संस्करण: 22दिसम्बर-2008

सेना का आवाहन

एक खतरनाक संकेत

 

वीरेन्द्र जैन

भाजपा के नेता और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गत तीन दिसम्बर को भाजपा के प्रदेश मुख्यालय में बैठ कर एक बहुत ही खतरनाक बयान दिया है जो हमारी पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती की तरह है। गत दिनों मुंबई में हुये आतंकवादी हमलों के सम्बंध में विचार व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा कि ''केन्द्र सरकार पोटा जैसा कड़ा कानून बनाये व सेना को खुली छूट दे दे तो सेना अपने आप निपट लेगी।'' यह बयान लोकतांत्रिक आधार पर चुनी हुयी सरकार को नकारने जैसा है और पाकिस्तान म्याँमार आदि जैसे देशों की तरह लोकतंत्र पर सेना को सवार कराने जैसा है। खेद की बात है कि यह बयान एक प्रदेश के मुख्यमंत्री का ही बयान नहीं है अपितु देश की दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के नेता का भी बयान है जो कई सालों तक सांसद भी रह चुका है।

लोकतंत्र में विपक्ष में बैठने वाली पार्टी को सत्तारूढ दल की आलोचना का अधिकार तो होता है किंतु उसकी असफलताओं पर जब लोकतांत्रिक प्रणाली की जगह सैनिक शासन की बात कोई राजनेता करने लगता है तो उसका साफ मतलब होता है कि उसका प्रणाली से मोहभंग हो गया है और वह देश की समस्याओं को हल करने के लिए अपनी पार्टी को विकल्प की तरह पेश करने की जगह सेना पर भरोसा करने लगा है। पता नहीं कि ऐसा बयान सम्बंधित नेता की सैनिक शासन के खतरों के प्रति अज्ञानता का प्रमाण है या उसके दल ने पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ बना कर सेना में अवैध हस्तक्षेप का जो बायपास तैयार किया हुआ है उसकी ओर संकेत है। स्मरणीय है कि गत दिनों सेना के एक अधिकारी मालेगाँव बम विस्फोट कांड में आरोपी बनाये गये हैं व अनेक पूर्व सैनिकों से पूछताछ की जा रही है। ये सभी कहीं न कहीं संघ परिवार वाली हिंदुत्व की विचारधारा से जुड़े हैं व जिस तरह से संघ परिवारी इन की रक्षा में आगे बढ बढ कर बयान दे रहे हैं उससे साफ पता लगता है कि यह संगठन, जिस पर फासिस्ट होने के आरोप लगते रहते हैं, लोकतांत्रिक ढंग से समस्याएं सुलझाने की जगह कानून और मानव अधिकारों को ताक पर रख देने वाला सैनिक शासन क्यों मांग रहा है! रोचक यह है कि इन्हीं मुख्यमंत्री जी ने गत दिनों इमरजैंसी का विरोधा करने के सन्देह में गिरफ्तार किये गये लोगों का इमरजैंसी के तीस साल बाद न केवल सम्मान ही किया अपितु उन्हें पेंशन देकर जीवन भर के लिए उपकृत भी किया था जबकि इसके पूर्व भी इन की पार्टी की सरकार रह चुकी थी तथा उक्त फैसला भी अपने कार्यकाल के अंतिम समय में लिया गया था। (यह बात अलग है कि माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी ने न केवल पेंशन लेने से मना ही किया अपितु इसे संघ परिवार के लोगों के लिए पैसे की अनुचित बंदरबाँट भी बतलाया था।)

जिन अंग्रेजों से लड़ कर हमने आजादी पायी थी वे हमारे देश में केवल मुट्ठी भर थे व हमारे यहाँ के राजे रजवाड़ों व सैनिकों को मानसिक गुलाम बना कर उनकी सहायता से ही शासन करते थे इसलिए हमने अपनी आजादी को उन राजे रजवाड़ों को सोंपने की जगह लोकतांत्रिक व्यवस्था पसंद की थी व हमारी आजादी की लड़ाई राजतंत्र की जगह इसी लोकतंत्र को लाने के लिए थी। इसी शासन प्रणाली को लाने के लिए हमारे नायक भगतसिंह ने अपनी जान की बाजी लगायी थी व हँसते हँसते फाँसी के फन्दे पर झूल गये थे। पर जिन लोगों का आजादी की लड़ाई से कोई वास्ता नहीं रहा तथा जिनका दल पुराने राज परिवारों की कृपा का सदा मोहताज रहा हो उनका एक आतंकी संकट के आने पर अपनी आजादी को सेनाओं को सौंपने की वकालत करना स्वाभाविक ही माना जाना चाहिये। पर यह प्रवृत्ति देश व उसके नागरिकों की आजादी को बनाये रखने की दृष्टि से खतरनाक है।

स्मरणीय है कि हमने लोकतंत्र का सम्मान करने के लिए बड़े से बड़ा अपराध भी छोटा माना है। नरेन्द्र मोदी जैसे व्यक्तियों को, जो हजारों निर्दोश लोगों की हत्या के लिए जिम्मेवार ठहराये जाते हैं, जनता द्वारा चुन लिए जाने के बाद पूरे धर्मनिरपेक्ष देश ने झेल लिया है और भारत सरकार ने उनकी सरकार के खिलाफ धारा 356 का प्रयोग नहीं किया। राबड़ी देवी ने भी दो विधान सभाओं के कार्यकाल में काम किया है, व अपनी अक्षमता के कारण पूरे प्रदेश में प्रशासन को नष्ट होने दिया, पर लोकतंत्र के सम्मान में उनका भी शासन बनाये रखा गया।

मुंबई की जिन आतंकी घटनाओं के कारण शिवराजसिंह चौहान सैनिकों के हाथ में कमान सोंपने की सलाहें दे रहे हें वे घटनाएं अपने आप में अभूतपूर्व थीं। वैसे तो गत चार साल में विभिन्न तरह की घटनाओं में सात हजार से अघिक लोग अपनी जान गँवा चुके हैं पर किसी विदेशी द्वारा अपनी जान हथेली पर रख, किसी गैर धार्मिक स्थलों पर सरे आम गोली चला निर्दोश नागरिकों को मारने का दुस्साहस पहली बार नजर आया है। पहले की घटनाएं कायराना कृत्य होती थीं जब आतंकी चोरी छुपे बम रख कर गायब हो जाते थे। इस मामले को तो सीधो सीधो देश पर किया गया हमला ही माना जाना चाहिये व माना भी गया है और वैसा ही जवाब भी दिया गया है। हमलावर मरने के लिए पूरी तरह तैयार होकर आये थे और मरने से पहले अधिक से अधिक लोगों को मार देना चाहते थे। उनके हमले का यह ढंग नया था जिस कारण ना तो वैसा अनुमान ही था और ना वैसी तैयारी ही थी। उनके आने का रास्ता भी नया था व उन्होंने किसी स्थानीय व्यक्ति को साधान न बना कर भविष्य की जाँच के सारे रास्ते भी बन्द करना चाहे थे। यह भी पहली बार ही हुआ है कि आतंक विरोधी दस्ते का हमारा प्रमुख अधिकारी इसी दौरान मारा गया जो अपने ही देश के आतंकवादियों के खिलाफ जाँच करते हुये महत्वपूर्ण जानकारी पर पहुँच चुका था। यह जाँच का विषय हो सकता है कि उसका मरना क्या महज संयोग था या उसी को मारने की परिस्थिति पैदा करने के लिए दूसरी हत्याएं की गयी थीं। सवाल यह भी उठता है कि देश और विदेश के सबसे महत्वपूर्ण लोगों के ठहरने वाले होटलों को निशाना बनाने के पीछे कहीं अमेरिकन इन्टेलीजेंस विभाग के वे बड़े अधिकारी तो नहीं थे जिनमें से दो मारे गये हैं। यह संदेह इसलिए भी होता है क्योंकि नांदेड़ में जो हिंदुत्ववादी आतंकी बम बनाते हुये मारे गये थे उनके पास से मुसलमानों जैसी नकली दाढी और पोशाकें भी बरामद हुयी थीं। यह आतंकी घटना को अंजाम देने के साथ साथ जाँच एजेंसियों को भटकाने की तैयारी का भी हिस्सा था। इस अवसर पर अमेरिका की विदेशमंत्री कोण्डला राइस का आनन फानन में दोनों देशों का दौरा करना व एफबीआई की टीम भेजने की पेशकश करने के साथ दोनों ही देशों में उनके जैसी ही बात करना भी कई संदेह पैदा करता है। विचारणीय है कि कहीं हम दूसरे की बन्दूक अपने कंधो पर ढोने के अभिशप्त तो नहीं हो रहे हैं!

 भाजपा के अध्यक्ष राजनाथ सिंह द्वारा भी पाकिस्तान को सबक सिखाने का आवाहन करना भी एक तरह से युध्द के माहौल में सेना के महत्व को बढाने की योजना का हिस्सा लगता है अन्यथा किसी इतने बड़े पार्टी पदाधिकारी द्वारा एक सामान्य अधिकारी की तरह बयान देना भी कई सवाल खड़े करता है। उनकी पार्टी प्रधानमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार प्रधानमंत्री भी घोषित कर चुकी है इसलिए भी अध्यक्ष के बयान संतुलित होने चाहिये। पिछले दिनों आरएसएस प्रमुख सुदर्शन ने यह बयान देकर तो एकदम चौकन्ना ही कर दिया कि ''भारत को पाकिस्तान पर परमाणु हमला कर देना चाहिये भले ही इसमें दोनों देशों के कितने भी लोग मारे जावें।''

आतंकी हमले के घटनाक्रम को कवर करने वाली प्रसिध्द पत्रकार बरखा दत्त ने इस दौरान अनेक लोगों से बाइट ली और उन आम जनों की तीखी प्रतिक्रिया को उन मासूम नागरिकों के हिसाब से स्वाभाविक मानते हुये कहा है कि '' राजनीति और नेताओं के खिलाफ हमारा गुस्सा जायज है, लेकिन हमें सावधाान रहने की जरूरत है कि कहीं ये गुस्सा लोकतंत्र के खिलाफ गुस्से में न तब्दील हो जाए। आखिरकार डेमोक्रेसी की वजह से ही यह संभव है कि हम अपने गुस्से को आवाज दे पा रहे हैं। हम जरूर पॉलिटिक्स की आलोचना करें, लेकिन लोकतंत्र की नहीं। दूसरे हमारी लड़ाई किसी धर्म या संप्रदाय विशेष के खिलाफ नहीं होनी चाहिए। इस घटना के बाद सरकार सुरक्षा के जो भी उपाय करे, नागरिकों को उसमें पूरा सहयोग करना चाहिए। एयरपोर्ट पर चैकिंग में देर हो तो हम नाराज होने लगते हें। सुरक्षा तभी संभव होगी, जब सभी लोगों का रवैया सहयोगपूर्ण होगा।

 

वीरेन्द्र जैन