संस्करण: 22दिसम्बर-2008

किसानों के शोषण के कई रास्ते

 

डॉ. सुनील शर्मा

 

राष्ट्रीय अपराध आंकड़े ब्यूरो की हाँलिया रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रतिदिन 46 किसान आत्महत्या करते हैं और सन 91 से अब तक लगभग 2 लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। पिछले कुछ वर्षों से किसानों की आत्महत्या की खबरें हमें मीडिया के जरिए लगातार मिल रही हैं। हम इन खबरों को अपने आंकड़ों की कड़ी में शामिल कर लेते हैं परंतु इस बात की जिज्ञासा नहीं रखते कि देश के अन्नदाता अपनी जिंदगी से क्यों थक गए हैं?   परंतु इसका बहुत ही सहज उत्तर है कि उनका लगातार शोषण। वास्तव में हमने और हमारी व्यवस्था ने किसानों का लगातार इतना शोषण किया है कि शोषित का पर्यायवाची किसान कहें तो आज कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि हमारी हर नियत और नीति किसान को चूसने के लिए तैयार है। आज किसान अपनी जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। उसे हर पल यह डर है कि कोई कारखाना, सड़क या बांध उसे जमीन से कभी भी बेदखल कर सकता है। उसके खेतों की ओर बढ़ता शहर उसे लीलने के लिए तैयार है। एस.ई.जेड. और स्वर्णिम चतुर्भुज कारीडोर जैसी परियोजनायें भी खेतों को खा रही हैं। किसान को मुआवजे के नाम पर ओने-पोने दाम पकड़ाये जा रहे हैं। सरकारी नीतियां एवं सरकारी कारिंदे किसानों से उनकी कमाई छीनने के लिए तैयार बैठे हैं। किसानी से जुड़े विभाग राजस्व विभाग जिसके जिम्मे भूमि संबंधी रिकार्ड रहता है उसके करनामे तो बडे अजूबे हैं। इस विभाग का जमीनी कर्मचारी पटवारी होता है। इसे भूमि का ब्रम्हा कहा जाये तो गलत नहीं है क्योंकि जमीन पर इसके द्वारा खींची गई लकीर स्वर्गलोक के ब्रम्हा भी नहीं मिटा पायेंगे। वास्तव में किसानों के शोषण की यह बहुत बड़ी कड़ी है। जमीनों के हेर-फेर और घपलों के मामलों में इनकी भूमिका काफी अहम पाई गई है। गांव में पुश्तैनी बंटवारे के मामलों में तो ये कर्मचारी किसानों को काफी तंग करते है। ये कर्मचारी प्रति एकड़ के हिसाब से बंटवारे के रेट निर्धारित किये रहते हैं। इसकी की पूर्ति किए बगैर भूमि का मापन और सरकारी अभिलेखों में उसका अंकन हो पाना टेढ़ी खीर है। किसानों को उनकी भूमि संबंधी रिकार्ड की प्रति पाना भी एक जटिल प्रक्रिया है। गरीब किसानों को इस प्रकार के रिकार्ड को निकलवाना कठिन कार्य है। जबकि शासन द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधायें जैसे कि सस्ते ऋण बीज, खाद एवं मुआवजे में ये कागजात अहम होते हैं। 

अगर किसानों को शोषण के रास्ते में भटकने से बचाना है तो अपने भूमि संबंधी रिकार्ड को रखने वाले राजस्व विभाग को दुरूस्त करना होगा। राजस्व न्यायालय के कार्यों जैसे सहमति पूर्ण बंटवारों, मुआवजे एवं अतिक्रमण संबंधी शिकायतों का निपटारा पंचायत स्तर पर ही होना चाहिए। किसान को भू अभिलेख में संशोधन के लिए तहसीलदार के चक्करों से छुटकारा दिलाने के लिए ग्राम न्यायालयों को जीवित करना चाहिए। किसान को उसके भू अभिलेख मिलने की प्रक्रिया समयबध्द होनी चाहिए। पटवारी जैसे कर्मचारी जो कि किसानों को ढूंढे से नहीं मिलते हैं उनका गांव के पंचायत कार्यालय में बैठना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पंचायतों में गांव की भूमि का रिकार्ड मालिकाना हक प्रदर्शित करते हुए मानचित्र के रूप में उपलब्धा कराया जाना चाहिए। बैंक ऋण और खाद सब्सिडी के लिए पंचायत द्वारा प्रमाणित भू अभिलेख पर्याप्त होना चाहिए क्योंकि पंचायत व्यवस्था किसान की पहुंच में है तथा यह आसान व्यवस्था है।

      किसानों के शोषण की बांकी कसर किसान कल्याण विभाग पूरी कर देता है। अभी तक यह विभाग खाद, बीज एवं भूमि उपचार संबंधी सलाह देने तक की स्थिति में सफल नहीं हो पाया है। इस विभाग के निचले स्तर के कर्मचारी जो कि कृषि के विस्तार के लिए जिम्मेदार हैं  उन्हें खोज पाना छोटे किसानों के बूते से बाहर है। सारी सरकारी सुविधायें इनके जरिए बड़े किसानों को प्राप्त होती हैं। वास्तव में किसान कल्याण विभाग का जमीनी कार्यक्रम असफल और सफेद हाथी है। यह कार्य स्वयंसेवी संगठनों के जरिए आसानी से किया जा सकता है। क्योंकि सिर्फ आंकड़े जुटाने से कृषि और किसानों का भला होने वाला नहीं है। उन्हें उन्नत खेती का प्रशिक्षण चाहिए, अच्छे बीज चाहिए, भूमि उपचार की जानकारी चाहिए। किसानों के शोषण की राह में बाजार एक अहम पड़ाव है जो किसान को नीलाम करने तैयार हैं। किसानों को उनकी फसलों के दाम लागत के मुताबिक नहीं मिल पा रहे हैं। सरकार द्वारा घोषित समर्थन मूल्य एक छलावा ही है इसमें किसान और उसके परिवार की मेहनत का कोई आंकलन नहीं है। समर्थन मूल्य पर गुणवत्ता संबंधी मापदंड किसानों के शोषण को बढ़ावा देते है। किसानों को उनकी फसल के लिए समुचित बाजार व कीमत न मिल पाना भी आत्महत्या करने को मजबूर कर देता है। पिछले वर्ष म.प्र. के लाखों किसानों को गन्ना महज 30-40 रू0 प्रति क्विंटल बेंचना पड़ा था जिससे किसान कर्ज के जाल में फंस गये। इस सत्र में किसानों को आलू और सोयाबीन अपनी लागत से भी कम मूल्य पर मजबूर होना पड़ रहा है। मंडियों में कम तोल, विचौलिए एवं तत्काल भुगतान न हो पाने की समस्या  से किसान त्रस्त हैं। बिजली और पानी खेती की व्यवस्था के मूलभूत मुद्दे हैं। बिजली की भारी कटौती किसानों की फसल सुखो रही है। नहरों से पानी की अनुपलब्धाता भी किसानों को मार रही है। मैंने म.प्र. के रीवा जिले के मनगवां क्षेत्र में देखा कि किसानों को अब दिसम्बर के दूसरे सप्ताह में नहरों से पानी मिलना शुरू हुआ है जिससे किसान पलेवा करेंगें फिर खेतों को सुखायेंगे तत्पश्चात जनवरी के दूसरे सप्ताह तक गेंहूं की बोनी हो पायेगी। इस स्थिति में उनकी उत्पादकता क्या होगी इसका आंकलन सहज ही किया जा सकता है कि बड़ी मुश्किल से अगर वो लागत निकाल पायेंगे। वास्तव में अगर समय पर पानी की व्यवस्था हो जाती तो किसान लाभदायक खेती कर सकते थे। परंतु आजादी के 60 साल बाद भी यह संभव नहीं हो पाया और किसान थक कर आत्महत्या कर रहा है।

 

डॉ. सुनील शर्मा