संस्करण: 22 फरवरी-2010

अमर मुलायम वाकयुध्द
राजनीति के शिखर पर बेपेंदी के लोटे

 

वीरेंद्र जैन

पने फिल्मी स्तम्भ में अमर सिंह के बारे में चर्चा करते हुये प्रसिध्द फिल्म समीक्षक जय प्रकाश चौकसे ने तर्क दिया था कि -- इस फिल्मी स्तम्भ में अमर सिंह के बारे में लिखना इसलिये उचित है क्योंकि अमर सिंह राजनीति में फिल्मी आदमी माने जाते हैं और फिल्मों में राजनीति के नुमाइन्दे माने जाते हैं- हम कह सकते हैं कि वे मुलायम के डॉयलाग राइटर रहे हैं।

यह सच है कि अमर सिंह राजनीति में जो भूमिकाएं करते रहे हैं वे उस परिकल्पना से कोसों दूर हैं जो हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने देश में एक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की स्थापना करते समय राजनेताओं के बारे में की थीं। वे जनता के नेता नहीं हैं अपितु जनता के नेताओं से कुछ खास लोगों के हित में काम कराने वाले और जनहित के लिये सुरक्षित धन से इन दोनों को ही लाभांवित कराने वाले मध्यस्थ रहे हैं। समाजवादी पार्टी से निकाले जाने के बाद उनकी वाकपटुता एक बौखलाहट में बदलती जा रही है और वे दिन प्रति दिन उन मुलायम सिंह के प्रति कटु से कटुतर होते जा रहे हैं जिनके वे हनुमान होने का दावा किया करते थे, और उनके खिलाफ कभी कुछ भी न बोलने की कसम खाते थे। वे समझते थे कि राजनीतिक रणनीतियाँ बनाते समय उनके साथ मिलकर मुलायम सिंह ने जो समझौते किये थे उनके राज खुल जाने के डर से वे उनकी हर मांग के आगे सरेण्डर हो जायेंगे और परिवारियों को अपने प्रभाव से दबा कर चुप करा देंगे। प्रारंभ में ऐसा हुआ भी जब मुलायम सिंह ने बात खत्म करने के लिये अपने भाई राम गोपाल यादव से फोन पर क्षमा मांगने के लिये कहा और उन्होंने वैसा किया भी। किंतु जब उस पारिवारिक बात को भी अमर सिंह ने प्रचारित करके उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की तो पूरा कुनबा बिफर गया। गुस्से के साथ राम गोपाल यादव ने कहा कि वे कोई खुदा नहीं हैं जो मैं उनसे माफी माँगूंगा, वे पागल हो गये हैं और उनका दिमाग खराब हो गया है। बीच में अमर सिंह ने यह बयान देकर कि उनके अनेक राज मेरे सीने में दफन हैं और वे दफन ही रहेंगे, एक ब्लेकमेलिंगनुमा बयान द्वारा उन्हें याद दिलाया था कि अगर अपने राज को राज ही रखना चाहते हो तो उनसे समझौता कर लो, किंतु तब तक बात मुलायम सिंह के हाथों से निकल गयी थी और एक व्यक्ति केन्द्रित पार्टी का विकेन्द्रीकरण हो चुका था।

अब जब मुलायम सिंह के कुनबे की पार्टी के दरवाजे अमर सिंह के लिये हमेशा के लिये बन्द हो चुके हैं तब अमर सिंह अपने इकलौते ट्रम्प कार्ड को चुटकी में रगड़ते घूम रहे हैं। यह उनका अंतिम अस्त्र है, जिससे मुलायम् सिंह का कितना नुकसान होगा यह तो कहा नहीं जा सकता किंतु अमर सिंह जरूर नि:शस्त्र हो जायेंगे। इस द्वन्द को झेलते झेलते हुये वे बौरा गये हैं तथा स्वयं को अपने मालिक मुलायम सिंह का दर्जी बताने वाले अब उनके कपड़े फाड़ने पर उतारू नजर आते हैं। वे फिर फिर कर कभी अपनी पार्टी की कट्टर दुश्मन रही मायावती के साथ सहानुभूति व्यक्त करते हैं तो कभी बाल ठाकरे को परोक्षरूप से बेहतर बताते हैं। उन्होंने ही कभी विदेशी के बहाने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री न बनने देने के सौदे किये थे, वे ही सोनिया गांधी की प्रशंसा करते फिर रहे हैं।

अब वे बुन्देलखण्ड , हरित प्रदेश के पक्षधर होने के साथ कभी पूर्वांचल के लिये जनचेतना रैली की शुरूआत करते हैं, तो कभी अनशन करने की धमकी देते हैं। पूरे देश में घूम-घूम कर प्रेस के आगे तरह तरह की बाते करते हुये वे यह भूल जाते हैं कि पिछले महीने अपना इस्तीफा भेजते हुये उन्होंने अपने खराब स्वास्थ को कारण बताया था और अपना शेष समय अपने परिवार को देने की इच्छा व्यक्त की थी, किंतु अब वे एक नई पार्टी बनाने की बात कर रहे हैं तथा क्षेत्रीय सम्मेलन की बातें कर उस जाति का नेतृत्व हथियाने की कोशिश कर रहे हैं। क्या राष्ट्रीय राजनीति इतनी गिर चुकी है कि कोई आदमी सरे आम सुबह् कुछ और शाम कुछ कहने लगे और लोग उस पर भरोसा कर लें। ऐसा करके वे अपनी विश्वसनीयता और बीमारी के नाम पर पैदा हो सकने वाली सहानुभूति खुद ही खो रहे हैं। जया प्रदा, जया बच्चन अनिल अंबानी, अमिताभ बच्चन के सहारे वे वोटरों का विश्वास जीत लेने का भ्रम पाले हुये हैं। कभी राजीव गांधी परिवार के सबसे निकट के मित्र रहे, और कभी यूपी की मुलायम सरकार के ब्रांड एम्बेसडर रहे अमिताभ बच्चन, जो बाल ठाकरे के चरणों में झुकते रहते हैं, न जाने किस भय में मोदी से गले लग रहे हैं। अमर सिंह द्वारा दुबई से स्तीफा भेजने के बाद हवाई अड्डे पर अमर सिंह से मिलने जाने वालों में अमिताभ इकलौते प्रमुख लोगों में से एक थे, जो अमर सिंह के कम्प्यूटर अभियान के ब्रांड एम्बेसेडर बन गये हैं। क्या उनके भी कुछ राज अमर सिंह के सीने में दफन हैं!

वे अपने किडनी के आपरेशन को मुलायम सिंह के ऊपर अहसान की तरह बता रहे हैं गोया उन्होंने अपनी किडनियाँ समाजवादी पार्टी को दान में दे दी हों। कभी उन्होंने स्वयं को दधीचि बताया जिन्होंने राक्षसों को मारने हेतु वज्र्र बनाने के लिये अपनी हड्डियाँ दान कर दी थीं। पर उनके इस प्रतीक पर किस को हँसी नहीं आयेगी कि उसी तरह उनका किडनी का आपरेशन है जो खराब होने के कारण विदेशी डाक्टरों ने निकाल दी हैं। जब उनसे राज्यसभा की सीट से भी स्तीफा माँगा गया तो उन्होंने उसके एवज में अपनी किडनियाँ लौटाने की शर्त रख दी गोया उन्हें मुलायम सिंह ने किसी तिजोरी में गिरवीं रखीं हों। उनके द्वारा पंचायत चुनाव तक नहीं जीत पाने की क्षमता के आरोप में वे कहते हैं कि मुलायम अपने बेटे अखिलेश, और भतीजे धर्मेन्द्र से कन्नौज और बुदायुँ सीट से स्तीफा दिलायें तो वे दो दो हाथ करने को तैयार हैं।

अमर सिंह अब मुलायम सिंह के लिये प्रतिदिन एक नई गाली तलाशते हैं।
पिछले दिनों उन्होंने मुलायम को हरा साँप बतलाया था जो हरी घास में छुपा रहता है और बिना नजर आये डस लेता है।
एक दूसरी सभा में उन्होंने मुलायम को धॄतराष्ट्र बताते हुये स्वयं को द्रौपदी बताया जिनकी लाज उनके सामने लुटती रही और वे चुप रहे।
उन्होंने आजम खान के पुराने बयान के बहाने कहा कि भले ही उन्होंने मुलायम सिंह और कल्याण सिंह में पुरानी दोस्ती होने, और इसी कारण कल्याण के मित्र साक्षी महाराज को राज्यसभा में भेजने की बात जाहिर कर दी हो. किंतु वे कोई राज नहीं बतायेंगे, पर इसलिये मेरी अंतरात्मा मुझे कचोट रही है, में खुद को अपराधी महसूस कर रहा हूं।
शाहजहाँपुर में उन्होंने कहा कि मुलायम सिंह के कुकर्मों का जबाब पार्टी से बाहर आकर ही दिया जा सकता है।
मुलायम सिंह एक ओर तो अंग्रेजी का विरोध करते हैं दूसरी ओर उनका बेटा विदेश में रह कर पढा है।
उन्होंने समाजवादी पार्टी को यादव पार्टी में बदल दिया है।
सपा ने मुझे कूड़ेदान की तरह स्तेमाल किया, और मुझे कूड़ा कहा गया।
किसी ने सही कहा है कि यह बेपेंदी के लोटों के गड़्गड़ाहट है जो उसके जमीन पर आने पर ही रुकेगी।

वीरेंद्र जैन