2004 के चुनाव से चार प्रतिशत कम है। 1957 में यह 48.89 प्रतिशत था, जबकि शिक्षा के स्तर में जब गुणात्मक वृध्दि हुई है। आंकड़े के मुताबिक, कभी भी महिलाओं को छह फीसदी से अधिक टिकट नहीं दिये गये। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अधययन के अनुसार पूरी दुनिया में महिलाओं की 50 फीसदी आबादी है जो अधिकारिक श्रम की एक तिहाई है। ये काम के घंटों में दो-तिहाई का उपयोग करती हैं और दुनिया की कुल आय का दसवां हिस्सा प्राप्त करती हैं। आश्चर्यजनक रूप से विश्व की संपत्ति पर एक प्रतिशत से भी कम पर उनका अधिकार है, जबकि सामाजिक विकास में भला उनके योगदान को कैसे नकारा जा सकता है। ऐसे में राजनीतिक भागीदारी बढ़ने से विकास के नये आयाम स्थापित होंगे जो सामाजिक बुनावट के लिए लाभप्रद होगा।

 

अंजनी कुमार झा