संस्करण: 22जून-2009

 

चुनाव परिणामों से
मिशन विहीन राजनीति की कांपती दीवारें
 

वीरेंद्र जैन

न 2009 के लोकसभा चुनाव इन मायनों में भी महत्वपूर्ण माने जाना चाहिये कि इन चुनावों ने भारतीय राजनीति के अनेक भवनों की दीवारों को हिला कर रख दिया है। इसे इस तरह से भी कह सकते हैं कि लोकतंत्र स्थापना के इस दौर में जो खरपतवार जगह जगह उग रही थी वह मुर्झाने लगी है। ये चुनाव इस बात के संकेत हैं कि आगामी समय में वे ही खड़े रह पायेंगे जिनकी दीवारें मजबूत होगीं और जिनके होने का कोई जनहितैषी आधार होगा।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एक ऐसी पार्टी है जिसकी स्थापना का कोई आधार नहीं था। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं की महात्वाकांक्षाओं ने बिना जमीनी हकीकत को समझे एक ऐसे बहाने पर अपने को संगठित कर लिया था जिसका कोई वैधानिक तर्क नहीं था। वह बहाना, सोनिया गांधी के विदेशी मूल का होने के कारण उन्हें कांग्रेस का नेतृत्व सोंपे जाने से असहमति का था। उनके पक्ष में यह बहाना इसलिए भी अनुपयोगी साबित होना था, और हुआ भी क्योंकि भावनात्मक मुद्दे बना कर वोटरों को बरगलाने में कुशल भाजपा पहले ही इसे उठा चुकी थी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी वालों को इसका लाभ मिलना संभव ही नहीं था क्योंकि 2004 के चुनाव में उन्होंने कुल 32 उम्मीदवार ही खड़े किये थे जबकि भाजपा 364 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। विडंबना यह भी रही कि चुनाव में कुल नौ उम्मीदवारों के जीतने के बाद उन्हें उसी कांग्रेस पार्टी को समर्थन देना पड़ा जिसकी नेता श्रीमती सोनिया गांधी  थीं, भले ही उन्होंने स्वेच्छा से चुने जाने के बाद भी प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। जिस एकमात्र मुद्दे पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी स्थापित की गयी थी उस पर ही दृढ न रहने के बाद भी उसके नेता शरद पवार ने उसका अलग अस्तित्व बनाये रखा व 2009 के लोकसभा चुनाव में उसी कांग्रेस पार्टी से उसी की शर्तों पर चुनावी समझौता भी किया। ऐसा करने के साथ साथ वे तीसरे मोर्चे से भी सम्बंधा बनाये रहे तथा उड़ीसा में बीजू जनता दल की चुनावी सभाओं को सम्बोधित किया। दूसरी ओर वे शिवसेना के बालठाकरे से भी मिले जो कभी उन्हें नाकारा मानते हुये आलू को बोरा कहा करते थे, और उनसे मराठी मानुष के प्रधानमंत्री बनने के नाम पर समर्थन का बयान दिलाया। इसका परिणाम यह हुआ कि 2009 के चुनावों में न केवल उनके दल की सीटों की संख्या ही घट गयी अपितु वोटों का प्रतिशत भी घट गया। गत दिनों उनकी ही पार्टी के एक संसद सदस्य हत्या के आरोप में गिरफ्तार किये गये जिससे उन्हें पार्टी से निलंबित करना पड़ा। पी ए संगमा की बेटी को मंत्री बना दिये जाने के बाद जिस तरह उन्होंने श्रीमती गांधी  से अपने विदेशी मूल वाले बयान के लिए सार्वजनिक क्षमा याचना की है उससे स्पष्ट हो गया है कि उनके पिछले कदम कितने उथले और स्वार्थपूर्ण थे। यूपीए में भी उनके दल की हैसियत दबाव बनाने की नहीं बची है इसलिए अब उनके दल का अलग अस्तित्व निरर्थक हो गया है।

देश में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा में चुनाव हारने के बाद जो आपसी जूतम पैजार सामने आयी है उससे उसके अलग तरह की पार्टी होने के प्रचार का खोखलापन उजागर हो गया है। उनके पिछले कार्यकाल के दौरान ही उनके जितने अधिक लोग संसद में सवाल पूछने के लिए पैसा लेने, सांसद निधि बेचने, दलबदल करने, कबूतरबाजी से धान उगाहने, आदि मामलों में कैमरों की गिरफ्त में आये हैं उतने किसी दूसरे दल के सदस्य नहीं आये हैं। उनके एक बड़े नेता को उनके ही भाई ने उनकी अतिरिक्त आमदनी में से धान का हिस्सा न देने के कारण गोली से उड़ा दिया था तथा उनके शासन में उनके अधयक्ष अस्तित्व विहीन रक्षा उपकरण की खरीद में सहायता देने के लिए रिश्वत लेते हुये व डालरों में मांगते हुये कैमरे की पकड़ में आये थे। उनके एक मंत्री शराब के जाम छलकाते हुये रिश्वत के पैसे को खुदा के बराबर बताते हुये कैमरे के सामने आये थे। संघ की ओर से पदस्थ उनके एक महासचिव रंगरेलियां मनाते हुये देश भर के चैनलों पर देखे गये थे। किसी समय जब भाजपा एक हिंदुत्व वाली पार्टी के रूप में जानी जाती थी। तब वह भले ही बहुलतावादी भारतवर्ष में एक साम्प्रदायिक पार्टी के रूप में अस्वीकार्य रही हो पर उसकी एक वैचारिक पार्टी की तरह की पहचान बनती थी जो अपने लक्ष्यों और अपनी (गलत) समझ के साथ अपना काम करती नजर आती थी, किंतु जैसे जैसे उसने दूसरी सत्ता के खेल में सफल पार्टियों की नकल में अपने विचार को त्याग व्यवहारिक पक्ष अपनाया तो प्राथमिक रूप में तो उन्हें सफलता मिल गयी पर बाद में लूट ही उनकी केन्द्रीय विचारधारा बन गयी और इस लूट में जो आपसी प्रतियोगिता बढी उसमें अनुशासन रह पाना संभव ही नहीं होता है। जब आम जनता को यह लगने लगा कि ये अलग तरह की पार्टी नहीं हैं तो वह दूसरी व्यवहारिक पार्टियों में से ही चुनाव करने लगी व अपेक्षाकृत अधिाक विश्वसनीय पार्टी को पसंद करने लगी जो कम से कम साम्प्रदायिक तो नहीं थे।भाजपा में लोकसभा राज्य सभा में विपक्ष के नेता उपनेता पद के लिए जो खुला संघर्ष सामने आ रहा है उसके पीछे कोई सैध्दांतिक आधार नहीं हैं। श्रीमती सुषमा स्वराज का कहना था कि जब ज्वालामुखी फूट पड़ा हो तो चुप रहना ही बेहतर है, जो शांति काल में दहाड़ने व आपातकाल में शुतरमुर्गी कार्यशैली को प्रकट करता है।

बहुजन समाज पार्टी जब और जिस हद तक सवर्णों के भेदभाव के खिलाफ एक मिशन के साथ खड़े होकर संघर्षरत रही तब तक वह मान्य रही पर जैसे ही उसने अनैतिक ढंग से अनापशनाप पैसा बनाना और व्यक्तिवाद केन्द्रित पार्टी बनना चाहा वैसे ही उसका हाशिये पर आना तय हो गया। चुनाव में हारने के बाद जिस तरह से चुने हुये जनप्रतिनिधायों पर सामंती ढंग से गाज गिरायी गयी वह अकल्पनीय व अलोकतांत्रिक है। यद्यपि वहाँ कम्युनिष्टों की तरह अपनी गलतियों को पहचान कर सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना की परंपरा नहीं है पर विश्वस्त सूत्रों के अनुसार वे सर्वजन की बात छोड़ कर फिर से दलितों की पार्टी के रूप में पुर्नगठित होने जा रहे हैं।

कांग्रेस एक पुरानी हवेली की तरह है जिसकी दीवारों से पलस्तर झड़ गया है व रंग रोगन फीका पड़ गया है किंतु जो एक टीले पर स्थित है, जिसकी नींव बहुत मजबूत है व दीवारें बहुत मोटी मोटी हैं। आंधियों पानियों में कभी कभी जिसकी छत उड़ जाती रही हो पर इसे मामूली मरम्मत से ठीक कर लेना सदा संभव रहता है। बाढ और आंधिायों में जहाँ फैशनेबिल हट्स का मिट जाना तय होता है वहीं अंतत: यही हवेली सहारा बनती आयी है। यद्यपि इसकी पुरानी रौनक तो कभी नहीं लौट सकेगी पर विकल्पहीन समय में यही सहारा बनेगी।

जो दल अपने मिशन पर कार्यरत हैं, उन्हें सरकारों के आने जाने और चुनावों में जीत हार से कोई अंतर नहीं आने वाला है पर जो दल सत्ता के द्वारा धान तथा मद पाने के लिए गिरोह बना लेते हैं वे बदलते समय में क्रमश: विकसित होती जा रही लोकतांत्रिक चेतना के आगे निरंतर बिखरते जाने को विवश होंगे। घटनाक्रम से उम्मीद की जा सकती है-

मिरे जुनूँ का नतीजा जुरूर निकलेगा
                   इसी सियाह समुंदर नूर निकलेगा
 

 

 

वीरेंद्र जैन