संस्करण: 22दिसम्बर-2008

अब तो हमें चीन को समझना होगा

 

 

नीरज नैयर

 

चीन की कुटिलता किसी से छिपी नहीं है लेकिन मुंबई हमले पर जिस तरह की खामोशी वो अख्तियार किए हुए हैं उसके बाद ड्रैगन से रिश्तों की पुर्नसमीक्षा आवश्यक हो गई है. आज जहां पूरा विश्व पाकिस्तान की मुखालफत में भारत के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है वहीं चीन अब भी दोहरी चालें चलने में लगा है. एक तरफ वह संयुक्त युध्दभ्यास के बहाने हमसे रिश्ते सुधारने का दिखावा करता है तो दूसरी तरफ हमारे दुश्मन की तामीरदारी करके हमें कमजोर बनाने की कोशिश. मुंबई हमले की साधारण शब्दों में निंदा करके चीन ने महज रस्म अदायगी की है. उसने एक बार भी अमेरिका, ब्रिटेन की तरह पाक के खिलाफ कड़े शब्दों का प्रयोग नहीं किया, उसने एक बार भी पाक को यह हिदायत देने की जहमत नहीं उठाई कि वो आतंकवादियों पर लगाम कसे. जबकि एक पड़ोसी होने के नाते उसका यह फर्ज़ बनता था.

 तिब्बत मसले पर जिस तरह अंतरराष्ट्रीय  समुदाय की आलोचना के बावजूद भारत ने चीन से दोस्ती को नाया था, चीन वैसा कुछ करता नजर नहीं आ रहा. उल्टा वो पाक को यह रोसा दिलाने में लगा है कि अगर भारत सैन्य कार्रवाई करता है तो वो इस्लामाबाद का साथ देगा. चीन के प्रधानमंत्री पाकिस्तानी हुक्मरानों को आश्वस्त कर चुके हैं कि उन्हें बीजिंग का पूरा समर्थन प्राप्त है. चीन का झुकाव शुरू से ही पाकिस्तान की तरफ ज्यादा रहा है. भारत से उसकी दोस्ती महज मुनाफे तक ही सीमित रही है. उसके नेता भारतीय नेतृत्व को बुलाते हैं, उनका भव्य स्वागत करते हैं, बेहतर संबंधों की आस बांधते हैं, सुनहरे वादे करते हैं और व्यापार बढ़ाने के समझौतों पर हस्ताक्षर कर बाकी मसलों को कूड़े की टोकरी में डाल देते हैं.

चीन 1962 के बाद से ऐसा ही करता आ रहा है. हालंकि पहले उसका मिजाज कुछ कड़क था जिसमें वक्त के साथ-साथ कुछ नरमी आई है लेकिन वो भी अपने फायदे के लिए. भारत और चीन के बीच 40 अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चीन यात्रा के वक्त दोनों देश 2010 तक इसे 60 अरब डॉलर करने पर समहत हुए थे. जबकि 1999 में दोनों देशों के बीच सिर्फ 2 अरब डॉलर का ही व्यापार था. 2007 में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापार सहयोगी बनकर उHkा था. पिछले साल भारत चीन में व्यापार में लगHk 57 फीसदी का इजाफा भी हुआ था. चीनी कंपनियां भारतीय बाजार में लगातार पैठ बनाए जा रही है. मोबाइल फोन से लेकर लक्ष्मी गणेश की मूर्तियों तक मेड इन चाइना का बोलबाला है. चीन हर साल अपना सस्ता मद्दा माल भारतीय बाजारों में खपाकर अरबों कमा रहा है और भारतीय कंपनियों के लिये परेशानी बड़ा रहा है. आर्थिक के साथ-साथ चीन सामरिक मोर्चे पर भी हमें कमजोर करने में लगा है. वह पाकिस्तान के हाथ मजबूत कर रहा है. ताकि जब चाहे उनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर सके.

खुफिया एजेंसी रॉ के शीर्ष अधिकारी भी स्वीकारते रहे हैं कि चीन का पाकिस्तान को आंख मूदकर सामरिक साझीदार बनाने का कदम चौंकाने वाला है. उसे उद्धपोत, मिसाइल, हथियार और अत्याधुनिक एयरक्राफ्ट देना उसकी मंशा पर शक करने के लिए काफी है. वैसे चीन का यह रुख कोई नया नहीं है. वह शुरू से ही Hkारत विरोधी मुहिम की अगुवाई करता रहा है. उसने भारत के परमाणु परिक्षण की दिल खोलकर आलोचना की मगर चुपके से पाकिस्तान को यह तकनीक उपलब्ध करा दी. वह चीन ही था जिसने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता की मांग का पुरजोर विरोध किया था.जबकि 1949 में भारत की सिफारिश की बदौलत ही चीन को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता हासिल हुई थी. मुंबई हमले में अपने संगठनों की संलिप्तता को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बढ़ते दबाव के बावजूद पाक जिस अख्खड़ता के साथ भारत से पेश आ रहा है यह चीन की शह का ही नतीजा है. पूर्व में भी चीन की शह पर पाकिस्तान ऐसे ही पेश आता रहा है. 2001 में संसद पर हमले के वक्त भी उसने ऐसी ही उदंडता दिखाई थी. मई 2002 में चीन के विदेशी मंत्री ने इस्लामाबाद से यह ऐलान करके पाक के हौसले और बुलंद कर दिये थे कि Hkारत के खिलाफ हर लड़ाई में चीन पाक का साथ देगा. दरअसल चीन एशिया पर वर्चस्व की जंग लड़ रहा है. लिहाजा Hkारत की समृध्दि और अमेरिका से उसकी बढ़ती नजदीकी चीन को रास नहीं आ रही. इसलिए वो पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश और अब नेपाल आदि देशों को मोहरा बनाकर भारत को कसने में लगा है.

नेपाल में माओवादियों की सरकार बनने के बाद चीन का प्राव वहां साफ नजर आ रहा है. अब तक नेपाल को लेकर भारत पूरी तरह बेफिक्र था. मगर प्रचंड के सत्ता में आने और चीन के प्रति लगाव दिखाने से उसकी परेशानी और बढ़ गई है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि कोसी से बिहार में मची तबाही चीन के इशारे पर ही की गई थी. चीन चोरी छिपे वार करने का आदी है. वह खुलकर भारत के खिलाफ की नहीं बोलता. कुटनीति के जानकार भी मानते हैं कि चीन गुपचुप साजिश को अंजाम देता रहा है. कुछ समय पहले मलेशिया में जिस तरह से हिन्दुओं के साथ बर्ताव किया गया था और जिस तरह से भारत के पक्ष को मलेशिया सरकार ने हवा में उड़ाया था उसमें भी चीन की भूमिका की ही बातें सामने आई थीं. चीन की मंशा भारत को आंतरिक मसलों में उलझाकर रखने की है.

 जम्मू कश्मीर के चरमपंथियों को वो समर्थन देता रहा है. नक्सलियों को भी गुपचुप बढ़ावा देने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी है. उसकी सीमा से घुसपैठ की खबरें भी आने लगी हैं. ऐसे में अगर मुंबई हमले में उसके अप्रत्यक्ष सहयोग की बात कही जाए तो कुछ गलत नहीं होगा. चीन भारत को कमजोर करना चाहता है. उसकी मजबूत होती अर्थव्यवस्था को नेस्तनाबूद करना चाहता है और आतंकवाद के रास्ते वो ये सब आसानी से कर सकता है. शायद इसीलिए सुरक्षा परिषद में आतंकी संगठन जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध की राह में उसने तीन बार रोड़ा अटकाया था. मुंबई हमले के बाद चीन का जो चेहरा सामने आया है उसे ध्यान में रखकर ही ारत को अब ड्रैगन से रिश्तों का खाका तैयार करना होगा. उसे चीन को यह बताना होगा कि अगर वो भारत का साथ चाहता है तो उसे पाकिस्तान से किनारा करना होगा, अगर वो व्यापार बढ़ाना चाहता है तो उसे सीमा विवाद पर भी बात करनी होगी. उसे यह अहसास दिलाना होगा कि दोस्ती महज एक तरफ से नहीं निHkाई जा सकती

 

 

नीरज नैयर