संस्करण: 22 फरवरी-2010

खिसकती जमीन, सिमटता जनाधार
आप की क्या पहचान है ठाकरे जी ?

 

सुभाष गाताड़े

 कई बार बड़े नामी गिरामी पहलवान कुश्ती की दुनिया में रंगरूट की तरह दाखिल हुए नौजवानों के हाथ मात खा जाते हैं। और फिर इस बात की विवेचना लम्बे समय तक होती रहती है कि ऐसा कैसे हुआ।बहरहाल, शिवसेना के सुप्रीमो बाल ठाकरे और बॉलीवुड के 'बादशाह' शाहरूख खान के बीच पिछले दिनों जो विवाद चला, -उसे भले ही किसी कुश्ती का संबोधन देना अनुचित होगा, इसके बावजूद यह कहना पड़ेगा कि पहले राऊंड में सीनियर ठाकरे को मुंह की खानी पड़ी है।

यह भी स्पष्ट है कि मातोश्री में बैठ कर सूबे का रिमोट कन्ट्रोल अपने हाथ में होने का कभी दावा करनेवाले बाल ठाकरे ने बम्बई की बदलती फिजां के संकेतों को अगर समझा होता तो शायद उनकी इतनी भद्द नहीं पीटती। विगत दस सालों में सूबे की सरकार पर काबिज होने के लिए संपन्न तीन चुनावों में उनकी पार्टी को मिली करारी शिकस्त का मसला हो या उनके वोट प्रतिशत में लगातार आ रही गिरावट का मामला हो, या भतीजे की बग़ावत के कारण उनकी पार्टी का अपने पुराने गढ़ों में दूसरे नम्बर पर खिसक जाना हो, सभी संकेत यही बता रहे थे कि अब मराठी मानुस के लिए भी उनकी सियासत की अहमियत धीरे-धीरे चूक रही है।

ध्यान देने लायक मसला यह है कि खुद उनके अपने संगठन के भीतर - उसके अधिनायकवादी स्वरूप के बावजूद -शायद यह स्वर उठता रहा है जो देख पा रहा है कि फिजां अब बदल रही है। बदलते परिदृश्य का यही एहसास था शायद कि विगत दो दशक से अधिक समय से सूबे की सियासत में उसकी सहयोगी भाजपा ने मुंबई मराठियों के सेना के नारे के बरअक्स 'मुंबई भारतवासियों की' का नारा देना जरूरी समझा। लोग यह देख रहे थे कि मुंबई में मराठी भले ही सबसे बड़ा समुदाय हो (35 फीसदी) मगर जो जगह-जगह बिखरा है। कुछ माह पहले मुंबई में पहुंचनेवाले प्रवासियों पर प्रकाशित एक अध्ययन में यह बात भी रेखांकित हुई थी कि यूपी, बिहार की तुलना में खुद महाराष्ट्र के बाकी हिस्सों से पहुंचनेवाले लोगों का अनुपात अब अधिक है। यह अकारण नहीं था कि अपने तमाम वाक्बाणों के बावजूद शिवसेना की तरफ से पहले यही संकेत दिया गया था कि शाहरूख खान की फिल्म का विरोध नहीं किया जाएगा, जिसे आननफानन में बदल दिया गया था।

लोगों को यह मालूम होगा उनके जुनियर ठाकरे अर्थात उध्दव ने लगभग छह साल पहले सियासत में अपनी अलग पहचान बनाने के इरादे से 'मी मुंबईकर' नाम से मुहिम चलाकर एक तरह से इसी का संकेत दिया था, यह अलग बात है 2004 के चुनावों में मुंह की खाने के बाद फिर बैतलवा डार की तर्ज पर उसे बदल दिया गया था।

वैसे इस समूची उठापटक में यह बात कभी चर्चा में नहीं आ सकी है कि अपने तमाम एकांगी किस्म के बयानों और हिंसात्मक कार्रवाइयों के बावजूद शिवसेना खुद मराठी अस्मिता के मसले पर कितनी दुविधा का शिकार है ! इस दुविधा का प्रतिबिम्बन निर्णयकारी निकायों में बैठने के बाद उसकी पोजिशन और उसी वक्त सड़कों पर लगते उसके नारों के बीच व्याप्त गहरे अंतराल में नज़र आता है। इसका गवाह बनी है पिछले साल जारी हुई मुंबई के मानव विकास पर केन्द्रित रिपोर्ट, जिसका विमोचन शिवसेना से जुड़ी मेयर शुभा राऊत ने किया था (अक्तूबर 2009)। ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित इस रिपोर्ट का कॉपीराइट 'म्युनिसिपल कार्पोरेशन आफ ग्रेटर बॉम्बे' के पास है।

जाहिर है बहुत कम लोग बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) - जिस पर लम्बे समय से शिवसेना/भाजपा का नेतृत्व रहा है - की इस रिपोर्ट से परिचित होंगे जिसमें मुंबई के विकास में प्रवासियों की भूमिका के बारे में, उनके योगदान के बारे में महत्वपूर्ण बातें कहीं गयी हैं। कभी दक्षिण भारतीयों के खिलाफ, तो कभी अल्पसंख्यकों के खिलाफ तथा इन दिनों उत्तर भारतीयों के खिलाफ अपनी मुहिम की धार केन्द्रित करनेवाली शिवसेना की स्थापित छवि से विपरीत प्रस्तुत 'मुंबई हयूमन डेवलपमेण्ट रिपोर्ट' प्रवासियों के बारे में काफी सारी अच्छी बातें कहती है। यह विडम्बना ही है कि मराठी अस्मिता के मसले को प्रवासियों के बरअक्स खड़ा करने को लेकर चाचा-भतीजों की 'सेनाओं' की जो कवायद चल रही है, इसमें इस रिपोर्ट पर मीडिया ने एक तरह से मौन ही बरता है।

वरिष्ठ पत्रकार महेश विजापुरकर, जिन्होंने प्रस्तुत रिपोर्ट को तैयार करने में सलाहकार-सम्पादक की भूमिका निभायी, रिडिफ डॉट कॉम पर प्रकाशित अपने आलेख (Migrants do more good than harm to Mumbai, February 10, 2010 15:22 IST) में इसके प्रमुख निष्कर्षों की चर्चा करते हुए निम्नलिखित बातों की चर्चा की है।रिपोर्ट का अहम निष्कर्ष यह है कि हर दशक पर होनेवाली जनगणना में उजागर कुल जनसंख्या में प्रवासियों का प्रतिशत घट रहा है, भले ही सकल आबादी में बढ़ोत्तरी के साथ उनकी संख्या में भी बढ़ोत्तरी हो रही हो। इन प्रवासियों का बहुतांश झुग्गियों में पहुंचता है, कहने का तात्पर्य कि मुंबई जीवनयापन के अवसरों के कारण लोगों के लिए आकर्षक जान पड़ता है, न कि रहने की सुविधाओं के चलते। वर्ष 2001 की जनगणना के हिसाब से देखें तो यह झुग्गियां, मुंबई की 7-8 फीसदी जमीन पर बनी हैं, जिनमें मुंबई की कुल आबादी का लगभग 55 फीसदी रहता है अर्थात 60 लाख से अधिक लोग। दुनिया में ऐसा कोई शहर नहीं होगा जहां इतने अधिक तादाद में लोग नारकिय परिस्थितियों में रहते होंगे।

दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा जो यह रिपोर्ट उठाती है वह है आर्थिक हितों का ? क्या प्रवासियों के आगमन ने मुंबई के आर्थिक हितों का फायदा हुआ है या नुकसान हुआ है ? इसका अन्दाज़ा हम आबादी के साथ प्रति व्यक्ति आय के रिश्ते को जांच कर देख सकते हैं। वर्ष 1991-2001 के दरमियान जहां आबादी धीरे-धीरे बढ़ी है, वहीं प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ी है, इसमें अपवाद महज वर्ष 1998 का है। आधिकारिक आंकड़ों को उध्दात करते हुए मुंबई हयूमन डेवलपमेण्ट रिपोर्ट 2009 रेखांकित करती है कि प्रति व्यक्ति आय बढ़ने का मतलब 'प्रवासियों ने मुंबई के आर्थिक ताकत को कमजोर नहीं किया बल्कि उन्होंने इसमें योगदान दिया है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रवासियों का आगमन मुंबई के लिए प्रतिकूल नहीं बल्कि उसने मुंबई को मदद पहुंचायी है।'

मालूम हो कि अधिकतर प्रवासी ऐसी कुशलताओं को सीखते हैं जो शहरी आबादी की जरूरतों के हिसाब से बेहद जरूरी होती हैं। रिपोर्ट कहती है कि 'आम तौर पर जो बात कही जाती है उससे वे अधिक उद्यमी होते हैं' और शहर के 'समग्र आर्थिक गतिविज्ञान का एकीकृत हिस्सा बनते हैं।' इस बात को स्वीकारते हुए कि प्रवासियों के अपने संवैधानिक अधिकार होते हैं रिपोर्ट बस उनकी 'कमियों' के बारे में यही उल्लेख करती है कि 'शहरी की अवरचना पर/इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बोझ बनने के अलावा वे शहर के आर्थिक विकास में सहभागी बनते हैं'। 'उन्हें कहीं वापस भेजा नहीं जा सकता क्योकि उन्हें संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है और उन्हें कहीं भी घुमने-फिरने या अपने हिसाब से आवास लेने का अधिकार है।'

मुंबई की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र के लगभग तीन चौथाई हिस्से की चर्चा करते हुए - जिसका लगभग 36 फीसदी अनौपचारिक क्षेत्र से आता है -रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि प्रवासियों का अच्छा खासा हिस्सा इसी अनौपचारिक सेवा क्षेत्र में मुब्तिला है।

बीस हजार करोड़ रूपये से अधिक बजटवाली बृहन्मुंबई नगरपालिका का बजट भारत के कई सूबों से अधिक है, जो तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद आज भी मुल्क की आर्थिक राजधानी कहलाती है। विगत दो दशको में उसकी बढ़ोत्तरी की दर पर अगर कोई असर पड़ा है तो उसके पीछे समय-समय पर तीखी होती जाती 'हम' और 'वे' की ही सियासत है जो कभी सम्प्रदाय के नाम पर तो कभी भाषाई समुदायों के रूप में प्रगट होती रही है।

क्या अपनी लगातार खिसकती जमीन और सिमटते जनाधार की हक़ीकत से शिवसेना रूबरू हो सकेगी और क्या वह उस विरोधाभास को हल कर सकेगी जिसके अन्तर्गत वह इस हास्यास्पद स्थिति में अपने को डाले है जहां वह सड़क पर एक बात कहती दिखती है और शहर के संचालक निकायों में बैठ कर दूसरी बात कहती दिखती है ? इसका उत्तार तो आनेवाला वक्त ही बता सकता है।

सुभाष गाताड़े