संस्करण: 22 फरवरी-2010   

भाषा और धर्म के नाम पर विवाद
राष्ट्रहित में नहीं राजनीति भटकी, विकास अटका


 

राजेंद्र जोशी

            राजनीति की परिभाषा अब गड्डमगड्ड होती जा रही है। राजनीति का पवित्र उद्देश्य दिन पर दिन अपवित्र और कलंकित होता दिखाई दे रहा है। भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में राजनीति के क्षेत्र में प्रत्येक नागरिक को अपनी भागीदारी निभाने के व्यापक अवसर हैं। किंतु बड़ी संख्या में गठित होते जा रहे छोटे-मोटे दलों द्वारा राजनीति के नाम पर जिस तरह के विघटनकारी खेल खेले जा रहे हैं, वह समाज को जोड़कर रखने के बजाय समाज को तोड़ने, आदमी और आदमी के बीच में नफरत फैलाने और व्यवस्थाओं में खलल पैदा करने का ही काम कर रहे हैं। राजनैतिक दलों ने राजनीति को सत्ता पर काबिज होने का एक बड़ा माध्यम बना रखा है और इसके लिए वे वोट कबाड़ने के खातिर जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ करने के नये-नये पैतरे ईज़ाद करते रहते हैं।

        राजनैतिक दलों द्वारा निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए जो एजेंडे तैयार होते हैं उनमें दिखावे के लिए बढ़-चढ़कर मुद्दे तो जोड़े जाते हैं किंतु इन मुद्दों की ज़मीनी हकीकतें कुछ और ही है। राष्ट्रीय स्तर पर देखा जाय तो विपक्षी पार्टियां इसी खेल में लगी रहती हैं कि केंद्रीय सत्ता की जनकल्याण और विकास की नीतियों और कार्यक्रमों पर देश में वाहवाही न होने लग जाय। नहीं तो जनता के बीच उसकी पूछ-परख नहीं रह पायगी। इस दृष्टि से वे सत्ता की प्रत्येक सकारात्मक उपलब्धियों के खिलाफ आम जनता की भावनाओं को भड़काने के लिए धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रीयता के नाम पर राजनीति शुरू कर देते हैं।

     धर्म और साम्प्रदायिकता को लेकर देश में कतिपय राजनैतिक पार्टियों, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर, रामसेतु या जनआस्था से जुड़े स्थलों के नाम पर जनभावनाओं को भड़काने के जो उपक्रम किए उससे देश में नफरत, हिंसा और दहशत का माहौल बना। परिणामस्वरूप आर्थिक और सामाजिक विकास के साथ ही भारत की सांस्कृतिक विकास के साथ ही भारत की सांस्कृतिक परंपराओं को अक्षुण्ण बनाये रखने के कार्यक्रमों पर भी बुरा प्रभाव पड़ा। देश को दो कदम आगे बढ़ाने के चल रहे प्रयासों को इससे धक्का लगता है और ऐसे कुत्सित प्रयासों के कारण देश चार कदम पीछे आ जाता है। विकास की गति बढ़ाने के कामों में सहयोग करने के बजाय कट्टरता और साम्प्रदायिकता फैलाने वाली राजनैतिक पार्टियां लोगों के दिलों को बांटने का चक्र चलाती रहती हैं। आज देश के समक्ष विकसित देशों के समकक्ष बराबरी से खड़े होने की बड़ी-बड़ी चुनौतियां विद्यमान हैं किंतु सत्ता हथियाकर यश, वैभव प्राप्त करने और अधिकार संपन्न बनने के खातिर धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्रवाद को राजनीति का विषय बनाकर जनता को भ्रमित करते रहना ही कतिपय दलों का मुख्य एजेंडा हो गया है।

'              धर्मनिरपेक्षता' का शब्द जो भारतीय संविधान की मूल भावना को परिभाषित करता है, वह केवल संविधान के मूलपाठ का हिस्सा बनकर रह गया है। धर्मनिरपेक्षता के अर्थ को तोड़ा मरोड़ा जा रहा है और विभिन्न विभिन्न धर्मावलंबियों और विभिन्न संप्रदायों के मानने वालों के बीच छत्तीस के आकड़ों का जाल बुना जा रहा है। विभिन्न जातियों और वर्गों के बीच वैमनस्यता फैलाकर अपने-अपने वोट बैंक तैयार किए जाने की राजनैतिक दलों में होड़ लगी हुई है। राजनैतिक दल क्षेत्रीयता, जातिवाद और धर्म के आधार पर निर्वाचनों में प्रत्याशियों को टिकिट बांट रहे हैं। सब अपने-अपने दलों के उल्लू सीधा करने में लगे हैं। जन के मन की बात ही नहीं हो रही है।

        भाषा को राजनीति के खेल का मुद्दा बनाकर देश की सांस्कृतिक एकता को चोट पहुंचाई जा रही है। महाराष्ट्र में जिस तरह भाषा के नाम पर राजनीति का विद्रुप स्वरूप देखा जा रहा है उससे निश्चित ही देश के नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति खिलवाड़ हो रहा है। कुछ निहित स्वार्थ के लोगों के कुत्सित इरादों को जनता के मन की बात की संज्ञा नहीं दी जा सकती। भाषा के नाम पर लोगों के दिलों में आग लगाकर अपनी पार्टी के लिए रोटी सेंकने की शिवसेना की हरकतें अब खुलकर सामने आ गई है। विश्व के तमाम देशों में भारत ही एक ऐसा बड़ा उदाहरण है जहां अलग-अलग धर्मों, संप्रदायों, जातियों और वर्गों के लोग सामूहिक रूप से रहते आये हैं और जिनकी बोलियां और भाषाओं की मिठास के अपने-अपने निराले ही स्वाद हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अनेकता में एकता की मजबूत पृष्ठभूमि वाले देश के संविधान की रचना का आधार भी यही है। किंतु सत्ता की लालसा ने राजनीति के रूप को इतना भोंडा बना दिया है कि राजनीति का मुख्य एजेंडा धर्म, संप्रदाय, जाति, भाषा और क्षेत्र ही बन गया है। सत्ताऐं वे चाहें केंद्र की हो या राज्यों की, सभी विकास की गति को तेज करने और जनकल्याण के कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए कम समय दे पाती है तथा धर्म और भाषा के नाम पर हो रहे उत्पातों को हवा देने या उनके कतिपय उपद्रवों के खिलाफ संघर्षरत् रहने में ज्यादा समय गुजार रही हैं। लगने लगा है कि राजनीति अब सत्ता पर काबिज होने और जनसेवा के पवित्र उद्देश्यों का आधार न होकर दलों के निहित स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बन गई है। देश के कतिपय राज्यों में विभाजन की मांग उठाकर नये राज्यों के गठन के मुद्दों को हवा देने के पीछे भी कतिपय निहित स्वार्थी लोगों की साजिशें ही है। राजनीति अपनी शुचिता और मर्यादाओं की सीमा लांघकर धर्म, भाषा और क्षेत्रवाद के नारों में उलझकर रह गई है जिसे प्रजातांत्रिक व्यवस्था की मजबूती का भ्रम संकेत नहीं माना जा सकता।

राजेंद्र जोशी