संस्करण: 22दिसम्बर-2008

क्या ये सारी गतिविधियां संविधान विरोधी नहीं हैं?

एल.एस.हरदेनिया

ध्यप्रदेश में चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद कुछ ऐसी घटनायें हुईं जो संविधान सम्मत प्रावधानों के विपरीत होने के साथ - साथ स्थापित गौरवशाली परंपराओं के विपरीत भी हैं।

इस तरह की घटनाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना है श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा अकेले मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना। हमारे देश के संविधान के अनुसार राज्यों का शासन राज्यपाल द्वारा संचालित होता है। संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल की नियुक्ति होती है। कभी - कभी विशेष परिस्थितयों में एक ही राज्यपाल दो राज्यों के शासन का संचालन करता है। राज्यपाल, शासन का संचालन मंत्रिपरिषद की सलाह से करता है। प्रत्येक राज्य में मंत्रिपरिषद का गठन होता है। मुख्य मंत्री, मंत्रिपरिषद का मुखिया होता है। मंत्रिपरिषद की क्या सलाह है इसकी जानकारी मंत्रिपरिषद का मुखिया, मुख्यमंत्री, समय - समय पर राज्यपाल को देता है। संविधान के प्रावधानों के अनुसार राज्यपाल को सलाह देने का अधिकार मंत्रिपरिषद को है न कि मुख्यमंत्री को। और मंत्रिपरिषद वह है जिसमें एक से अधिक सदस्य हों। दिनांक 12 दिसंबर को शिवराज सिंह चौहान  ने अकेले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। संविधान के अनुसार विधायकों का बहुमत जिस व्यक्ति का समर्थन करता है, वही मुख्यमंत्री बनता है। यह जरूरी नहीं है कि मुख्यमंत्री बनने वाला व्यक्ति शपथ लेते समय विधानसभा का सदस्य हो। यदि ऐसे किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो उसे शपथ लेने की तारीख से छ:ह माह के भीतर विधानसभा का सदस्य बनना होता है। हमारे प्रदेश में जब कैलाश नाथ काटजू, प्रकाश चन्द सेठी, अर्जुन सिंह (तीसरी बार), मोतीलाल वोरा (दूसरी बार), तथा दिग्विजय सिंह और शिवराज सिंह चौहान (पहिली बार) मुख्यमंत्री बने थे उस समय वे विधानसभा के सदस्य नहीं थे। उपरोक्त सभी व्यक्ति मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के छ:ह माह के भीतर विधानसभा के सदस्य बन गए थे। परन्तु सिर्फ मुख्यमंत्री बनने से उन्हें वे अधिकार प्राप्त नहीं हो सके जो मंत्रिपरिषद को प्राप्त रहते हैं। इस तरह के अधिकारों में राज्यपाल को परामर्श देने का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है। इस तरह 12 दिसंबर के बाद से जब तक अन्य मंत्री नियुक्त नहीं होते हैं तब तक शिवराज सिंह चौहान को राज्यपाल को सलाह देने का वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।

संविधान विशेषज्ञों द्वारा विभिन्न ग्रन्थों में इस बात को स्पष्ट रूप से लिखा गया है। उदाहरणार्थ, सुप्रसिध्द संविधान विशेषज्ञ दुर्गादास बसु द्वारा लिखित ग्रंथ ''शार्ट कांस्टीटयूशन'', जिसका संपादन सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त मुख्य न्यायाधीश वाई. व्ही. चन्द्रचूड़ ने किया है, इस बात को स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि राज्यपाल को परामर्श देने का अधिकार मंत्रिपरिषद को है न कि अकेले मुख्यमंत्री को ("The function of advising the Governor by Article 163(1) is vested in the council and not the Chief Minister") चूंकि राज्यपाल को परामर्श देने का लिए मंत्रिपरिषद नहीं है और चूंकि संपूर्ण प्रशासन राज्यपाल के नाम से संचालित होता है, तो ऐसी परिस्थिति में 12 दिसम्बर से उस अवधि तक जब तक मंत्रि परिषद के अन्य सदस्य शपथ नहीं ले लेते हैं प्रदेश में शासन ठप्प माना जाएगा।

इसी तरह शिवराज सिंह चौहान ने एक और स्थापित परंपरा के विपरीत कार्य किया है। बहुमत दल की ओर से सिफारिश होने पर राज्यपाल बहुमत दल द्वारा चयनित व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाता है। यद्यपि संविधान में इस बात का उल्लेख नहीं है कि शपथ ग्रहण समारोह कहां संपन्न होगा, परंतु परंपरानुसार शपथ ग्रहण समारोह राजभवन में ही होता है। इस स्थापित परंपरा के विपरीत भारतीय जनता पार्टी ने शपथ ग्रहण समारोह राजभवन के स्थान पर भोपाल के जम्बूरी मैदान पर संपन्न करवाया। जहां तक याद पड़ता है सर्वप्रथम श्री सुंदरलाल पटवा ने सार्वजनिक स्थल पर शपथ ली थी। उसके बाद उमा भारती का शपथ ग्रहण समारोह भी लाल परेड मैदान पर हुआ था। श्री चौहान ने भी अपना शपथ ग्रहण समारोह सार्वजनिक स्थान पर संपन्न करवाया। शपथ ग्रहण समारोह एक गरिमामय कार्यक्रम होता है। कितने ही प्रयास क्यों न किए जाएं ऐसे कार्यक्रम की गरिमा ऐसे स्थान पर कायम नहीं रखी जा सकती जहां हजारों लोग उपस्थित हों। शपथ राज्यपाल दिलवाते हैं। किसी भी समारोह में राज्यपाल के आगमन और प्रस्थान के समय राष्ट्रगान की धुन बजायी जाती है। इस दौरान सभी उपस्थित व्यक्तियों को शांतिपूर्वक अपने स्थान पर सावधान की मुद्रा में खड़े रहना होता है। स्वाभाविक ही है कि हजारों लोगों से इस तरह के अनुशासन की अपेक्षा नहीं की जा सकती है और वहां उपस्थित लोग बोलते और चलते फिरते रहे। इस प्रकार इन लोगों ने राष्ट्रगान का अपमान किया जो राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान के संबंध में बने कानून के मुताबिक अपराध है और इस कानून में ऐसे अपराध के लिए सजा का प्रावधान है।

12 दिसम्बर को संपन्न हुए शपथ समारोह के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियां की गई थीं। मैदान को सजाया गया था। तीन विशाल मंच बनाए गए थे। समारोह में शामिल होने के लिए अनेक नेता विशेष विमानों से आए थे। विमान से आए नेताओं को विमानतल से समारोह स्थल तक हेलीकाप्टरों से पहुंचाया गया था। समारोह स्थल पर हजारों कुर्सियां लगाई गई थीं। विधायकों को निर्देश दिए गए थे कि वे अपने - अपने क्षेत्रों से भीड़ लाएं। इस प्रकार हजारों लोगों को उस भोपाल शहर में लाया गया जो पहिले से पानी की भीषण कमी से जूझ रहा है। जो समारोह अत्यंत सादगी से राजभवन में हो सकता था उसे इतना खर्चीला बना दिया गया।

इसके अतिरिक्त और एक ऐसी घटना हुई जो संविधान के मुख्य प्रावधानों के विपरीत है। हमारा संविधान पंथ निरपेक्ष है। इसका सीधा अर्थ है कि राजसत्ता का कोई धर्म नहीं होगा। इस स्पष्ट प्रावधान के बावजूद मुख्यमंत्री ने वल्लभ भवन पहुंचकर अपना कार्यकाल हिन्दू देवी देवताओं की पूजा से प्रारंभ किया। पहिली बात यह है कि सरकारी कार्यालय में पूजा अर्चना क्यों होनी चाहिए? और वह भी केवल एक धर्म के देवी देवताओं की।

 

 

एल.एस.हरदेनिया