संस्करण: 22जून-2009

 

''स्वास्थ्य समस्याओं के जाल में फंसा भारत''

 

 

स्वाति शर्मा

 '' स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है, और स्वस्थ नागरिक ही एक स्वस्थ व मजबूत राष्ट्र का निर्माण करता है। इसीलिए किसी भी देश में स्वास्थ्य सुधार पर सर्वाधिक बल दिया जाता है। हमारे देश में भी स्वास्थ्य सुधार पंचवर्षीय योजनाओं का महत्वपूर्ण भाग रहा है। लेकिन बढ़ती जनसंख्या के कारण मांग एवं स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति में अंतर बना हुआ है, जिसने भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। हरित एवं श्वेत क्रांतियों की भारी सफलताओं के बावजूद समाज के कमजोर वर्गों की महिलाएं एवं बच्चे आज भी कुपोषण के शिकार हैं। हालांकि मृत्यु दर में कमी और जीवन दर में वृध्दि के फलस्वरूप रोगों की प्रकृति में परिवर्तन हुआ है। देश से चेचक का लगभग सफाया हो चुका है, परंतु मलेरिया एवं कालाज्वर आज भी समाज के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। हृदय संबंधी रोगों, कैंसर, मोतियाबिंद से अंधापन, मधुमेह आदि असंक्रामक रोगों में वृध्दि हुई है। एड्स एवं नशीली दवाओं की लत आदि समस्याओं ने भी अपने पैर पसार लिए हैं। ये सभी समस्याएं जन स्वास्थ्य एवं समाज के लिए विकट चुनौतियां हैं।

हमारे देश में 95 प्रतिशत आबादी मलेरिया स्थानिक क्षेत्रों में रहती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में मलेरिया पीड़ितों की संख्या 7.5 करोड़ थी। लेकिन देश में लगतार मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम चलाए गए। वर्ष 1997 में वृहद मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया, तब से इसके मामलों में काफी कमी आई है। सामान्य मलेरिया में 32 प्रतिशत तथा फेल्सीपेरम में 15 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है। देश के 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 250 से अधिक जिलों में फाइलेरिया के मामले प्रकाश में आए हैं, इन क्षेत्रों की आबादी 50 करोड़ है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अंतर्गत इस रोग के नियंत्रण हेतु डी.ई.सी. खुराक पिलाने का कार्यक्रम चलाया गया। हाल के वर्षों में शहरीकरण के विस्तार तथा जीवन शैली में परिवर्तन के कारण डेंगू के मामले अर्धा शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रहे हैं। पश्चिम बंगाल, दिल्ली, केरल, तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब और हरियाणा सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में आते हैं। इसी तरह बिहार, झारखंड, पं. बंगाल, तथा उ.प्र. के कुछ हिस्सों में कालानार नामक बीमारी प्राय: देखने में आती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2002 में सन् 2010 तक इसके उन्मूलन का लक्ष्य रखा गया है। 2005 में जहाँ पीड़ितों की संख्या 31,217 व मौतों की संख्या 157 थी वहीं 2007 में यह घट कर 12,245 तथा मौतों की संख्या 66 रह गई है।

देश में क्षय रोग भी एक गंभीर समस्या है। दुनिया के क्षय रोग पीड़ितों का पांचवा हिस्सा यहीं पाया जाता है। यहाँ हर वर्ष करीब 18 लाख क्षय रोगी बढ़ जाते हैं। हालांकि 1997 से चलाए जा रहे क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम के क्रियान्वयन ने इलाज के प्रतिशत को बढ़ाया है वहीं मृत्यु दर 5 प्रतिशत से भी कम रह गई है। कुष्ठ रोग भी हमारे देश में एक महत्वपूर्ण समस्या के रूप में विद्यमान था, परंतु 2006 में देश को कुछ मुक्त देश घोषित किया गया है। 26 राज्य तो इससे पूरी तरह मुक्त हो चुके हैं व अन्य यह लक्ष्य हासिल करने वाले हैं। भारत में 1982 में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू किया गया था। बीमारियों की वैश्विक समस्या पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में मानसिक बीमारी को दुनिया में रूग्णता का चौथा प्रमुख कारण बताया गया है। देश में महामारियों के बारे में कराए गए एक विश्लेषण के मुताबिक मानसिक और व्यवहारिय विकृतियों की दर शहरी क्षेत्र में 80.6 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्र में 48.9 प्रतिशत है। इसके अलावा दृष्टिहीनता, आयोडीन न्यूनता, चर्मरोग आदि से संबंधिात समस्याओं का सामना भी जनमानस को करना पड़ता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रगति जारी है। संक्रामक एवं असंक्रामक रोगों की समस्या से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग मलेरिया, टी.बी., कुष्ठ अंधापन, एड्स कैंसर और दिमागी बीमारियों से बचाव और उपचार के लिए पूरे देश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू कर रहा है। संक्रामक रोगों को फैलने से रोकने के लिए रोग निगरानी कार्यक्रम का भी विस्तार किया जा रहा है। तृतीयक स्वास्थ्य सेवा, अस्पताल और विशिष्ट स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने वाले चिकित्सा कॉलेजों की सेवाओं में व्याप्त विभिन्न असंतुलनों को कम करने और अल्प विकसित राज्यों के लोगों की परेशानियों को दूर करने के लिए प्रधाानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना शुरू की गई। इस योजना के अंतर्गत चुने हुए राज्यों में एम्स जैसे संस्थान स्थापित किए जाएंगे। देश के स्वास्थ्य स्तर में सुधार के लिए सरकार ने सात वर्ष के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरूआत की है। इसका मुख्य उद्देश्य समाज के गरीब और कमजोर तबके को सस्ता, सुलभ, प्रभावी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा उपलब्धा कराना है। इसके अंतर्गत सभी वर्तमान स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, संक्रामक रोग नियंत्रण कार्यक्रम, टी.बी. नियंत्रण कार्यक्रम, कुष्ठ, अंधापन और आयोडीन की कमी से होने वाली बीमारियों की रोकथाम की योजनाएं पोषण,सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था आदि मुद्दों की ओर धयान देना है। यह राष्ट्रीय, राज्य, जिला तथा उपजिला स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं, गैर सरकारी संगठनों और अन्यों को शामिल कर स्वास्थ्य और परिवार कल्याण कार्यक्रम के प्रति समुदाय में अपनत्व बढ़ाने का काम करता है। इसी तरह जनस्वास्थ्य समस्याओं को हल करने के लिए अनेक कार्यक्रम एवं योजनाएं समय-समय पर चलाई जाती रही हैं। लोक स्वास्थ्य के क्षेत्र में शानदार सफलताओं के बावजूद देश में अस्वस्थता और मृत्युदर का स्तर विकसित देशों की तुलना में बहुत अधिक है। आने वाली सदी में सबको स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्धा कराने के विश्व स्वास्थ्य संगठन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए ईमानदारी से और प्रयास करने की आवश्यता है।
 


 स्वाति शर्मा