संस्करण: 22जून-2009

 

आरएसएस ने सरदार पटेल से किया गया
वायदा तोड़ा है
 

 

एल.एस.हरदेनिया

देश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में गहन चिंतन जारी है। ये दो पार्टियां हैं भारतीय जनता पार्टी एवं माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी। दोनों पार्टियों की सबसे बड़ी ताकत अपनी विचाराधारा के प्रति उनकी प्रतिबध्दता है। इन दोनों पार्टियों के सामने एक वैचारिक संकट उत्पन्न हो गया है। परंतु दोनों संकटो में अंतर है। जहां भारतीय जनता पार्टी में इस बात पर भी बहस हो रही है कि क्या उसे अपनी परंपरागत वैचारिक प्रतिबध्दता से चिपके रहना चाहिए या उसमें कुछ परिवर्तन किया जाए। जहां तक माक्र्सवादी पार्टी का सवाल है उसके सामने यह प्रश्न विचारणीय नहीं है। स्पष्ट है वह किसी भी स्थिति में माक्र्सवाद को नहीं छोड़ सकती है। परंतु उसके सामने दूसरे प्रश्न अवश्य हैं जिनपर उसे गहराई से विचार करना होगा। आखिर क्या कारण हैं जिनके चलते अपने परंपरागत गढ़ों में इस पार्टी को मँह की खानी पड़ी। पश्चिम बंगाल एवं केरल में गरीबों ने सीपीएम के हाथ में सत्ता सौंपी थी। कुछ वर्षों पूर्व पश्चिम बंगाल के एक वामपंथी चिंतक, जो एक समय वहां की वामपंथी सरकार में मंत्री भी रहे थे, ने लिखा था कि बंगाल के लोग वामपंथियों को इसलिए चुनते हैं क्योंकि उन्होंने गरीबों को सुरक्षा व इज्जत (Dignity) दी है। बंगाल के पुलिस थानों में गरीबों को जलील नहीं किया जाता है। वहां भूमि सुधार इस तरह किया गया है जिससे जमीदारों की सामाजिक व राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई है। पश्चिम बंगाल व केरल में हुए भूमि सुधारों की प्रशंसा सारी दुनिया में हुई है। इसी तरह केरल की साक्षरता तथा सामाजिक चेतना, खेतिहर मजदूरों की सुरक्षा आदि की चर्चा भी विश्व के पैमाने पर हुई है। शायद केरल देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां कृषि मजदूरों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं और बड़े जमींदार उनका शोषण नहीं कर पाते हैं। एक बात और-कम्यूनिस्ट और भ्रष्टाचार एक दूसरे के दुश्मन समझे जाते थे। कम्यूनिस्ट जन प्रतिनिधियों एवं मंत्रियों की सादगी की चर्चा हर महफिल में होती थी। अभी हाल तक किसी भी कम्यूनिस्ट नेता पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा था। केरल के विजयन पहिले कम्यूनिस्ट नेता हैं जिनके विरूध्द भ्रष्टाचार के आरोप की जांच हो रही है। यह कहना मुश्किल है कि उन्होंने भ्रष्टाचार किया है या नहीं परंतु यह तथ्य कि उनपर आरोप लगा है अपने आप में एक चिंता की बात है। अभी तक किसी की हिम्मत नहीं थी कि किसी कम्यूनिस्ट नेता पर भ्रष्ट आचरण का आरोप लगाए।

कम्यूनिस्टों की एक और पहचान थी कि वे गुटबंदी से दूर रहते हैं। उनके बीच बहस होती थी, विवाद होते थे किंतु गुटबाजी नहीं होती थी। केरल में तो पार्टी के भीतर अत्यधिक निम्न स्तर की गुटबाजी जारी है। वहां पार्टी दो गुटों में बंटी हुई है। एक गुट का नेतृत्व मुख्यमंत्री कर रहे हैं और दूसरे का वहां के पार्टी सचिव। गुटबाजी इस हद तक बढ़ गई है कि सुप्रसिध्द माक्र्सवादी नेता स्वर्गीय एम. एस. नम्बूदरीपाद की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में वहां के मुख्यमंत्री श्री अच्युतानंदन को ही आमंत्रित नहीं किया गया। यह देखने की बात है कि पार्टी इस आंतरिक संकट से कैसे उबरती है।

जहां कम्यूनिस्ट पार्टी का आंतरिक संकट चरम पर है वहीं भारतीय जनता पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल स्वयं की पहचान का है। पार्टी अभी तक तय नहीं कर पाई है कि वह किन कारणों से सत्ता हासिल करने में असफल रही। जहां पार्टी के कुछ लोग कहते हैं कि हिन्दुत्व से चिपके रहने से पार्टी की हार हुई है वहीं कुछ लोगों की राय यह है कि हिन्दुत्व को त्यागने से पार्टी की हार हुई है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबंधों पर भी भारतीय जनता पार्टी में बहस जारी है।

जहां तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का सवाल है उसकी पूरी कोशिश है कि भारतीय जनता पार्टी को उनके हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र के सपने को पूरा करना है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भारतीय जनता पार्टी के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। उसकी स्पष्ट राय है कि भाजपा को उसके आदेशों के अनुसार चलना चाहिए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता यह भूल गए हैं कि उसने सरदार वल्लभ भाई पटेल से वायदा किया था कि वह मात्र एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में कार्य करेगी।

महात्मा गांधी  की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंधा लगा दिया गया था। प्रतिबंधा लगने के बाद संघ की ओर से सघन प्रयास हुए कि प्रतिबंधा हटा दिया जाए। प्रतिबंधा लगने के पूर्व संघ का कोई संविधान नहीं था। संघ पर लगे प्रतिबंधा को हटाने की मांग के संदर्भ में पटेल ने उसके नेताओं से कहा कि वे सर्वप्रथम अपने संविधान का प्रारूप उन्हें दें। उसके बाद ही प्रतिबंधा हटाने संबंधी उनकी मांग पर विचार किया जाएगा।

अंतत: संघ ने सरदार पटेल का आदेश माना और अपना संविधान भारत सरकार को सौंपा। संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संघ एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में काम करेगा। संघ के संविधान के अनुच्छेद चार में कहा गया है कि संघ की राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है। हां, उसके सदस्य चाहें तो किसी भी राजनैतिक पार्टी में शामिल हो सकते हैं। सरदार पटेल को दिए गए स्पष्ट आश्वासन के बावजूद और तदानुसार संविधान में प्रावधान करने के बावजूद संघ के नेता सीधो राजनीति में दखल देते हैं। ऐसा करके वे सरदार पटेल को दिए आश्वासन का उल्लंघन कर रहे हैं। संघ के मुखिया भाजपा की रोजमर्रा की गतिविधियों में हस्तक्षेप करते हैं, वे तय करते हैं कि कौन भाजपा का अधयक्ष बनेगा, कौन सांसद बनेगा, कौन विधानसभा का चुनाव लड़ेगा, कौन मंत्री बनेगा। यहां तक कि भाजपा के नेताओं को भारतीय संविधान में प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी भी नसीब नहीं है।

संघ के रवैये के कारण ही 1977 में बनी जनता पार्टी सरकार सत्ता से बाहर हुई थी और पार्टी टूटी थी। यदि इसी तरह की जिद्द रही तो शायद किसी दिन भारतीय जनता पार्टी का भी अंत हो सकता है।

वर्तमान में भाजपा पर संघ का पूरा नियंत्रण है। संघ, संगठन मंत्रियों के माधयम से भाजपा पर अपना सख्त अनुशासन थोपता है। परन्तु पिछले कुछ वर्षों में भाजपा का चरित्र बदल गया है। एक समय था जब भाजपा एवं उसकी पूर्ववर्ती जनसंघ के सभी सदस्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्य थे। परन्तु धीरे-धीरे पार्टी का चरित्र बदलता गया और इसमें ऐसे लोगों को प्रवेश दिया जाने लगा जिनका कभी संघ से कोई नाता नहीं रहा। यशवंत सिन्हा और संभवत: जसवंत सिंह इसी तरह के व्यक्तियों में हैं। चूंकि महिलाओं के लिए संघ में कोई स्थान नहीं है इसलिए भाजपा की सभी महिला नेत्रियां भी इसी श्रेणी में आती हैं। संघ में मुसलमानों का भी स्थान नहीं है इसलिए भाजपा के जो भी मुस्लिम सदस्य हैं वे भी गैर-आरएसएस पृष्ठभूमि के हैं। पार्टी के चरित्र में आ रहे इस परिवर्तन का प्रभाव पार्टी की नीतियों व दृष्टिकोणों में प्रतिबिंबित होने लगा है।

इस तरह इस बात की पूरी संभावना है कि संघ और भाजपा के संबंधों पर विवाद और गंभीर रूप ले ले। मीडिया में आ रही रिपोर्टों के अनुसार आडवाणी भी इस मत के हैं कि भाजपा को संघ के नियंत्रण से मुक्त होना चाहिए।

स्पष्ट है संघ से जुड़े रहते हुए भाजपा मुसलमानों का विश्वास नहीं जीत सकती। और जबतक मुस्लिम मतदाताओं को भाजपा अपनी ओर आकर्षित नहीं करती तब तक उसका अपने बलबूते पर केन्द्र की सत्ता पर काबिज होना लगभग असंभव होगा। अब तो भाजपा के अंदर भी इस तरह के सशक्त स्वर उठने लगे हैं कि पार्टी को मुसलमानों का विश्वास जीतने का प्रयास करना चाहिए। स्वयं आडवाणी भी इस तरह के विचार के समर्थक हैं। कुल मिलाकर भाजपा की स्थिति एक ऐसे व्यक्ति की तरह है जो एक चौराहे पर खड़े होकर पथ पूछे, घबराए और दुविधा में रहे कि वह किस ओर जाए।
 

  

एल.एस.हरदेनिया