संस्करण: 22दिसम्बर-2008

सर्दी में गर्मी का एहसास क्यों ?

 

 

अंजनी कुमार झा

शीतऋतु में ठण्ड के बजाय गर्मी हो तो चौंकना और मंथन आवश्यक है। पश्चिमी विशेष अरब सागर से आने वाली हवा का रूख बदलना, निम्न दाब, कश्मीर घाटी में भारी हिमपात से अब प्रबल संभावना के आसार आदि तथ्य, कथन के आधार पर आखिर कब तक हम अपने को झूठी दिलासा देते रहेंगे। हमने पर्यावरण का क्षुद्र स्वार्थ के लिए जमकर दोहन किया। वेद की ऋचाओं को केवल कर्तल स्वर में पढ़ने और सेमिनारों में पढ़े जा रहे शोधपत्रों से भी सुधार कहीं दिख नहीं रहा है।

सरकार के करोड़ों के विज्ञापन भी जन जागृति में कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। आखिर, यह दोष किसका है एनजीओ, सरकार या....? हमारी स्वार्थपरकता ही हमें लील रही है, यह भी न समझना हमें राक्षस युग की ओर ढकेल रहा है। तभी तो पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, रिहायशी इलाकों में फैक्ट्रियों का चलना, नियमों का उल्लंघन करना हमारे व्यवहार में शामिल हो गया है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) द्वारा ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों पर छायी गहरी भूरी-धुंध धारती को गरमाने में आग में घी का काम कर रही है। इससे कई शहरों में अंधेरा हावी होता जा रहा है। हिमाचल में ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार तेज हो रही है और क्षेत्र में मौसमी उठापटक पहले से कहीं ज्यादा उग्र हो गई है।

 रिपोर्ट ने जलवायु परिवर्तन जैसी महाविपदा के लिए इस भूरी धुंध को दूसरे नंबर का जिम्मेदार ठहराया है। पहले स्थान पर कार्बनडाइआक्साइड और अन्य ग्रीन हाउस गैसे हैं। सर्दियां शुरू होते ही नवंबर से मार्च-अप्रैल तक वातावरण पर छायी रहने वाली इस धुंध को पहले स्थानीय मौसमी दशा समझकर ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था। इसके लिए विकसित देश भी कम जिम्मेदार नहीं है।

औद्योगिक देश प्रतिवर्ष 22 हजार 522 मिलियन मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड हवा में छोड़ते हैं, जबकि विकासशील देश आधो से भी कम। प्रति व्यक्ति छोड़े जाने वाले कार्बन पर गौर करें तो दुनिया में अमेरिका नौवें स्थान पर है, जबकि आम भारतीय 129 वें पायदान पर। देश में 1960 से 2000 के बीच प्रति दशक दो प्रतिशत की दर रोशनी का होती जा रही है, धुंध में मौजूदा सल्फेट कम सूरज की गर्मी को अंतरिक्ष में परावर्तित कर देते हैं, और वातावरण में मौजूद गर्मी भी सोख लेते हैं। इससे हो रहे असंतुलन को रोकने के लिए कारगर कदम उठाने की जरूरत है। इसी धुंध के कारण भारत व चीन की प्रमुख नदियों को जल देने वाले ग्लेशियर लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। देश की कई बड़ी और प्रमुख नदियां हिमालय के ग्लेशियर पर निर्भर है। कई वैज्ञानिक अधययनों से यह निष्कर्ष निकलता है कि ग्लेशियरों के दरकने से धारती में गर्मी बढ़ती है। अब जल प्रवाह में आ रही कमी से सर्दी में भी पानी के लिए जद्दोजहद इसी कारण होने लगे हैं। इस धुंध के कारण दमा और श्वास संबंधी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं। एक अधययन के मुताबिक, इस रोग से अनुमानत: आठ लाख लोग प्रति वर्ष जान से हाथ धो बैठते हैं।

तमाम संयंत्रों व आधुनिक उपकरणों के प्रयोग के बावजूद नदियों का जल प्रदूषण ही उगल रहा है। तीन चौथाई आबादी नदी जल पर निर्भर है। पानी मे व्याप्त घातक तत्वों के कारण रोज हम जहर पी रहे हैं। नगर की लचर ड्रेनेज व्यवस्था के कारण जिस जिंदगी को हम बाहर निकालते हैं, उसे ही बाद में पीते हैं। किसानों की नाराजगी है कि खेत बंजर हो रहे हैं। शहरी और अब ग्राम्य जीवन भी रोगों से भरा है। एक तो जल मयस्सर नहीं और उपलब्धा होता भी है तो रोगों से भरा।

उल्लेखनीय है कि जल शोधन के काफी महंगे होने से दिक्कते बढ़ गई है। फिर इससे निकल रहे कचरे का निपटारा कैसे किया जाए, ऐसे प्रश्न कब तक अनुत्तरित रहेंगे। जनप्रतिरोधा के कारण सरकार और उद्योगों पर इस समस्या का समाधान ढूंढने का दबाव बढ़ रहा है। यह सुखद और सकारात्मक पक्ष है कि पाली में पानी में घातक पदार्थों के नमूने मिलने पर आन्दोलन हुआ। किसानों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, समस्या हल तो नहीं हुआ, पर जनांदोलन से कई सकारात्मक बातें सामने आयीं। मानवीय भूल कम हुई। पेड़ों की कटाई पर रोक स्वत: लगी। प्रदूषण के प्रति जगी चेतना का समाज पर असर पड़ा। यही स्थिति जब तमिलनाडु के प्रसिध्द कपड़ा उद्योग तिरूपुर में हुआ तो किसानों के प्रयास से कोर्ट ने निर्णय किया कि किसी भी सूरत में दूषित जल नदी में न डाला जाए। लुधियाना में कोर्ट के त्वरित कदम से इलेक्ट्रोप्लेरिंग व कपड़ा रंगने की औद्योगिक इकाइयों पर अंकुश से बड़ी राहत मिली है।

जन जागृति के साथ स्वत: स्फूर्त कार्य लगातार जारी रहेंगे तभी हमें सर्दी में ठंड और बरसात में बारिश का आनंद मिल पायेगा।

 

 

अंजनी कुमार झा