संस्करण: 22दिसम्बर-2008

भुखमरी का बढ़ता दायरा

 

 

 

 

प्रमोद भार्गव

दुनिया के नेतृत्वकर्ता और समृध्दशाली लोग जिस तरह से प्रकृति और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करते हुए विकास का ढ़िढोरा पीट रहे हैं उनके हित भूख का दायरा बढ़ते जाने में ही निहित हैं। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ के खाद्य और कृषि संगठन की ताजा रिपोर्ट का यह दर्शाना कि दुनिया में भूखे लोगों की गिनती में चार करोड़ भुखमरों का इजाफा और हो गया है, हैरानी में डालने वाली बात नहीं होनी चाहिए। यह तो होना ही था। विषमतामूलक विकास का यही ढर्रा रहा तो आगामी कुछ वर्षों में भुखमरों की संख्या एक अरब के आंकड़े को पार कर जाएगी। क्योंकि प्राकृतिक आपदाओं, भोग-विलास की बढ़ती प्रवृत्ति, एक बढ़ी आबादी की निर्भरता को प्रकृति से विच्छेद कर देना और दुनिया में बढ़ता भ्रष्टाचार विषमता की खाई को बढ़ाकर भूख के दायरे को बढ़ाने के काम में ही लगे हैं।

 इस प्रतिवेदन के आने से पहले तक भूख से जूझ रहे लाचार लोगों की संख्या 96 करोड़ थी। भूखों की संख्या घटाने के दृष्टिगत आठ साल पहले दुनिया के तमाम देशों ने मिलकर यह लक्ष्य सुनिश्चित किया था कि 2015 तक यह संख्या घटकर आधी रह जाए। लेकिन तमाम प्रयासों और अनुदान के उपक्रमों के बाद जो तसबीर सामने आई है वह और बदरंग ही रही। विश्वग्राम, बाजारवाद और उदारीकरण का जो हल्ला 1990 से तेज हुआ था, उसने बारह करोड़ से भी ज्यादा लोगों को और अपनी गिरफ्त में ले लिया। नतीजतन प्रत्येक पन्द्रह व्यक्तियों से एक भूखा है।

भूख से भयभीत ये चेहरे उन नेतृत्वकर्ताओं के गाल पर तमाचा हैं जो गरीबी दूर करने और समतामूलक समाज की स्थापना के नारों के साथ सत्ताओं पर काबिज बने रहते हैं। दरअसल उनकी जो भी नीतियां अस्तित्व में आती हैं वे गरीब को और गरीब बनाने में कारगर हथियार साबित होती हैं। फलस्वरूप प्रति दिन प्रतिव्यक्ति आमदनी में कमी होती जाती है और विडंबना यह कि खाद्यानों की कीमतें बढ़ती जाती हैं। लिहाजा गरीब की 'रोटी' से दूर बढ़ती जाती है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र चेतावनी दे रहा है कि वर्तमान आर्थिक संकट से गरीब देश सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। इनमें से पचास देश तो ऐसे हैं जिनकी खाद्यान्न-निर्भरता निर्यात पर ही टिकी है। ऐसे देशों में अंगोला, सूडान और इक्वेटोरियल गिनी जैसे देशों की गिनती की जा सकती है।

      वैसे भी फिलवक्त दुनिया दो तरह के देशों में विभाजित है एक वे जिनके पास तेल व गैस के अक्ष्य भण्डार हैं और दूसरे वे जो ऊर्जा के इन स्रोतों से अछूते हैं। शायद इसीलिए हेनरी किसिंगर ने बहुत पहले कहा था कि यदि अमेरिका तेल-उत्पादन वालें देशों को नियंत्रित कर लेता है तो वह पूरी दुनिया को काबू कर लेगा और यदि केवल खाद्यान्नों पर नियंत्रण कर पाता है तो एक निश्चित जनसंख्या वाले देश ही उसके मातहत होंगे। गौरतलब है कि अमेरिका ने जैविक हथियारों के बहाने इसी मकसद के दृष्टिगत इराक पर हमला बोला और उसे नेस्तनाबूत कर उसके तेल भण्डारों को अपने आधिपत्य में ले लिया। फलस्वरूप आज अमेरिका के कब्जे में तेल भी है और खाद्यान्न भी! और इसीलिए वह जबरदस्त आर्थिक मंदी के बावजूद दुनिया का सिरमौर देश बना बैठा है। विकासशील देशों की अर्थ व्यवस्था की वलगाएं भी उसके हाथों में हैं। आर्थिक मंदी के पूर्व दुनिया में ऊर्जा के स्रोत और खाद्यान्न मंहगे होते जाने का कारण था, अमेरिका का इन स्रोतों पर एकाधिपत्य!

      बढ़ती कीमतों और घटती आमदनी के कारण ही हेती, फिलीपिंस और इथोपिया जैसे देशों में आहार जन्य वस्तुओं को लेकर दंगे हुए। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अनाज के भण्डार लूटे गए। भारत ने अपनी आबादी को भुखमरी से निजात दिलाने की दृष्टि से ही खाद्यान्न निर्यातों पर रोक लगाई जो आयतक देशों में मंहगाई का कारण बनी हुई है। इसके बावजूद भारत के इक्कीस करोड़ से भी अधिक लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता। जबकि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में दो वक्त की रोटी को मूल मानव अधिकार में शामिल किया गया है। भारत की राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण की रिपोर्ट कहती है कि सात करोड़ तीस लाख से भी ज्यादा लोगों का दैनिक खर्च नौ रूपये से भी कम है। जबकि अंर्तराष्ट्रीय मानक के अनुसार गरीब का खर्च प्रतिदिन एक डॉलर मसलन, चालीस रूपये होना चाहिए। ऐसे में गरीब पहने क्या और निचोडे क्या?

      दुनिया के करोड़ों लोग भूख के सुरसामुख का आहार बनने के लिए विवश हो रहे हैं, इसके लिए औद्योगिक विकास भी दोषी है। आस्ट्रेलिया में पड़े अकाल के पीछे औद्योगिक विकास के चलते जलवायु परिवर्तन की खास भूमिका जताई गई है। इस कारण यहां गेहूं के उत्पादन में 60 फीसदी की बेतहाशा कमी आई और दुनिया को एक समय बड़ी मात्रा में गेहूं निर्यात करने वाला देश खुद भूख की चपेट में आ गया। भारत और चीन में भी औद्योगिक विकास ने जलवायु परिवर्तन की गति तेज कर दी। इस रफ्तार ने पश्चिम की उपभोक्तावादी और एंद्रिय सुख वाली भोग-विलाषी जीवन-शैली को हवा दी। इस कारण क्रय शक्ति में इजाफा और धानी तबकों में उपभोग की प्रवृत्तिा बढ़ी। साथ ही खाद्यान्नों की खपत में भी वृध्दि हुई। नतीजतन मांसाहारों की संख्या में आशातीत वृध्दि हुई। जानकारों की मानें तो सौ कैलोरी के बराबर बीफ (गोमांस) तैयार करने के लिए सात सौ कैलोरी के बाराबर का अनाज खर्च करना पड़ता है। इसी तरह बकरे या मुर्गियों के पालन में जितना अनाज खर्च होता है, उतना अगर सीधो आहार बनाना हो तो वह कहीं ज्यादा लोगों की भूख मिटा सकता है। एक आम चीनी नागरिक अब प्रति वर्ष औसतन 50 कि.ग्रा. मास खा रहा है, जबकि 90 के दशक के मधय में यह खपत महज 20 कि.ग्रा. थी। कुछ ऐसी ही बजहों से चीन में करीब 15 प्रतिशत और भारत में 20 प्रतिशत लोग भुखमरी का अभिशाप झेल रहे है। लेकिन पश्चिमी जीवन शैली बाधिात हो ऐसा मौजूदा हालातों में तो लगता नहीं ?

      भुखमरी का दायरा बढ़ने की विडंबना यह भी रही कि जब बीते कुछ सालों के भीतर खाद्य संकट गहरा रहा था तब अमेरिका और अन्य विकसित देश गेहूं , चावल, मक्का, गन्ना, सोयाबीन, रतनजोत आदि फसलों से वाहनों का ईंधान जुटाने में लगे थे। ऊर्जा के इन वैकल्पिक स्रोतों को ईंधन में रूपांतरण की वजह से भी खाद्यान्न संकट गहराया और भूखों की संख्या बढ़ी। यहां यह निष्पक्ष आकलन करना भी थोड़ा मुश्किल होता है कि आस्ट्रेलिया में गेहूं की कमी के कारण भूख का दायरा बढ़ा अथवा अमेरिका द्वारा लाखों टन अनाज को जैविक ईंधान में रासायनिक परिवर्तन से ?

      अनाज के बेजा इस्तेमाल और उत्पादन में कमी के कारण ही भूख के पहले लक्ष्ण कुपोषण का दायरा बढ़ रहा है। भारत सरकार खरीद से आधो मूल्य पर पेट्रोल-डीजल उपभोक्ता को उपलब्ध कराकर डेढ़ लाख करोड़ का सलाना घाटा उठा रही है। मसलन प्रतिदिन साढ़े चार सौ करोड़ का घाटा ? जिससे मंहगाई काबू में रहे और बेशर्म उपभोक्तावादियों की मौज-मस्ती की जीवन शैली का रंग, भंग न हो ? अर्थ व्यवस्था का यह समीकरण किसके लिए है ? बहराल भारत में वर्तमान में स्थिति में विकास की जो दर सात से आठ प्रतिशत है भुखमरी की चाल की गति भी कमोवेश यही है। जबकि धनाढ़य देशों में इनकी संख्या ढाई करोड़ और औद्योगिक देशों में करीब एक करोड़ है।

      1996 में हुए विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन के 11 वर्ष बाद भी दुनिया में ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है जिन्हें अल्प पोषण पाकर ही संतोष करना पड़ता है। ऐसे सर्वाधिक 82 करोड़ लोग विकासशील देशों में रहते हैं। विश्व के करीब 15 करोड़ कुपोषित बच्चों में से 70 फीसदी सिर्फ 10 देशों में रहते हैं और उनमें से भी आधो अधिाक केवल दक्षिण एशिया में। बढ़ती आर्थिक विकास दर पर गर्व करने वाले भारत में भी 20 करोड़ से भी ज्यादा बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। मधयप्रदेश, छत्तीगढ़, उड़ीसा और बिहार जैसे राज्यों में कुपोषण के हालात कमोवेश अफ्रीका के  इथोपिया, सोमालिया और चांड जैसे ही है।

      प्रकृतिजन्य स्वभाव के कारण औरतों को ज्यादा भूख सहनी पड़ती है। दुनियाभर में भूख के शिकार हो रहे लोगों में से 60 फीसदी महिलाएं ही होती हैं। क्योंकि उन्हें स्वयं की क्षुधा-पूर्ति से ज्यादा अपनी संतान की भूख मिटाने की चिंता होती है। कुछ ऐसी ही वजहों के चलते भूख, कुपोषण व अल्प पोषण से उपजी बीमारियों के कारण हर रोज 24 हजार लोग मौत की गोद में समा जाते हैं। मसलन महज साढ़े तीन सेकेण्ड में एक इंसान !

          यदि भुखमरी व कुपोषण की समस्या के निदान में जाना है तो दुनिया को व्यापक मानवीय दृष्टिकोण अपनाना होगा। वैश्विक आर्थिकी के चलते जिस भोग वादी संस्कृति के कारण जो सामाजिक असमानता बढ़ी है उसके लिए सबसे पहले अनाज को जैविक ईंधन में बदलने की प्रवृत्ति और अंधाधुंध औद्योगिक विकास पर अंकुश लगाते हुए मानव का रिश्ता प्रकृति से जोड़ने के उपक्रम करने होगें ? क्योंकि भोगवादी लोगों के जीवन में समृध्दि प्राकृतिक संपदा के बेतहाशा दोहन और प्रकृति पर निर्भर लोगों की बेदखली की नीतियों से ही आई है और प्रकृति पर निर्भर यही लोग भूख व कुपोषण के दायरे में हैं

 

प्रमोद भार्गव