संस्करण: 22जून-2009

ठीकरा फोड़ने के लिए सिर की तलाश
 

महेश बागी

भारतीय जनता पार्टी को एक ऐसे सिर की तलाश है, जिस पर हार का ठीकरा फोड़ा जा सके। पार्टी की विडंबना यह है कि उसे ऐसा सिर नहीं मिल रहा है। हालांकि पार्टी के कई नेता अलग-अलग बयानों में ऐसे सिर का उल्लेख कर चुके हैं, लेकिन पार्टी आलाकमान इस पर ध्यान नहीं दे पा रहा है। पार्टी अधयक्ष राजनाथ सिंह यह तो कह चुके हैं कि हार के कारणों की समीक्षा कर ली गई है,किंतु वे भी उन कारणों को उजागर करने से कतरा रहे हैं। भाजपा खुद को लोकतांत्रिक राजनीतिक दल मानती है और इस बात पर घमंड भी करती है कि वह केडर बेस तथा अनुशासित पार्टी है, मगर उसके इस मुगालते का भी पर्दाफाश हो गया है। एक ओर तानाशाही का परिचय देकर जहां हार के कारण सार्वजनिक नहीं किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी के वरिष्ठ नेता आग उगलने वाले बयान देकर पार्टी की आंतरिक कलह को उजागर कर रहे हैं।

भाजपा की आंतरिक कलह उजागर करने की शुरूआती 'नॉन कन्फर्म पीएम इन वेटिंग' लालकृष्ण आडवाणी के सलाहकार सुधीन्द्र कुलकर्णी के एक लेख से हुई, जिसमें उन्होंने भाजपा की हार के कारणों का सटीक विश्लेषण किया। इस पर ख़ासा बवाल मचा और खुद आडवाणी को भी सफ़ाई देने के लिए आगे आना पड़ा। वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने जब हार के कारणों पर प्रकाश डालने की पहल की तो उन्हें राज्यसभा में विपक्ष का नेता बना कर चुप कराया गया। इससे यशवंत सिंह आगबबूला हो उठे और उन्होंने तीखे तेवर दिखाते हुए भाजपा को ही अलविदा कह दिया। फिर सुषमा स्वराज ने 'ज्वालामुखी पर चिंगारी' जैसा बयान देकर नया बखेड़ा खड़ा कर दिया। पार्टी में नारी इस अंतर्कलह पर विराम लगाने के लिए आखिरकार राजनाथ सिंह को आगे आना पड़ा और उन्होंने अनुशासन का दंड दिखा कर सबकी बोलती बंद कर दी। अब सुषमा जी तो क्या, किसी भी नेता का मुंह नही खुल रहा है। मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले दुखी हैं कि नेताओं की चुप्पी के कारण कोई ख़बर ही नहीं बन पा रही है।

भाजपा में चल रही इस उठापटक के लिए सीधो-सीधो आडवाणी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्हीं की ही पहल पर जेटली और स्वराज को महत्वपूर्ण पद हासिल हुए। ऐसे में पार्टी नेताओं का यह दुख जायज़ है कि जिन लोगों पर लोकसभा चुनाव के प्रचार का दायित्व था, पार्टी की हार के बाद उन्हें दंडित करने के बजाय पुरस्कार स्वरूप पद क्यों दिए जा रहे हैं ? इसी संदर्भ में पार्टी के पूर्व सांसद चंद्रमणि त्रिपाठी ने यह बयान देकर फिर हलचल मचा दी कि हारे हुए प्रत्याशियों को राज्यसभा में न भेजा जाए। त्रिपाठी का यह कथन सही भी है कि जिन्हें मतदाताओं ने नकार दिया है, उन्हें पिछले दरवाज़े से नेता नहीं बनाना चाहिए। लेकिन वरिष्ठ नेता इस बयान से भी ख़फा है, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह उनके विशेषाधिकारों को सीमित करने का प्रयास है।

भाजपा का यह संकट ऊपरी तौर पर जितना सतही लगता है, उससे कहीं अधिक गंभीर है। सच पूछा जाए तो भाजपा की हालत उस कर्ज़दार जैसी है, जो जुए में अपनी संपत्ति हार चुका है और जो सिर खडे महाजन को सच्चाई बताने की सामर्थ्य भी नहीं जुटा पा रहा है। अपनी आंतरिक समीक्षा में भाजपा ने हार के जो भी कारण माने हों, पर सच्चाई यह है कि अपने तयशुदा लक्ष्यों से भटकाव ही भाजपा की हार का मुख्य कारण बना। 1998 से पहले पार्टी की पहचान एक हिंदूवादी पार्टी की थी, जिसे उसके प्रतिद्वंद्वी हिंदू सांप्रदायिक तथा विदेशी 'हिंदू दक्षिणपंथी' कहते थे। अपनी इस छवि के बल पर तब भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और सत्ता पाने की ख़ातिर उसने अपना स्वरूप बदलना शुरू कर दिया। जो उसे हिंदू सांप्रदायिक कहते थे, भाजपा उन्हें ही संतुष्ट करने में लग गई। सत्ता की सवारी करते समय भाजपा यह भूल गई कि हिंदू हितों के नाम पर ही वह उभर सकी थी। भाजपा ने बहुमत का बहाना बना कर धाारा 370,समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे भाजपा के लिए भावनात्मक ही थे, जिनका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं था और उसने यही किया भी। इससे उसके 'सबसे अलग' होने के दावे का पर्दाफाश हो गया।

सत्ता में बने रहने के लिए भाजपा ने सत्तालोलुपों और दलबदलुओं को तो गले लगाया ही, उनकी हर मांग भी पूरी की। भाजपा से हिंदू हितों की रक्षा की अपेक्षा रखने वालों को उस समय भारी आघात पहुंचा, जब आक्रामक धार्मांतरण का आव्हान करने वाले ईसाई धार्मगुरू पोप को उसके राज में सलामी दी गई। हिंदू मतदाताओं का भाजपा से रहा-सहा मोह उस वक्त भंग हो गया, जब उसके तथाकथित लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी पाकिस्तान यात्रा में देश विभाजन के अगुआ मोहम्मद अली जिन्ना की शान में कसीदे गढ़े। भाजपा ने अपनी राष्ट्रवादी चिंताओं की उपेक्षा कर विकास का नया नारा गढ़ा और 'फील गुड' तथा 'शाइनिंग इंडिया' जैसे जुमले उछाले, जो मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सके। विपक्ष में आने के बाद जब भाजपा ने फिर हिंदुत्व की राह पर लौटने के लिए अमरनाथ और रामसेतु का राग अलापना शुरू किया, तो मतदाताओं को लग गया कि यह उसे फिर बरगलाने का प्रयास है। जब आडवाणी को बतौर प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट किया गया, तब भाजपाको लगा कि सिर्फ हिंदू मतों से सत्ता की सवारी संभव नहीं है। इसलिए उसने देशी-विदेशी मुसलमानों, ईसाई मिशनरियों और अमेरिकी दबाव के आगे झुकना शुरू किया। अपनी ज़मीन छोड़ कर जीत पाने के इस जुए में भाजपा की हार पक्की हो चुकी थी और आडवाणी की छवि ने इस पर अंतिम मुहर लगा दी। आडवाणी की कट्टरवादिता से मुस्लिम वैसे ही खिन्न है। इस पर जब आडवाणी ने खुद के 'सेकुलर होने का राग अलापा तो मुस्लिम उसके साथ नहीं आए और हिंदू भी उससे छिटग गए। नजमा हेपतुल्ला को राज्यसभा सदस्य बनाने और हज सब्सिडी बढ़ाने के उसके क़दमों ने आग में घी का काम किया। ऐन चुनाव के समय कंधाार में लौहपुरुष के मोम की तरह पिघल जाने का मुद्दा उठने से पार्टी की तमाम संभावनाओं पर विराम लग गया। इसलिए अगर भाजपा अपनी हार का ठीकरा फोड़ने के लिए किसी सिर की तलाश में है तो वह सिर सिर्फ आडवाणी का ही होना चाहिए। क्या भाजपा में इतना साहस है कि वह ऐसा कर सकेगी।
 

 महेश बागी