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संस्करण: 22दिसम्बर-2008

बुश की बेहद शर्मनाक बिदाई

 

 

महेश बाग़ी

किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की इतनी शर्मनाक बिदाई नहीं हुई, जितनी जॉर्ज डब्ल्यू बुश की हुई। अल बग़दादिया नामक अख़बार के पत्रकार मुंतज़िर अल जैदी ने एक पत्रकार वार्ता के दौरान बुश पर जूता फेंक कर मारा और कहा कि यही तुम्हारी बिदाई है। इस घटना के बाद पत्रकार मुंतज़िर और उनके द्वारा फेंका गया जूता रातो-रात पूरी दुनिया में मशहूर हो गए हैं। ख़बरों के मुताबिक लीबिया के तानाशाह शासक ग़द्दाफी की बेटी आयशा मुंतज़िर के इस 'साहसिक' क़दम से इस कदर खुश है कि उसने इस इराकी पत्रकार को 'मैडल ऑफ करेज़' से सम्मानित करने की घोषणा की है। उधर एक सऊदी सेवानिवृत्त शिक्षक मोहम्मद मख़ाफ़ा ने बुश पर फेंके गए जूते की बोली लगाते हुए उसे एक करोड़ अमेरिकी डॉलर (करीब 48 करोड़ रुपए) में ख़रीदने की पेशकश की है। हालांकि मुंतजिर द्वारा फेंका गया जूता इतना सधा था कि यदि बुश झुकते नहीं तो वह जूता सीधा उनके मुंह पर पड़ता। सिर झुका कर वे जूते की मार से तो बच गए, मगर इस कारण उन्हें जिस शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़े, उसका कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता।

हालांकि जूता फेंकने वाले पत्रकार मुंतज़िर को अमेरिकी पुलिस ने तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और उसके साथ बुरी तरह मारपीट भी की गई, किंतु इतने भर से उक्त अपमान की भरपायी नहीं हो सकती। अमेरिकी कानून के अनुसार मुंतजिर को कुछ माह जेल की सज़ा हो सकती है, लेकिन इस घटना के ज़रिये उसकी लोकप्रियता का ग्राफ़ आसमान पर पहुंच गया है। पत्रकार समाज का प्रहरी होता है, इस दृष्टि से उसे समाज की भावनाएं सार्वजनिक रूप से उठाने का भी अधिकार है, लेकिन मुंतज़िर ने अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का जो तरीका अपनाया, वह कुछ अलग ही था। दरअसल इराक पर अमेरिकी हमला बुश की तानाशाही और साम्राज्यवादी नीति का ही अंग था। उन्होंने सद्दाम हुसैन को ख़तरनाक रासायनिक हथियारों का मालिक बता कर इराक पर हमला किया और सद्दाम को फांसी देकर वहां के तेल ठिकानों पर कब्जा कर लिया, जो उनका मूल मकसद था, लेकिन वे जिन ख़तरनाक हथियारों के दावे को हमले का आधार बता रहे थे, वे आज तक बरामद नहीं हुए हैं और न ही इराक में लोकतंत्र की बहाली ही हो सकी है। शायद यही वजह है कि बुरा को अपने कार्यकाल के अंतिम क्षणों में यह कहने को मजबूर होना पड़ा कि इराक पर हमला एक भूल थी।

इराक पर जब बुश ने हमला करने की  ठानी थी, तब अमेरिका में ही उसका भारी विरोध हुआ था, इस कारण हमले को जायज़ ठहराने के लिए बुश ने ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की सेना को भी साथ लिया था। इस हमले के विरोध में ब्रिटेन में भी प्रदर्शन हुए थे और एक बार एक ब्रिटिश नागरिक ने प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर पर केक फेंक कर अपने गुस्से का इज़हार किया था। हालांकि यूरोपीय देशों में अपने राजनेताओं के प्रति जनता इस तरह गुस्से का इज़हार करती रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन, फ्रांस के राष्ट्रपति ज्यां शिराक, स्वीडन के गृहमंत्री ओलोफ़ पामे भी ऐसे विरोध प्रदर्शन का सामना कर चुके हैं, लेकिन किसी राष्ट्रपति पर जूता फेंकने की घटना अभूतपूर्व है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर जब एक कोयला खदान का निरीक्षण करने गई थीं, तब एक श्रमिक ने उन पर कोयला फेंककर सुरक्षा साधानों की सरकारी लापरवाही के प्रति विरोधा जताया था। हालांकि थैचर उस श्रमिक को सीधो जेल भिजवा सकती थीं, लेकिन अपनी सरकार की नाकामी स्वीकार करते हुए उन्होंने उस श्रमिक पर कोई कार्यवाही नहीं होने दी थी। बुश जैसे देशी और तानाशाह से ऐसी अपेक्षा क़तई नहीं की जा सकती, इसलिए उनके सुरक्षाकर्मियों ने जूता फेंकने वाले पत्रकार मुंतजिर को इतना पीटा कि उसकी बांह और पसलियां टूट गईं।

इसमें कोई शक नहीं कि सद्दाम हुसैन तानाशाह शासक थे और उन्होंने निरपराध कुर्दों की हत्याएं भी करवाई थीं, लेकिन बुश ने क्या किया ? जिस महाविनाश के हथियारों के नाम पर इराक पर हमला किया गया, वहां कुछ भी बरामद नहीं हुआ। हमले के दौरान एक अमेरिकी सैन्य कमांडर ने यह रिपोर्ट एफबीआई को भेजी थी कि जिस जगह महाविनाश के हथियार होने की बात कही गई है, वहां तो दूधा की फेक्टरियां हैं। यह ख़बर एक वैज्ञानिक के जरिये लीक हुई तो ब्लेयर ने उसे गिरफ्तार करने के आदेश दिए। इसकी भनक लगते ही उस वैज्ञानिक ने गोली मार कर आत्महत्या कर ली। ज़ाहिर है कि इससे ब्रिटिश जनता आक्रोशित होकर सड़क पर उतर आई और भारी जनदबाव के कारण इराक ने ब्रिटिश फौज वापस बुलाई गई। बाद में जब यह खुलासा हुआ कि इराक पर हमला वहां के तेल ठिकानों पर कब्जे के लिए किया गया है तो फ्रांस, इटली और जर्मनी ने भी अपनी सेनाएं वापस बुला ली। अमेरिकी सेना में इतना दम नहीं था कि इराक पर नियंत्रण कर पाती, इसलिये आस्ट्रेलिया पर अनैतिक दबाव डाल कर उसकी सेनाएं युध्द में झोंकी गई।

इराक पर अमेरिकी नेतृत्व में किए गए हमले के दौरान लाखों निरपराध लोगों को मौत के घाट उतारा गया। इतना ही नहीं, तमाम मानवीय संवेदनाओं को दरकिनार करते हुए इराक की इस तरह सीमाबंदी कर दी गई कि आग जनता खाद्यान्न के अभाव में भुखमरी की शिकार होकर काल के गाल में समा गई। अमेरिकी हमले के विरोधा में जब शिया, सुन्नी और कुर्द लोगों ने एकजुट होकर बुश से गुहार लगाई थी कि एक अकेले सद्दाम की खातिर पूरे इराक पर जुल्म क्यों ढाया जा रहा है तो बुश का जवाब था कि इराक का हर नागरिक सद्दाम का गुलाम है और आतंकवादी है। और इस कुतर्क के बल पर निरपराधा बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं को बेमौत करने को मज़बूर किया गया। यह है बुश प्रशासन का लोकतांत्रिक (?) चेहरा।

जॉर्ज बुश दुनिया से आतंकवाद को ख़त्म करने की बात कहते हैं, उस आतंकवाद को उन्होंने ही पल्लवित पोषित  किया। जब इज़राइल ने फिलीस्तीन के ठिकानों पर बलपूर्वक कब्ज़े कर लिए, तब अमेरिका ने उसकी न सिर्फ पीठ थपथपाई, बल्कि हथियार तक मुहैया कराए। स्वतंत्र फिलीस्तीन और लेबनान की मांग को लेकर यासेर अराफात ने संयुक्त राष्ट्र में भी गुहार लगाई, लेकिन अमेरिकी चौधराहट के चलते उसकी एक भी नहीं सुनी गई। आज अराफात हमारे बीच नहीं हैं और अरब-इज़राइल समस्या आज भी यथावत है, जिसके लिए अमेरिकी प्रशासन ही ज़िम्मेदार है। अफगानिस्तान आज जिस आतंकी त्रासदी को भोग रहा है, वह भी अमेरिकी विदेश नीति का ही दुष्परिणाम है। हालत यह है कि अमेरिका न अफगान में और न ही इराक में लोकतंत्र स्थापित करवा सका। फिर उसके द्वारा किए गए हमलों का क्या मतलब निकाला जाए ? मुंतज़िर नामक पत्रकार ने अभिव्यक्ति के जिस तरीके से बुश पर निशाना साधा है, उससे अमेरिका के विदेश नीति नियंताओं को सबक हासिल करने की ज़रूरत है वरना एक समय ऐसा भी आ सकता है, जब पूरी दुनिया एक तरफ और अमेरिका दूसरी तरफ होगा।

 

 

महेश बाग़ी